सनातन धर्म-संस्कृति में लक्ष्मी सारे संसार का पालन-पोषण करने वाली देवी हैं। वे भगवती अर्थात् धर्म, अर्थ, ज्ञान, यश, श्री और वैराग्य रूपी षड् ऐश्वर्य से सम्पन्न हैं अतः सारे जगत् को ऐश्वर्यवान करती हैं। लक्ष्मी सर्वव्यापी हैं इसीलिए देवी भागवत में उनकी वंदना करते हुए कहा गया है कि ‘प्राणी मात्र के प्रति प्रेम के कारण वे नारियों में प्रधान हैं। देवताओं के स्वर्गलोक में वे स्वर्गलक्ष्मी हैं तो राक्षसों के पाताललोक में नागलक्ष्मी हैं। राजाओं के लिए राजलक्ष्मी हैं तो गृहस्थों के लिए गृहलक्ष्मी हैं। वे ही गायों की जननी सुरभि हैं और यज्ञ की पत्नी दक्षिणा हैं। वे कमलिनियों में श्री रूप से और चंद्रमा में शोभा रूप से प्रतिष्ठित हैं। भूषण, रत्न, फल, जल, राजा, रानी, स्त्री, घर,अन्न, वस्त्र, शुचिस्थल, देवप्रतिमा, मंगल कलश, पुष्पमाला, दुग्ध, चंदन, सुरम्य वृक्ष और जल से भरे मेघों सहित जहाँ कहीं भी सौंदर्य, सुगन्ध, सुख, समृद्धि, पुष्टि और प्रकाश से प्राणी मात्र के जीवन की ज्योति जगमग है, सब लक्ष्मीमय हैं।’ स्वयं लक्ष्मीकांत नारायण उनके महात्म्य बताते हुए गाते हैं ‘लक्ष्यते दृश्यते विश्वं स्निग्धदृष्ट्या ययानिशम्। देवीभूता च महती महालक्ष्मीश्च सा स्मृता।।’ अर्थात् सारे संसार का अपनी स्नेहमयी दृष्टि से निरंतर संरक्षण करने के कारण ही ये देवी भगवती महालक्ष्मी हैं।
लक्ष्मी सौभाग्य, सौंदर्य और सम्पदा की पर्याय और प्रतीक हैं। उनके नाम का अर्थ अत्यंत व्यापक है किंतु इसके केंद्र में ‘लक्ष्य’ है। अर्थात् जो सबके कल्याण का लक्ष्य करती हैं अथवा जो सबको उनके मंगलमय लक्ष्य की ओर प्रेरित करती हैं, वे लक्ष्मी हैं। वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश की त्रिमूर्ति की तीन शक्तियों में एक होकर महासरस्वती और महाकाली के साथ शक्ति-त्रिमूर्ति को पूर्ण करती हैं। शास्त्रों के अनुसार त्रिगुणात्मक सृष्टि में सरस्वती सृजक ब्रह्मा की सत्त्व शक्ति और महाकाली संहारक महेश की तम शक्ति हैं तो महालक्ष्मी पालक विष्णु की राजस शक्ति हैं। उनके बिना विष्णु के लिए जगत् का पालन असम्भव है अतः वे विष्णु की शास्त्रोक्त अर्धांगिनी होकर जगत् की पूज्य हैं। देवता से दानव तक तीनों लोक उनकी कृपा का आकांक्षी रहता है। वे विमुख हो जाए तो राजा एक पल में रंक बन जाता है और यदि वे कृपावन्त हो जाए तो रंक राजा हो जाता है। भूलोक में सुख, सुविधा और समृद्धि की कामना से भरे मनुष्य नित्य देवी महालक्ष्मी की कृपा के लिए उनकी स्तुति में करबद्ध रहते हैं। कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की अमावस्या इन्ही महिमामय महालक्ष्मी की पूजा का महापर्व है जो दीपोत्सव के रूप में प्रतिष्ठित है।
