सनातन परंपरा में अयोध्या,मथुरा,हरिद्वार,काशी,काच्ञि,अवंतिका तथा द्वारका – इन सप्तपुरियों का विशिष्ट महत्व है। इन्हें अनादि भी माना गया है और मोक्षदायिका भी। हर तीर्थ नगरी की अपनी विशिष्टता है,जिसमें किसी एक देवी-देवता का प्राधान्य है।लेकिन अवंतिकापुरी ऐसी तीर्थनगरी है जिसे विशिष्टताओं का समुच्चय होने का गौरव प्राप्त है। इस दृष्टि से अवंतिका अतिविशिष्ट तीर्थ है। इस तीर्थनगरी में ज्योतिर्लिंग स्वरूप में महाकालेश्वर भी विराजे हैं,तो शक्तिपीठ के रूप में हरसिद्धि माता भी। यह कुंभ (सिंहस्थ) नगरी भी है,तो माता पार्वती द्वारा संरक्षित सिद्धवट भी इसके अनादि होने की गवाही देता है।
लीलापुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ने अपने विद्याध्यन के लिए अवंतिका का चयन कर इसे ‘विद्यातीर्थ’ की प्रतिष्ठा प्रदान की। इतनी विशिष्टताओं की मौजूदगी के बाद यह आश्चर्य की बात नहीं है कि सनातन परंपरा में कालगणना के लिए सर्वमान्य विक्रम संवत का प्रादुर्भाव भी इसी नगरी से हुआ।
पुराणों में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण एवं वलराम का अपने कुलगुरू आचार्य गर्ग के आचार्यत्व में यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न हुआ,जिसके बाद वह अवंतिकापुरी स्थित सांदीपनि मुनि के गुरूकुल में विद्याध्ययन हेतु प्रविष्ट हुए।

सान्दीपनी मुनि काशी निवासी थे,जो तीर्थाटन करते हुए अवंतिका पहुंचे थे। यहां के साधनानुकूल वातावरण से प्रभावित होकर उन्होंने यहां गुरूकुल की स्थापना की।
श्रीमद्भागवत महापुराण में विवरण आता है –
अथो गुरूकुले वासमिच्छन्तावुपजग्मतुः।
काश्यं सान्दीपनिं नाम ह्यवन्तीपुरवासिनम्।।
यथोपसाद्य तौ दान्तौ गुरौ वृत्तिमनिन्दिताम् ।
ग्राहयन्तावुपेतौ स्म भक्त्या देवमिवादृतौ ।।
तयोद्र्विजवरस्तुष्टः शुद्धभावानुवृत्तिभिः।
प्रोवाच वेदानखिलान् सांगोंपनिषदो गुरूः।।
सरहस्यं धनुर्वेदं धर्मान् न्यायपथांस्तथा।
तथा चान्वीक्षिकीं विद्यां राजनीतिं च षड्विधाम्।।
(श्रीकृष्ण तथा बलराम गुरूकुल में निवास करने की इच्छा से सान्दीपनी मुनि के पास गए,जो अवन्तीपुर में रहते थे।दोनों भाई विधि-पूर्वक गुरूकुल में रहते थे। उस समय वे बड़े ही सुसंयत,और अपनी चेष्टाओं को सर्वथा नियमित रखे हुए थे। गुरूजी तो उनका आदर करते ही थे,भगवान श्रीकृष्ण एवं बलराम भी गुरू की उत्तम सेवा कैसे करना चाहिए, इसका आदर्श लोगों के सामने रखते हुए बड़ी भक्ति से इष्टदेव के समान उनकी सेवा करने लगे। गुरूवर सान्दीपनी उनकी शुद्धभाव से युक्त सेवा से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होनें दोनों भाईयों को छहों अंग एवं उपनिषदों के सहित सम्पूर्ण वेदों की शिक्षा प्रदान की। इनके सिवा मन्त्र और देवताओं के ज्ञान के साथ,धनुर्वेद,धर्मशाष्त्र, मीमांसा आदि वेदों का तात्पर्य बताने वाले शाष्त्र, तर्कविद्या (न्याय शाष्त्र) आदि की भी शिक्षा दी। साथ ही सन्धि,विग्रह,यान,आसन,द्वैध और आश्रय इन छहः भेदों से युक्त राजनीति का भी अध्ययन कराया।)

श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण जी ने केवल चौंसठ दिन-रात में सारी विद्याएँ सीख ली थीं –
अहोरात्रैश्चतुःषष्ट्या संयतौ तावतीः कलाः।।
कतिपय विद्वान इस अवधि को 126 दिवस मानते हैं। संस्कृति विभाग द्वारा लगाए गए मंदिर के परिचयात्मक शिलालेख में भी कृष्ण जी के आश्रम निवास की अवधि 126 दिवस अंकित हैै।
श्रीकृष्ण-सुदामा की मैत्री का साक्षी: नारायणी धाम
मुनि सांदीपनि के गुरुकुल में श्रीकृष्ण के सहपाठी थे सुदामा,जो उनके प्रिय सखा भी थे।
प्रसिद्ध भागवतकार डोंगरे जी महाराज ने कृष्ण-सुदामा मैत्री का बड़ा सुन्दर विवेचन किया है। वह कहते हैं-
’’सुदामा का अर्थ है इन्द्रियों का निग्रह (दमन) करने वाला। इंद्रियों के निग्रह के बिना न तो विद्या मिलती है, और न फलती है।सुदामा के साथ मैत्री करने वाला ही सरस्वती की उपासना कर सकता है। सुदामा सर्वोत्तम संयम का साक्षात् रूप हैं।यह संदेश देने के लिए ही शायद सुदामा के सिवाय अन्य किसी सहपाठी का उल्लेख भागवत में नहीं है।’’
श्रीमद्भागवत पुराण में,दीन-हीन सुदामा और समस्त ऐश्वर्यों के स्वामी योगेश्वर श्रीकृष्ण के मिलन का अत्यंत सरस भावपूर्ण वर्णन किया गया है।
कथा के अनुसार दीन-हीन सुदामा अपनी पत्नी सुशीला के आग्रह पर श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका उनके राजमहल में जाते हैं।सुदामा स्वभाव से ही निष्प्रह हैं। उन्हें कोई लालसा नहीं है।वह तो बस अपने आराध्य का दर्शन करना चाहते हैं।श्रीकृष्ण भावविभोर होकर उनसे मिलते हैं और दोनों मित्र गुरुकुल में साथ बिताए पलों की स्मृतियों में डूबने-उतराने लगते हैं।
उन्हें याद आती है जंगल की वह रात जब कृष्ण और सुदामा गुरू माता की आज्ञा से समिधाएं एकत्रित करने के लिए जंगल में गए थे।समिधाएं एकत्रित करते -करते शाम हो जाती है और अचानक घनघोर वर्षा होने लगती है। गहराती रात और मूसलाधार बारिश में दोनों सखा रास्ता भटक जाते हैं और जंगल में ही रात काटने का निश्चय करते हैं।
एकत्रित लकड़ियों के गट्ठर एक जगह पर रखकर दोनों पेड़ पर चढ़ जाते हैं।दिन भर के श्रम से वह क्लांत तो थे ही उन्हें भूख भी सता रही थी।
आश्रम से निकलते समय गुरु मां ने भुने हुए चने की पोटली सुदामा को दी थी।सुदामा थोड़े स्वार्थी हो जाते हैं और कृष्ण से छिपाकर अकेले ही चने खाने लगते हैं। चबाने से उत्पन्न हो रही आवाज पर श्रीकृष्ण का ध्यान जाता है। वह सुदामा से पूछते हैं,पर सुदामा साफ झूठ बोल जाते हैं कि भीगे होने की वजह से उन्हें ठंड लग रही है,जिसके कारण दांत किटकिटा रहे हैं।
डोंगरे जी महाराज इस प्रसंग में भी शिक्षा देखते हैं। वह कहते हैं -’’अकेले छिपकर खाने वाला दरिद्र हो जाता है। सुदामा को इसी कारण से दरिद्र होना पड़ा।’’
प्रातःकाल गुरू सान्दीपनी एवं आश्रम के अन्य शिष्य कृष्ण-सुदामा को ढूंढ़ते हुए जंगल में आते हैं और दोनों मित्रों को आश्रम ले जाते हैं।
ऐसी लोक मान्यता है कि वह स्थान जहां कृष्ण-सुदामा समिधाएं एकत्रित करने गए थे और रात्रि पेड़ पर गुजारी थी, उज्जैन जिले की महिदपुर तहसील का नारायणा ग्राम है,जो अब “नारायणा धाम” के नाम से विख्यात है।
प्रचलित लोक मान्यता के अनुसार गुरू सान्दीपनी जब यहां श्रीकृष्ण- सुदामा को खोजने आए थे तो उन्होंने जोर-जोर से नारायण- नारायण पुकारा था।इसी वजह से इस स्थान का नाम नारायणा पड़ा।
नारायणा धाम में कृष्ण-सुदामा की मैत्री का प्रतीक सुन्दर मंदिर बना हुआ है जिसमें दोनों की सुन्दर प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं। संभवतः यह इकलौता मंदिर है जहां कृष्ण-सुदामा के विग्रह एक साथ प्रतिष्ठित हैं।

जंगल से एकत्रित समिधाएं कृष्ण-सुदामा ने जिस स्थान पर रखी थीं उस स्थान पर दो सुन्दर वृक्ष लताएं सजीव हैं,जिन्हें कृष्ण एवं सुदामा की मौली कहा जाता है।कहते हैं कि अनावृष्टि की स्थिति में भी यह मौलियां हरी-भरी ही रहती हैं।
मंदिर यहां कब से है,यह तो ठीक-ठीक जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन वर्तमान मंदिर रानी अहिल्याबाई द्वारा निर्मित है, ऐसी जानकारी उपलब्ध होती है।
उज्जैन से लगभग 35 किलोमीटर दूर महिदपुर तहसील में स्थित नारायणा धाम तक सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है.

* अरविन्द श्रीधर

