भाषाएं जोड़ने का काम करती हैं : इंदर सिंह परमार
‘भाषाएं तोड़ती नहीं, बल्कि जोड़ती हैं।” इस संदेश के साथ राजधानी भोपाल स्थित रवीन्द्र भवन के अंजनी सभागार में दो दिनी ‘भारतीय मातृभषा अनुष्ठान’ का शुभारंभ हुआ। वीर भारत न्यास और माधवराव सप्रे संग्रहालय एवं शोध संस्थान के साझा आयोजन का शुभारंभ प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री इंदरसिंह परमार ने किया। शुभारंभ सत्र की अध्यक्षता गुजरात साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष पद्मश्री विष्णु पंडया ने की।
इस अवसर पर अपने संबोधन में मुख्य अतिथि इंदरसिंह परमार ने कहा कि भाषाएं आपस में एक दूसरे को जोड़ती हैं, इस अनुष्ठान के माध्यम से यह संदेश मध्यप्रदेश की धरती से देश ही नहीं पूरी दुनिया में जायेगा। उन्होंने जानकारी दी कि मध्यप्रदेश के सभी सरकारी विश्वविद्यालयों में भारतीय भाषाएं पढ़ाने की व्यवस्था की जाएगी। विद्यार्थियों को कोई एक भारतीय भाषा को पढऩे के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इससे भाषायी सौहार्द तो पैदा होगा ही,अन्य प्रदेशों में जाने पर वहां की परिस्थितियों से सामंजस्य बैठाने में भी विद्यार्थियों को सहायता मिलेगी।आने वाले समय में यह व्यवस्था निजि विश्विद्यालयों में भी किये जाने का विचार है।
उन्होंने कहा कि मप्र ही वह राज्य जहां से इस मिथक को तोड़ा गया कि चिकित्सा और तकनीक जैसे विषयों की पढ़ाई ‘हिंदी’ में नहीं हो सकती। हमने इस दुरुह कार्य को भी कर दिखाया। आज प्रदेश में इन विषयों की पढ़ाई हिंदी में हो रही है।
नई शिक्षा नीति की चर्चा करते हुए मुख्य अतिथि ने कहा कि इसके तहत विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा से परिचित कराने का प्रयास किया जा रहा है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में पद्मश्री विष्णु पण्डया ने कहा कि भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है,यह एक-दूसरे से जुडऩे का सशक्त जरिया है। उन्होंने कहा कि जब एक स्थान के भाषा-भाषी दूसरे स्थान की यात्रा करते हैं तो वे अपने साथ वहां की भाषा भी लेकर जाते हैं। इसका सबसे सशक्त उदाहरण मीराबाई हैं। वे राजस्थान से चलकर द्वारका तक पहुंची। उनकी रचनाओं का अवलोकन करें तो उसमें इस बीच पडऩे वाली भाषाओं के शब्द सहजता से पाये जाते हैं। उनकी पूरी यात्रा भाषाओं के समन्वय का ही प्रमाण हैं। श्री पण्डया ने हिंदी के क्षेत्र में प्रदेश सरकार और सप्रे संग्रहालय द्वारा किये जा रहे प्रयासों की सरहाना भी की।
सत्र में विशेष रूप से उपस्थित हिंदी विद्वान डॉ. सूर्यप्रकाश दीक्षित ने कहा कि भारतीय भाषाओं के बीच सौहार्द का भाव जगाना होगा। इसमें इस तरह के आयोजन कारगर हो सकते हैं। उन्होंने कहा अंग्रेजों ने भाषा को बांट दिया था आज भी भाषाएं राज्यों तक ही सीमित हो गई हैं। उन्होंने सभी भाषाओं को मिलाकर एक भारतीय भाषा ज्ञान कोष बनाने का सुझाव देते हुए हिंदी भाषी प्रांतों से पर्याप्त उदारता का भाव रखने का आग्रह भी किया।