महालक्ष्मी आद्य शक्ति होकर आदि, अनादि और अनन्त हैं फिर भी उनके प्राकट्य की विविध कथाएँ पुराणों में कही गई हैं। इनमें सर्वाधिक चर्चित और लोकप्रसिद्ध सागरमन्थन के अवसर पर लक्ष्मी का प्राकट्य है। यह कथा पुराणों सहित रामायण व महाभारत में भी है मगर इसका सर्वाधिक सरस चित्रण श्रीमद्भागवत महापुराण में प्राप्त होता है। इस पुराण के आठवें स्कन्ध की कथा के अनुसार अमृत की कामना के लिए देवताओं व दानवों के संयुक्त सागरमन्थन में अन्य रत्नों के साथ देवी लक्ष्मी प्रकट हुई। पुराणकार लिखते हैं ‘वे देवी लक्ष्मी भगवान की नित्य शक्ति हैं। उनकी बिजली के समान चमकीली छटा से दिशाएँ दमक उठी। देवताओं और दानवों ने उनका अभिनन्दन किया। पृथ्वी ने अभिषेक के लिए औषधियां अर्पित की। गौओं ने पंचगव्य तथा वसन्त ने मधुमास के फल-फूल भेंट किए। उनके सम्मान में मंगल वाद्य बजाए गए और अप्सराओं ने नृत्यांजलि दी। जब देवी लक्ष्मी हाथ में कमल लेकर कमलासन पर विराजमान हो गई तब दिग्गजों ने मंगलकलशों से उनका अभिषेक किया। सागर ने पीले रेशमी वस्त्र, वरुण ने वैजयंतीमाला, प्रजापति ने आभूषण, सरस्वती ने मुक्तामाला, ब्रह्मा ने कमलपुष्प तथा नागों ने कुंडल समर्पित किए। हर कोई उनके वरण का अभिलाषी था किंतु देवी स्वयं के आश्रय के लिए निर्दोष और गुणवान की इच्छुक थी। अंततः देवी ने सर्वथा निर्दोष, गुणागार और सबके लिए कल्याणकारी भगवान विष्णु का स्वयं वरण किया तथा लोककल्याण के संकल्प के साथ सदा के लिए उनके आश्रित हो गए। इस अर्थ में यह कथा संकेत है कि लक्ष्मी गुणवान और परोपकारी को ही प्राप्त होती है। अतः लक्ष्मी की कामना से पूर्व स्वयं को गुण और सेवा का पात्र बनाने का प्रयास करना चाहिए।
देवी लक्ष्मी के सागर जल से प्राकट्य की कथा प्रतीकात्मक है जिसमें लक्ष्मी के गूढार्थ निहित हैं। सागरमन्थन की पुराणोक्त विभिन्न कथाओं में अमृत से पूर्व विभिन्न रत्नों के जल से निकलने का उल्लेख हैं। कहीं इन रत्नों की संख्या 14 हैं तो कहीं इससे अधिक। प्रकार और क्रम में भी अंतर है मगर सर्वप्रथम विष, अंत में अमृत और दोनों के बीच लक्ष्मी के प्राकट्य पर सारी कथाएँ एकमत हैं। दूसरे अर्थों में अश्व-सी गति, गज-सा वैभव, अप्सराओं-सा सौंदर्य, जीवनदायिनी औषधि आदि सब कुछ जल से ही सम्भव है। जल जीवन का आधार और जीवन का उत्स है। यह प्रदूषित हो तो प्राणघातक हलाहल विष बन जाता है और निर्मल हो तो जीवनदायक अमृत बन जाता है। जीवन से मृत्यु के इस जगत् व्यवहार के केंद्र में लक्ष्मी है अतः वे दोनों के मध्य में होती है। रूप, धन, रत्न, अन्न, औषधि सबकी सत्ता जल से है अतः सब लक्ष्मी के ही विविध रूप हैं। अष्टलक्ष्मी में लक्ष्मी का एक सम्बोधन धान्य लक्ष्मी जल की सुलभता से उत्पन्न होने वाले अन्न का ही द्योतक है। जल प्रसूता होकर लक्ष्मी जीवन मात्र की ज्योति है। जल से जन्मी ये देवी जीवन के उत्स, संरक्षण और समृद्धि की प्रतीक हैं। उनके द्वारा क्षीरसागर निवासी नारायण का वरण