कैलाश सत्यार्थी की “दियासलाई”

9 Min Read

यह नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी की आत्मकथा है। राजकमल प्रकाशन से इसी साल छपी है। 1954 में मध्यप्रदेश के विदिशा में जन्में और इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले एक ऐसे नौजवान का जीवन यात्रा वृत्तांत है, जो उन सब युवाओं के लिए एक पठनीय दस्तावेज है, जो पढ़ाई पूरी कर रहे हैं या कर चुके हैं। कैलाश जी की “दियासलाई’ उन्हें इतनी रोशनी अवश्य दे सकती है कि वे बेफिक्र होकर जीवन में अगले कुछ कदम आगे बढ़ा पाएँगे। और यह भरोसा कि डिग्री का महत्व बहुत है नहीं।

जीवन में कुछ करने के सपने युवाओं में सर्वाधिक ताजे होते हैं। पढ़ाई के अंतिम वर्षों में ये सपने आकार ले रहे होते हैं। सामान्यत: एक नौकरी का लक्ष्य ही सामने होता है ताकि अपने पैरों पर खड़े होकर परिवारवालों को निश्चिंत किया जा सके। जब जीवन अनुभवशून्य होता है और आगे जाने के लिए एक डिग्री हाथ में होती है, जिसे मैं केवल एक गेटपास कहता हूं। गेटपास इसलिए कि वह केवल नौकरी के दरवाजे तक ले जाता है। इसके बाद उसकी कोई अहमियत नहीं है। जो चीज जीवन में आगे ले जाती है, वह अथक परिश्रम, असीम धैर्य और अनुभव हैं। अनुभव समय के साथ धीरे-धीरे संचित होने वाली संपदा है।

“दियासलाई’ में कैलाश सत्यार्थी नार्वे की राजधानी ओस्लो में सिटी हॉल के मंच से अपने जीवन की अनुभव संपदा के समृद्ध कोष को सबके लिए खोल रहे हैं। वह 10 दिसंबर 2014 में बर्फीली सर्दी का उनके जीवन का सबसे रोमांचकारी दिन है, जब उन्हें पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई के साथ संसार का यह प्रतिष्ठित पुरस्कार दिया गया। वे इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर निकले, कुछ समय कॉलेज में ही पढ़ाया लेकिन नियति उन्हें अलग ही दिशाओं में लेकर घूमी और एक ऐसे संवेदनशील सामाजिक मुद्दे के हाथों में उनको थमा दिया, जो सबकी निगाहों में होते हुए भी सबकी निगाहों में नहीं था।

ईंट भट्टों, खदानों और सर्कसों में दो वक्त की रोटी कमाने निकले लोग और उनके बच्चे, कालीन और काँच उद्योग की अमानवीय परिस्थितियों में काम करने वाले बच्चों के भी कोई अधिकार होते हैं, कैलाश सत्यार्थी ने इन्हें ही अपने जीवन का मिशन बनाया। किले अंदर कहे जाने वाले पुराने ऐतिहासिक विदिशा की संकरी गलियों में कैलाशजी का अपना बचपन बीता था। स्कूल की आयु में ही उनका ध्यान वंचित बेबस लोगों पर गया। पढ़ाई चलती रही मगर समाज के ऐसे कोने उन्हें अपनी ओर खींचते रहे और डिग्री पूरी करने के बाद वे इस दुविधा से बाहर भी आ गए। केवल अपनी नौकरी और अपने परिवार के पालनपोषण के सीमित लक्ष्य तक ले जाने वाली डिग्री जल्दी ही उनके लिए अर्थहीन हो गई और जीवन के विराट अर्थों की तलाश उन्हें अज्ञात मार्गों पर ले गई।

दिल्ली से प्रकाशित “जनज्ञान’ नाम की पत्रिका में वे लेख लिखा करते थे। पंडित भारतेंद्रनाथ इसके संपादक-प्रकाशक थे। 1976 में वे दिल्ली जाते हैं। जनज्ञान के कार्यालय में। यहाँ उनके जीवन में सुमेधा आती हैं। भारतेंद्रनाथजी की विदुषी बेटी, जो दो साल बाद कैलाशजी की जीवनसंगिनी बनीं लेकिन दोनों को ही नए सिरे से अपने भावी जीवन की इमारत के लिए गारा-ईंटें जुटानी पड़ीं। कहीं किराए के एक कमरे के घर में रहते हुए वे स्वामी अग्निवेश से जुड़े और उनके साथ एक पत्रिका “संघर्ष जारी रहेगा’ हरियाणा भवन से शुरू की। यह पत्रिका समाज के वंचित वर्ग के हितों का स्वर बनकर उभरी। स्वामी अग्निवेश तब विधायक बने थे।

1981 में सरहिंद के पास ईंट भट्टों में काम करने वाले बंधुआ मजदूरों में से एक वासल खान छिपकर चंडीगढ़ पहुंचा। वह अपनी जवान बेटी को बचाने की उम्मीद से निकला था। चंडीगढ़ में किसी ने कैलाश सत्यार्थी की पत्रिका का पुराना अंक थमाकर सीधा दिल्ली उनके पास ही भेज दिया। फिर उनका अपने पांच लोगों के समूह के साथ सरहिंद जाना, ईंट भट्टा मालिकों के साथ खूनी टकराव, दैनिक ट्रिब्यून में छपी खबर-आजाद भारत में आज भी गुलामी मौजूद है।