इसके पूर्व वीर भारत न्यास के न्यासी सचिव श्रीराम तिवारी ने कहा कि आज भारत में करीब सात हजार से ज्यादा भाषाएं और बोलियां हैं, इनकी संख्या तेजी से विलुप्त होती जा रही है। यह भाषाएं और बोलियां किस तरह से पुर्नजीवित हों,यही इस मातृभषा अनुष्ठान को उद्येश्य है।
संस्कृति संचालक एनपी नामदेव ने कहा कि प्रदेश सरकार के प्रयास हैं कि हिंदी का महत्व देश-दुनिया में स्थापित हो।
आरंभ में सप्रे संग्रहालय के संस्थापक निदेशक पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने आयोजन की रूपरेखा रखते हुए कहा कि “अपनी भाषा पर अभिमान- सब भाषाओं का सम्मान” इस उद्घोष के साथ यह अनुष्ठान हो रहा है, जो निरंतर जारी रहेगा। सभी भारतीय भाषाएं सांस्कृतिक, साहित्यिक और शैक्षिक दृष्टि से समृद्ध हैं। इन सभी को पर्याप्त सम्मान देते हुए आपस में सौहार्द का भाव पैदा होना चाहिए। इससे हर भाषा-भाषी का गौरव बढ़ेगा और राष्ट्र का गौरव भी बढ़ेगा।

उन्होंने बताया कि सप्रे संग्रहालय और वीर भारत न्यास की इस पहल को हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति,वर्धा जैसी हिंदी के क्षेत्र में कार्य करने वाली अखिल भारतीय संस्थाओं का समर्थन प्राप्त है।
शुभारंभ सत्र के तत्काल बाद ‘विभिन्न भारतीय भाषाओं और हिंदी के बीच अंतरसंबंधों’ तथा ‘भारतीय भाषा एवं प्रौद्योगिकी’जैसे विषयों पर विमर्श हुआ।
चर्चा में डॉ. उषारानी राव,(कन्नड़),डॉ. के.वनजा (मलयाली),डॉ. पी. मणिक्यांबा(तमिल )तथा कृपाशंकर चौबे ने बांग्ला भाषा और हिंदी भाषा के बीच अंतरसंबंधों पर वक्तव्य दिये। सभी वक्ताओं की राय थी कि हिंदी और अन्य भाषाओं के शब्दों में बहुत कुछ शब्द मिलते जुलते है। इन सबको जोडऩे में अनुवाद महती भूमिका निभा सकता है।
इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामवल्लभ आचार्य द्वारा रचित भाषाई समृद्धि पर केंद्रित गीत की प्रस्तुति भी हुई। अंत में पूरे सत्र का समाहार साहित्यकार डॉ. प्रभुदयाल मिश्र ने दिया। इस सत्र का संचालन पत्रकार अजय बोकिल ने किया।
कार्यक्रम स्थल पर प्रदर्शनी भी आयोजित की गई ह, जिसमें वीर भारत न्यास द्वारा तैयार की गयी ‘भारतीय भाषा आलोक- कालजयी साहित्यकारों की छवियाँ’, स्वराज संस्थान संचालनालय की ‘कलम के सिपाही’ एवं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की ‘सदी साक्षी है’ प्रदर्शनियां शामिल हैं।
दूसरे सत्र में भारतीय भाषा एवं प्रौद्योगिकी विषय पर आचार्य डॉ. शिवशंकर मिश्र की अध्यक्षता में वक्तव्य हुए। इसमें हिंदी एवं प्रौद्योगिकी विषय पर टैगोर विवि के कुलपति डॉ. संतोष चौबे ने कहा कि यह भ्रम फैलाये गये कि हिंदी में तकनीक के क्षेत्र में काम नहीं हो सकता, लेकिन ऐसा नहीं है।

नाटक और सिनेमा की भाषा पर अभिनेता एवं रंगकमी राजीव वर्मा ने कहा कि नाटक और सिनेमा की भाषा दैहिक ही है। एक अभिनेता अपने अभिनय से ही बहुत कुछ कह जाता है। नृत्य और संगीत की भाषा पर कला समीक्षक विनय उपाध्याय ने सारगर्भित और प्रभावी उद्बोधन दिया। जनजातीय एवं घुमंतु भाषा-संचार पर लोककला मर्मज्ञ डॉ. धर्मेन्द्र पारे ने वक्तव्य दिया। सत्र का संचालन डॉ. जवाहर कर्नावट ने किया।