जल की देवी का जल के देवता से ही महामिलन है। दोनों के केंद्र में जीवन का आधार जल है, इसीलिए वे जीवन के पालन, पोषण और संरक्षण में समर्थ होते हैं। इन प्रतीकों के माध्यम से लक्ष्मी संकेत करती हैं कि यदि धरती पर जीवन की ज्योति को जगमग रखना है तो जल की स्वच्छता और संरक्षण के प्रति सजग रहो। सच्चे अर्थों में जीवन जल के सदुपयोग के प्रति हमारी सजगता ही लक्ष्मी की असल आराधना है। महाभारत के अनुशासन पर्व में लक्ष्मी-रुक्मिणी संवाद में स्वयं लक्ष्मी ने इन सूत्रों का उपदेश दिया है। जिनका सार है जिस क्षेत्र में पर्याप्त और पवित्र जल की सुलभता होती है वहाँ लक्ष्मी का वास होता है। इसके उलट जहाँ जल का अभाव हो अथवा जल की पवित्रता भंग हो जाए, लक्ष्मी उसका त्याग कर देती है।
सनातन धर्म की मान्यताओं में स्त्री शक्ति है और उसके तीन प्रधान रूप सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा हैं। महत्वपूर्ण यह कि इस पौराणिक विश्वास में स्त्री का स्थायी रूप लक्ष्मी का ही है। असमंजस की अवस्था में पथप्रदर्शक होते हुए वह सरस्वती होती है और रक्षा का अवसर आने पर अपना उग्र रूप प्रकट करते हुए वह दुर्गा बनती है। अन्यथा शेष अवसरों पर, उसका मौलिक रूप लक्ष्मी ही है। मानो स्त्री मात्र लक्ष्मी स्वरूपा है और उच्चतम शोभा, श्री और सौभाग्य बन लक्ष्मी ही स्त्रियों में प्रतिबिंबित होती हैं। तभी तो भारतीयों के बीच घर में कन्या का जन्म लक्ष्मी का आगमन माना जाता है। सप्तपदी की बेला में मंगल चिन्हों और वस्त्राभूषण से विभूषित हो वर के साथ बैठी वधु लक्ष्मी की प्रतीक होती है और पाणिग्रहण के पश्चात ससुराल में गृहलक्ष्मी कही जाती है। मातृत्व से अलंकृत होकर वह सन्तान लक्ष्मी के अष्टलक्ष्मी वर्णित एक नाम को सार्थक करती है तो अपनी सूझबूझ, श्रम, सेवा और समर्पण से पूरे कुल के मान-मर्यादा की रक्षाकर अपने विजयलक्ष्मी सम्बोधन को सार्थक करती है। विष्णु के रामावतार में श्रीराम की पत्नी सीता और कृष्णावतार में श्रीकृष्ण की पटरानी रुक्मिणी लक्ष्मी का ही अवतार हैं। कृष्णप्रिया राधा और महाभारत की द्रौपदी भी लक्ष्मी अथवा उनका अंश मानी गई हैं। ये सभी देवियाँ प्रेम, करुणा, त्याग, तपस्या, सेवा और समर्पण की प्रतीक हैं। पुराणों में लक्ष्मी के साथ इन देवियों की अभिन्नता का अर्थ है कि स्त्री का हर श्रेष्ठतम रूप लक्ष्मी है। वह स्वयं श्रेष्ठतम है अतः हर युग, हर अवतार में वह अपने आश्रय के लिए श्रीराम और श्रीकृष्ण की तरह पुरुषश्रेष्ठ का ही चयन करती है। रामकथा में स्वयंवर के अवसर पर अनेक राजा-राजकुमारों में देवी सीता ने श्रीराम के वरण की लालसा व्यक्त की है तो कृष्ण कथा में रुक्मिणी ने सन्देश भेजकर कृष्ण को पाणिग्रहण के लिए पुकारा है। दोनों लक्ष्मी का अवतार हैं और दोनों अन्य अनेक पुरुषों की उपेक्षा कर श्रेष्ठतम की कामना करती है। जो प्रतीक है कि लक्ष्मी सदा श्रेष्ठ की होना चाहती है। स्त्री के संदर्भ में जो प्रेम और सम्मान दे उसकी और धन के सन्दर्भ में जो उसका सदुपयोग करें उसकी। संकेत यह कि जो लक्ष्मी अर्थात् धन का लोकहित में उपयोग करता है, उसके पास लक्ष्मी ठहरती है। जो उसका उपयोग केवल स्वहित, भोग-विलास या विनाश के लिए करता है, उसका वैसे ही त्याग कर देती है जिस प्रकार महाभारत कथा में लक्ष्मी ने असुरों का त्याग कर दिया था।
लक्ष्मी का प्राचीनतम उल्लेख ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में प्राप्त होता है। ‘श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च’ वाले इस सूक्त का भावार्थ है कि हे परमेश्वर! अनन्त शोभास्वरूप श्री और अनन्त शुभ लक्षणों से युक्त लक्ष्मी दोनों आपकी पत्नी हैं। अर्थात् जैसे स्त्री पति की सेवा करती है, उसी प्रकार आपकी सेवा आप ही को प्राप्त होती है, क्योंकि आपने ही सारे जगत् को शोभा और शुभ लक्षणों से सजाया हुआ है। इस अर्थ में पुरुष की सेवाभावी जीवनसंगिनी उसकी वास्तविक लक्ष्मी है। आगम संहिताओं के अनुसार सर्वोत्तम अवस्था में विष्णु और उनकी शक्ति लक्ष्मी हैं। जिसका दूसरा अर्थ है कि यदि पुरुष अपने कर्म, आचरण, समर्पण और व्यवहार में सर्वोत्तम हो तो उसकी स्त्री उसके लिए लक्ष्मी सिद्ध होकर उसकी शक्ति बन जाती है। कदाचित गृहस्थों के दाम्पत्य को मंगलमय बनाने के लिए ही इस तरह की व्याख्याएँ हमारे शास्त्रों में व्यक्त हुई है और इसीलिए प्रायः हर पल को लक्ष्मी का पूजन मुहूर्त माना गया है। लक्ष्मी पूजा के अनेक व्रत वर्णित हैं। फाल्गुन पूर्णिमा लक्ष्मीनारायण व्रत के अनुष्ठान का दिन है तो कार्तिक मास में कृष्ण सप्तमी से एकादशी तक लक्ष्मीप्रदव्रत का विधान है। हर पंचमी को उपवास रख लक्ष्मी पूजा लक्ष्मीव्रत का एक अलग प्रकार है। आश्विन पूर्णिमा अर्थात् शरद पूर्णिमा प्रमुख रूप से लक्ष्मी को समर्पित एक महारात्रि है। इसे कोजागर्ति पूर्णिमा भी कहते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस रात्रि को लक्ष्मी घर-घर जाकर पूछती है, ‘कोजागर्ति?’ अर्थात् कौन जाग रहा है ? जो जागते हुए दिखाई देते हैं, देवी उन पर कृपा करती हैं और जो सोते पड़े हो, उनकी उपेक्षा कर चली जाती है। इसलिए इस रात जागरण करते हुए श्वेत वस्तुओं से लक्ष्मी पूजन की परम्परा है। इसका संकेत है कि जो सदैव जागृत रहते, कर्मरत रहते हैं, लक्ष्मी उन पर कृपा करती है और इनके उलट जो आलसी, प्रमादी और निद्राप्रिय होते हैं, उनकी उपेक्षा कर देती है। ध्यान रहे सागरमन्थन के दौरान लक्ष्मी कार्तिक अमावस्या को प्रकट हुई, ऐसा किसी शास्त्र में उल्लेख नहीं है किंतु लोकमान्यता में आज दीपावली ही लक्ष्मी पूजन का महापर्व है।

डॉ. विवेक चौरसिया
(लेखक पौराणिक,सांस्कृतिक विषयों के गहन अध्येता हैं)ः

