वैदिक सभ्यता और आर्य संस्कृति को टटोलता प्रमोद भार्गव का उपन्यास ‘आर्यावर्त’

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वैदिक काल और उससे जुड़ी आर्य सभ्यता को लेकर इतिहासकार एकमत नहीं हैं। भारतीय इतिहासकारों की मीमांसा और पाश्चात्य अवधारणाओं में विरोधाभास के बीच इस जटिल विषय पर एक रोचक उपन्यास हाल में छपकर आया है। ‘आर्यावर्त’ नामक यह उपन्यास विज्ञान लेखन के सशक्त हस्ताक्षर प्रमोद भार्गव की ताज़ा कृति के रूप में पाठकों तक पहुँचा है। इससे पहले उनका विज्ञान सम्मत आया उपन्यास ‘दशावतार’ भी काफ़ी चर्चित रहा है, जिसमें भगवान विष्णु के दस अवतारों को एक नई विज्ञान सम्मत दृष्टि से जानने और समझने का प्रयास लेखक ने किया है।
‘आर्यावर्त’ में लेखक ने वैदिक सभ्यता और आर्य संस्कृति के संदर्भ में ऋग्वेद में वर्णित विभिन्न कुलों के परस्पर संघर्ष की भूमि को आर्यावर्त निरूपित करते हुए रूपकों का ताना-बाना बुना है।आर्यावर्त के निवासी कितनी पतवारों की नाव, कैसी बैलगाड़ी और किस प्रकार के रथ व अस्त्र शस्त्रों का प्रयोग रणभूमि में करते थे? इन बारीक जिज्ञासाओं के संदर्भों में यह उपन्यास पाठकों को मानव सभ्यता के अतीत में ले जाकर उदात्त अनुभूति कराता है। साथ ही ब्रह्मांडीय विज्ञान,रसायन,वनस्पति और अग्नि की उत्पत्ति के आधार सूत्र इस उपन्यास ऋग्वेद के मंत्रों के माध्यम से अभिव्यक्त हैं।
प्रलय काल में मनु से प्रारंभ होकर यह सिलसिला ब्रह्मा, विष्णु ,इन्द्र, सूर्य, चन्द्र, वरुण,मित्र, शिव,अश्विनी कुमार, उर्वशी, च्यवन, अथर्वा, बृहस्पति, श्वेतकेतु होते हुए पुनः प्रलय पर आकर थम जाता है। लेखक ने अपनी इस कृति को भारतीय आर्य, वैदिक सभ्यता की स्थापना, संघर्ष, इतिहास, भूगोल, स्त्री-स्थिति और ब्रह्माण्डीय विज्ञान की औपन्यासिक कथा निरूपित किया है।