अंतत: कोर्ट-कचहरी में याचिकाएँ और वे उन बंधुआ परिवारों को मुक्त कराने में सफल हो गए। वे ज्यादातर मुस्लिम थे। “दियासलाई’ आजादी के पाँचवे दशक तक कांग्रेस के एकछत्र राज के दिनों में भारत के इस दर्दनाक पक्ष पर भी रोशनी डालती है कि करोड़ों लोग कानूनी अधिकारों से वंचित गुलामों सा जीवन जी रहे थे। उनके लिए सच्चे अर्थ में प्रभावी कानून तक नहीं थे। सब कुछ मजे से चल रहा था।

बंधुआ मुक्ति आंदोलन से निकला बंधुआ मुक्ति मोर्चा और 90 का दशक आते-आते इसी संघर्ष के गर्भ से निकला “बचपन बचाओ आंदोलन।’ जहाँ भी बंधुआ मजदूरों और बच्चों की सूचना मिलती, कैलाश सत्यार्थी अपने समूह के साथ वहाँ पहुंचने में क्षण भर भी देर नहीं करते। उन पर कई जगह जानलेवा हमले हुए। उन्हें धमकाया गया। वे ताकतवर खदान मालिक थे, कालीन उद्योग के धनीमानी लोग थे, जिनके राजनीतिक रसूख भी थे। यह टकराव निर्बल और बलशाली के बीच था।

1994 में वे कन्याकुमारी से दिल्ली तक बाल श्रम विरोधी भारत यात्रा पर निकले। दो साल बाद यूपी के विधानसभा चुनावों में उन्होंने एक बड़े अभियान के बाद 424 विधानसभा सीटों के दो हजार उम्मीदवारों से इस आशय के शपथ पत्र भरवाए कि वे चुनाव जीतने के बाद बाल मजदूरी की समाप्ति और सबको शिक्षा मुहैया कराएंगे। करीब 50 उम्मीदवारों ने मना किया तो उनकी काली सूची अलग से जारी की गई, जो मीडिया में छपी। घबराकर सबने अगले ही दिन दस्तखत किए। वे कहते हैं कि तब बच्चों का शोषण और शिक्षा एक राजनीतिक मुद्दा बना।

कैलाश सत्यार्थी लिखते हैं-“भारत की ज्यादातर सरकारें मेरे साथ न केवल अछूत की तरह बल्कि दुश्मन की तरह व्यवहार करती थीं। मेरे मुकाबले अपनी पिट्ठू संस्थाओं को बढ़ावा और आर्थिक मदद दी जाती थी। वे विदेशों तक ऐसे कार्यक्रमों के बहिष्कार की धमकियाँ देती थीं, जिनमें मुझे बुलाया जाता था। सरकार की तरफ से आईएलओ और यूनेस्को के जिनेवा और पेरिस ऑफिसों में चिटिठयाँ लिखकर मुझे वहाँ बुलाए जाने पर विरोध जताया जाता था। कई बार यह चेतावनी दी जाती थी कि भारत सरकार के मंत्री कैलाश सत्यार्थी के साथ मंच साझा नहीं करेंगे।’

मगर इन सब कानूनी लड़ाइयों, अंतर्विरोधों, संघर्षों और टकरावों का नतीजा यह हुआ कि नए-नए कानून बने। उन्हें लागू कराया गया। कैलाश सत्यार्थी ने अपनी यात्रा को भारत की सीमाओं में ही सीमित नहीं रखा। वे विश्व की संस्थाओं से जुड़े और बाल अधिकारों को लेकर विश्व मंचों पर गए। 1998 में 600 सहयोगियों के साथ जिनेवा के संयुक्त राष्ट्रसंघ भवन जा पहुंचे। यह 103 देशों से छह महीने तक 80 हजार किलोमीटर की यात्रा का अंतिम पड़ाव था। कैलाशजी ने अपने इस वैश्विक अभियान को “करुणा का भूमंडलीकरण’ कहा।

समाज के शोषित और वंचित वर्ग के लिए अब वे एक ऐसी आवाज बने, जो दुनिया भर में सुनी जा रही थी। यह यात्रा आखिरकार नोबल शांति पुरस्कार तक उन्हें ले गई, जो उन्होंने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के हवाले कर दिया। वह मैडल अब राष्ट्रपति संग्रहालय में भारत माता को समर्पित है।

“दियासलाई’ एक व्यक्ति की निजी सफलता का सफरनामा नहीं है। यह एक पथ प्रदर्शन है। इसमें कुछ सूत्र हैं। सपने देखने वाले युवाओं के लिए सूत्र। सत्यार्थी सूत्रधार की तरह अपनी कहानी कह रहे हैं। यह कहानी सबके लिए सुनने-पढ़ने लायक है।

*विजयमनोहर तिवारी
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलगुरु हैं)

इस पोस्ट को साझा करें:

WhatsApp
Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *