बदहाल शिक्षा : सुधार के लिए नीति से अधिक नीयत की आवश्यकता

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शायद ही कोई सप्ताह ऐसा गुजरता हो जिसमें बदहाल शिक्षा व्यवस्था की कोई खबर समाचार माध्यमों की सुर्खी ना बनती हो! स्कूल भवनों की बदहाली, शिक्षकों की कमी, संसाधनों -जैसे फर्नीचर और शैक्षणिक उपकरणों का अभाव और शिक्षकों के लिए नियमित प्रशिक्षण की व्यवस्था न होना जैसी समस्याएं अब शिक्षा विभाग का स्थाई भाव बन चुकी हैं।
मध्य प्रदेश के अखबारों में शिक्षा विभाग से संबंधित खबरों के कुछ शीर्षक देखिए –

‘म.प्र. के स्कूल : 9500 में बिजली नहीं, 12000 में एक शिक्षक’

‘देश में फेल होने की दर सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश में’

‘गुरुजी! 2000 में ठीक कराओ उखड़ी छत,टूटी बेंच’

‘जर्जर स्कूलों में कक्षाएं लगीं तो शिक्षकों के साथ नपेंगे डीईओ’

‘अपना ही नाम नहीं लिख पाए 9 वीं के छात्र’

व्यवस्थाएं किस स्तर तक बदहाल है इसका प्रमाण है कुछ महीने पहले मध्य प्रदेश के शिक्षा मंत्री का वह बयान जिसमें उन्होंने कहा था कि – ‘शिक्षक स्कूल नहीं जाते और अपनी जगह दूसरों को पढ़ाने के लिए किराए पर रखते हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से 500 ऐसे शिक्षकों को जानता हूं जो इस प्रकार की व्यवस्था चला रहे हैं। अकेले मेरे जिले में ही 100 शिक्षक ऐसे हैं जो स्कूल में पढ़ाने के लिए असिस्टेंट रखे हुए हैं।’

और देश को ऐसी शिक्षा व्यवस्था के दम पर अमृत काल में विकसित राष्ट्र बनने का सपना दिखाया जा रहा है। विडंबना यह है कि इस बदहाली के जिम्मेदार लोगों की बात तो छोड़िए, इसका खामियाजा भुगत रहे समाज की तरफ से भी व्यवस्था के सुधार के समर्थन में कोई आवाज़ सुनाई नहीं देती।

पता नहीं,सरकारों को यह सामान्य सी बात समझ में क्यों नहीं आती कि कमजोर शैक्षणिक बुनियाद के सहारे न तो जिम्मेदार नागरिक गढ़े जा सकते हैं,और ना ही 2047 तक देश को विकसित राष्ट्र की श्रेणी में खड़ा करने के बहुप्रचारित स्वप्न को साकार किया जा सकता है। हां,चुनावी रैलियों के लिए सुलभ भीड़ का रेला जरूर तैयार किया जा सकता है।

भारतीय शिक्षा प्रणाली को दूषित करने का दोषी लॉर्ड मैकाले को माना जाता है, जिसका घोषित उद्देश्य था अंग्रेज परस्त बाबुओं की फौज तैयार करना। लेकिन आजादी के 75 सालों के बाद भी शिक्षा प्रणाली को भारतीयता के अनुरूप ना ढाल पाने का दोष मैकाले को नहीं दिया जा सकता।
इन 75 वर्षों में देश में सक्रिय प्राय: सभी राजनीतिक दलों को सरकार में रहने का अवसर मिल चुका है। प्रायः सभी ने शिक्षा नीति को लेकर प्रयोग किए हैं, और व्यवस्था में आमूल-चूल सुधार के दावे भी किए हैं।
वर्तमान में प्रचलित राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर भी व्यापक विचार विमर्श हुआ है और इसे हर दृष्टि से देश की विविधतापूर्ण संस्कृति एवं आवश्यकताओं के अनुकूल बताया जा रहा है।

दरअसल, समस्या नीति से अधिक नीति के प्रावधानों को जमीनी स्तर पर क्रियान्वित करने वाली नीयत की है।

जरूरत शिक्षा नीति को सेमिनार हालों से बाहर निकाल कर गांव की उन प्राथमिक शालाओं तक पहुंचाने की है, जिन पर देश के भावी कर्णधारों को गढ़ने का दायित्व है। जरूरत इस बात की है कि एक-दूसरे पर दोषारोपण करने की बजाय शिक्षा को सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता में शामिल करने की पुरजोर पहल की जाए। न केवल अधोसंरचना गुणवत्तापूर्ण हो,बल्कि प्रयास हो कि शिक्षकीय कार्य करने के लिए श्रेष्ठ प्रतिभाएं प्रोत्साहित हों।

कितनी ही आकर्षक शिक्षा नीति क्यों ना अपना ली जाए,लेकिन यदि उसे क्रियान्वित करने वाली मशीनरी ही जर्जर अवस्था में होगी तो अनुकूल परिणाम कैसे प्राप्त किये जा सकते हैं?

केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने अभी हाल ही में देश की शिक्षा व्यवस्था पर एक सर्वेक्षण किया है – परख।
(Performance,assessment,review and analysis of knowledge for Holistick development – PARAKH -प्रदर्शन,मूल्यांकन, समीक्षा एवं समग्र विकास के लिए ज्ञान का विश्लेषण)

सर्वेक्षण में देशभर के 88000 स्कूलों के 23 लाख छात्रों को शामिल किया गया था,जिसमें आधारभूत अर्थात कक्षा तीसरी,प्रारंभिक अर्थात कक्षा छठी और मध्य अर्थात कक्षा नवमी के छात्रों की शैक्षणिक क्षमताओं का आंकलन किया गया।

इस सर्वेक्षण के नतीजे आंखें खोलने वाले हैं।
सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं की कक्षा तीसरी के 50% छात्र ही 100 रुपए का लेनदेन कर सकते हैं, अर्थात शेष 50% इसमें अक्षम हैं। 58% छात्र ही दो अंको का जोड़ घटाना कर पाते हैं, अर्थात 42% ऐसा नहीं कर पाते।
कक्षा छटवीं के लिए हुए सर्वेक्षण के अनुसार 51% छात्र ही मूल्यों के प्रति जागरूक पाए गए अर्थात 49% छात्रों में मूल्यों के प्रति जागरूकता का अभाव देखा गया। सिर्फ 29% छात्र ही आधा और चौथाई का मतलब समझते हैं अर्थात 71% छात्र आधा और चौथाई नहीं जानते।
कक्षा नवमी के लिए हुए सर्वेक्षण में पाया गया कि 37% छात्र ही किशोरावस्था,हार्मोनल परिवर्तन और शारीरिक देखभाल के मामलों में सामान्य समझ रखते हैं,अर्थात 63% छात्र इस बारे में कोई जानकारी नहीं रखते। 59% छात्र आंकड़ों का औसत नहीं निकाल पाते अर्थात 41% छात्र ही आंकड़ों का औसत निकाल पाने में सक्षम हैं।

परख के माध्यम से मध्य प्रदेश के शैक्षणिक परिदृश्य की जो छवि उभरी है, वह भी चिंताजनक है,लेकिन मन बहलाने के लिए कहा जा सकता है कि यदि प्रदेश टॉप फाइव में नहीं है तो बॉटम फाइब में भी नहीं है।
प्रदेश के कक्षा तीसरी,छटवीं और नवमीं के 1.40 लाख छात्रों को सर्वेक्षण में शामिल किया गया था।

सर्वे में पाया गया कि नवमी के 69% छात्र अनुपात और दशमलव का उपयोग करना नहीं जानते, 64% छात्रों को रेखा,कोण और त्रिभुज की समझ नहीं है, जबकि 69% भिन्न व पूर्णांक नहीं समझते। 60% बच्चों को 7 का पहाड़ा नहीं आता। 73% बच्चे प्रतिशत निकालना नहीं जानते।
समाज विज्ञान में भी स्थिति अच्छी नहीं है। 60% विद्यार्थी इतिहास की प्रमुख घटनाओं से अनभिज्ञ पाए गए,तो 71% को प्राकृतिक घटनाओं के कारणों के बारे में जानकारी नहीं है।

सर्वे में छटवीं के 45% बच्चे ऐसे पाए गए जिनको ना तो 100 तक की गिनती आती है और ना 10 तक का पहाड़ा। 43% छात्रों को सम और विषम संख्या का ज्ञान नहीं है,तो 56% छात्र दूरी और समय संबंधी गणनाओं में कमजोर पाए गए। 54% छात्र चांद,तारे और ग्रहों के बारे में नहीं जानते,तो इतने ही सामाजिक रिश्तेदारियों की पहचान करने में कमजोर पाए गए।
और क्यों नहीं पाए जाएंगे ,जब एक ही शिक्षक के भरोसे स्कूलों का संचालन होगा।

शैक्षणिक व्यवस्था की बदहाली के कारणों का पता लगाने के लिए किसी विशेषज्ञ समिति द्वारा अध्ययन कराए जाने की आवश्यकता नहीं है। हर कोई जानता है कि-
▪️ प्राथमिक स्तर से लगाकर उच्च शिक्षा तक शिक्षकों की कमी लगातार कई वर्षों से बनी हुई है। एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में शिक्षकों के लगभग 50000 पद खाली हैं।
▪️ जर्जर और सुविधा विहीन शाला भवन बच्चों को स्कूल जाने के प्रति हतोत्साहित करते हैं, विशेष रूप से छात्राओं को।
▪️ वैसे तो स्कूलों को ‘शिक्षा के मंदिर’ कहा जाता है, लेकिन यदि मंदिर में ज्ञान यज्ञ के लिए सूत्रधार पुरोहित (शिक्षक), पूजन सामग्री (टीचिंग एड, उपकरण आदि) नहीं होंगे;यहां तक कि बैठने के लिए आसन (फर्नीचर) की भी उचित व्यवस्था नहीं होगी, तो साधकों(छात्रों) की साधना कैसे फलीभूत होंगी?
▪️ समाज के हर तबके में मूल्यगत गिरावट आई है और शिक्षक भी समाज का ही हिस्सा हैं,अतः शिक्षकीय पेशे में आई मूल्यगत गिरावट हैरत में तो नहीं डालती,लेकिन अनपेक्षित जरूर है।
▪️ शिक्षकीय पेशे में सर्वाधिक नुकसानदेय घटना घटी है ,शिक्षक का ‘कर्मी’ अथवा ‘अतिथि’ हो जाना; फलस्वरुप ‘गुरु’ भाव का लगभग क्षरण हो गया है।
▪️ शिक्षकों के प्रशिक्षण की कोई नियमित व्यवस्था नहीं है, जिसकी वजह से शिक्षा का स्तर प्रभावित होना स्वाभाविक है।
▪️ यह भी देखा गया है कि शिक्षक नवाचारों को अपनाने के लिए उत्साही नहीं हैं,बल्कि उनमें नवाचारों के प्रति नकारात्मक भाव पाया जाता है।
▪️ राजनीतिक हस्तक्षेप भी बड़ी वजह है जिसके चलते किसी स्कूल में तो जरूरत से दो गुनी संख्या में शिक्षक पदस्थ हो जाते हैं और कहीं सैकड़ो बच्चों के लिए एक ही शिक्षक बचता है।
▪️ यदि शिक्षा के गिरते स्तर पर शिक्षकों से बात की जाए तो वह गैरशिक्षकीय कार्यों में शिक्षकों के संलग्नीकरण को इसका सबसे बड़ा कारण बताते हैं। उनका कहना है कि मतदाता सूची से लगाकर आर्थिक गणना तक और जनगणना से लगाकर सामूहिक विवाह की व्यवस्थाओं तक,हर जगह शिक्षकों की ड्यूटी लगा दी जाती है। इससे शैक्षणिक कैलेंडर प्रभावित होता है।
यद्यपि लोगों का यह भी कहना है कि यदि गैर शिक्षकीय कार्यों के लिए कोई शिक्षक साल के 3-4 महीने भी देता है और शेष 8-9 महीने अपना मूल काम करता है, तो इतना समय शैक्षणिक गुणवत्ता बनाए रखने के लिए पर्याप्त है।
▪️ यह तथ्य भी विचारणीय है कि प्राइवेट स्कूलों में औसतन ₹10000 मासिक वेतन पाने वाला शिक्षक जब बेहतर रिजल्ट दे सकता है,तो अच्छा खासा वेतन पाने वाले शासकीय स्कूलों के शिक्षकों से समाज यह उम्मीद क्यों नहीं पाल सकता?
▪️ वैसे मुद्दा तो यह भी विचारणीय है कि देश में अमीरों और गरीबों अथवा शहरी और ग्रामीण अंचल की शिक्षा व्यवस्था अलग-अलग क्यों होना चाहिए?
क्या शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता और सभी के लिए उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने के समान अवसर उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकता नहीं होना चाहिए?

कुल मिलाकर समस्या नीति से अधिक नीयत की है, वरना जिस व्यवस्था को कोसते हुए दशकों गुजर गए, उसी व्यवस्था ने न जाने कितने शीर्ष नेता,वैज्ञानिक, प्रशासनिक अधिकारी, साहित्यकार, चिकित्सक और इंजीनियर इस देश को दिए हैं।

संभावनाएं अभी भी जीवित हैं। देश में ना तो प्रतिभा की कमी है और ना ही राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देने के लिए तत्पर नागरिकों की। कमी है तो शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता का विषय स्वीकार करने के लिए आवश्यक राजनीतिक इच्छाशक्ति की ; और राजनीतिक इच्छाशक्ति जागृत होगी समाज की पहल से।

तब तक आप शिक्षकों की कमी को जल्दी ही पूरा करने के सरकारी आश्वासनों पर खुश होते रहिए और ‘परख’ जैसे सर्वेक्षणों के माध्यम से सामने आए तथ्यों को निरखते रहिए ‌!

*अरविन्द श्रीधर

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