 उम्र के सोपान चढ़ता जीवन कुछ ऐसी होनी-अनहोनी घटनाओं से गुजरता है, जो अचंभित करती हैं। मनुष्य इनकी परिणति भाग्य-दुर्भाग्य और प्रारब्ध में देखता है। निरंतर गतिशील ब्रह्मांड में एक आश्चर्यजनक अनुशासन है। इस गतिशील अनुशासन पर किसका नियंत्रण है? कोई नहीं जानता। यह संशय है, सो ईश्वर है। धरती, आकाश, अग्नि, जल और वायु इन पंच तत्वों का संतुलन गड़बड़ाने पर प्रकृति ऐसा कोलाहल भरा तांडव रचती है, जिसकी प्रलय लीला मनुष्य के समस्त भौतिक-अभौतिक विज्ञान सम्मत विकास को लील जाती है। बचा मनुष्य फिर इसी दिशा में चल पड़ता है..। यानी, सृष्टि का एक क्रम है, जो अनवरत गतिमान कालचक्र का हिस्सा है।
 भारतीय जीवन की यही जिजीविषा इस उपन्यास की धुरी है। लेखक ने इन्हीं पंच तत्त्वों के केंद्रीय पात्रों के इर्द-गिर्द उपन्यास का कथानक रचा है। कथाओं और कई अंतर्कथाओं की सरल रूप में रोचक प्रस्तुति पाठक की उपन्यास को आगे पढ़ने की जिज्ञासा बनाए रखती है। लोक में प्रचलित जो ईश्वर, देवता और दानव हैं, वे सब मानव रूपों में हमें अपने अस्तित्व निर्माण के संघर्ष में आर्यावर्त की धरती पर दिखाई देते हैं। इन सभी पात्रों की मानव सभ्यता और ऋग्वैदिक संस्कृति के विकास में क्या अहम भूमिका रही है, उससे हम परिचित होते चलते हैं। इसी क्रम में आर्यावर्त का भूगोल निर्मित करती नदियों के तट पर हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के वे दुर्ग हैं, जिनके अवशेषों के माध्यम से दुनिया के पुरातत्ववेत्ता और इतिहासज्ञ भारतीय सभ्यता और संस्कृति अपने मूल में अन्य सभ्यताओं से कहीं प्राचीन स्थापित न हो जाए इस कारण काल्पनिक तथ्य उकेर कर  खलल डालते रहते हैं। लेकिन विद्वान लेखक अपनी बात कहने में कहीं विचलित मालूम नहीं पड़ते हैं। 
 अतएव लेखक प्रमोद भार्गव अपने विशद अध्यन तथा ऋगवेद के आधार पर अपनी स्थापनाएं निसंकोच देते चलते हैं। अनार्यों के बाहर से आक्रामक के रूप में आने की मनगढंत मान्यता को वे सिरे से नकारते हैं।आर्यावर्त की भूमि पर रह रहे आर्यों-अनार्यों के भीषण युद्ध को वे दाशराज्ञ युद्ध के रूप में ऋगवेद के मंत्रों से चित्रित करते हैं।इस युद्ध में किन-किन आर्य एवं अनार्य राजाओं के समूह आपस में लड़े, यह इस उपन्यास में तार्किक रूप में प्रस्तुत है। लेखक ने हड़प्पा को ऋग्वेद में वर्णित 'हरियूपिया' बताया है। इंद्र यहां के सम्राट को किस रणनीति से पराजित करते हैं, यह सब तथ्यात्मक रूप में प्रस्तुत है।चूँकि उपन्यास की विषय वस्तु गंभीर एवं कुछ हद तक जटिल सी है, अतः लेखकीय प्रवाह बनाये रखने की चुनौती लेखक के सामने अवश्य रही होगी, लेकिन प्रमोद भार्गव अपने लेखकीय कौशल से जटिलताओं को दूर करते चलते हैं।
 लगभग चार सौ पृष्ठों के इस उपन्यास को लेखक ने इतिहास को इतिहास की दृष्टि से देखने वाले दृष्टा- जयशंकर प्रसाद, डॉ. संपूर्णानंद, डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. हरिहर निवास द्विवेदी और श्री ब्रजवासी लाल की इतिहास परंपरा को सादर समर्पित किया है। इससे स्पष्ट है कि लेखक वाद या विचार के स्तर पर पाश्चात्य एवं वामपंथी विद्वानों की कल्पित धारणाओं से कतई प्रभावित नहीं दिखते हैं। लेखक ने अंत में उन विद्वान लेखकों की पुस्तकों की संदर्भ सूची भी दी है, जिनका विशद अध्ययन इस उपन्यास को रचने का आधार बना। इससे ज्ञात होता है कि लेखक ने कड़ी मेहनत की है।
 मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी समेत विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं एवं संगठनों द्वारा सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार प्रमोद भार्गव की कहानियां दशकों तक नवभारत टाइम्स, धर्मयुग, समकालीन भारतीय साहित्य, हंस, जनसत्ता सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं, जो उनकी रचनात्मकता के अभिलेखीय प्रमाण हैं। ‘दशावतार’ के अलावा उनका एक अन्य उपन्यास ‘अनंग अवतार में चार्वाक’ भी चर्चित रहा है। उनके प्रकाशित कहानी संग्रहों में ‘पहचाने हुए अजनबी’ ‘शपथ पत्र’ ‘लौटते हुए’ ‘मुक्त होती औरत’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ‘पुरातन विज्ञान’ और ‘इक्कीसवीं सदी का विज्ञान’ 'भविष्य का विज्ञान' तथा ‘जल प्रदूषण’ 'वायु प्रदूषण' और ‘पर्यावरण प्रदूषण’ शीर्षक से आई पुस्तकों से उनके अनुभवी विज्ञान लेखन की झलक मिलती है। वहीं ‘आम आदमी और आर्थिक विकास’ ‘भाषाई शिक्षा के बुनियादी सवाल’ ‘मीडिया का बदलता स्वरूप’ ‘वन्यप्राणियों की दुनिया’ ‘1857 का लोक संग्राम और रानी लक्ष्मीबाई’ ‘सहरिया आदिवासी: जीवन और संस्कृति’ जैसी पुस्तकों से बहुविध लेखन में दक्षता का प्रमाण मिलता है।

पुस्तक का नाम: आर्यावर्त (उपन्यास)
लेखक: प्रमोद भार्गव
प्रकाशकः प्रकाशन संस्थान, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य: पेपर बैक ₹400 सजिल्द ₹800
पृष्ठ संख्या: 386

-विनोद नागर (वरिष्ठ लेखक, समीक्षक एवं स्तंभकार)

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