नहीं रहे,रूपहले पर्दे पर हास्य का नया व्याकरण गढ़ने वाले गोवर्धन असरानी

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छोटे पर्दे पर कपिल शर्मा का कॉमेडी शो बहुत लोकप्रिय है। कुछ महीनों पहले फिल्म जगत के जाने-माने हास्य कलाकार इस शो में आए थे। असरानी भी उनमें से एक थे। एक तो कपिल शर्मा जैसे बेजोड़ स्टैंडअप कॉमेडियन का प्रत्युत्पन्नमति हास्यबोध और उसपर फिल्म जगत के दिग्गज हास्य कलाकारों की उपस्थिति ; एपिसोड को अविस्मरणीय होना ही था। लेकिन जिन्होंने भी उस एपिसोड को देखा है वह इस बात से सहमत होंगे कि उस दिन महफिल तो असरानी ने ही लूटी थी। जिस उत्साह और ऊर्जा के साथ वह अपने फिल्मी सफ़र के किस्से सुना रहे थे, लगता नहीं था कि बहुत जल्दी वह हम सभी को अलविदा कहने वाले हैं।

फिल्म जगत के रूपहले पर्दे को अपने बेमिसाल अभिनय से प्रकाशित करने वाले इस बेजोड़ कलाकार के दिये की लौ ऐन दिवाली के दिन(20 अक्टूबर 2025) बड़ी खामोशी के साथ परमसत्ता की दिव्यज्योति के साथ एकाकार हो गई।

1 जनवरी 1941 को जयपुर में जन्मे गोवर्धन असरानी की कला यात्रा का शुभारंभ जयपुर से ही हो गया था। महाविद्यालयीन शिक्षा के बाद उन्होंने ‘जुलियस सीजर’जैसे नाटकों में अभिनय करने के साथ-साथ जयपुर आकाशवाणी में भी थोड़े समय के लिए काम किया।

अभिनय को पूर्णकालिक कैरियर बनाने का सपना लिए वह 1962 में मुंबई आए और अभिनय की बारीकियां सीखने के लिए उन्होंने पुणे स्थित फिल्म संस्थान में दाखिला लिया। प्रशिक्षण प्राप्त करने के उपरांत फिल्मों में काम पाने के लिए उन्हें स्ट्रगल भी करना पड़ा।
उस दौर के बेहद रोचक किस्से असरानी सुनाया करते थे। एक साक्षात्कार के दौरान ऐसा ही एक किस्सा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि एक बार ख्यात निर्माता निर्देशक एल बी प्रसाद को उन्होंने अपने प्रशिक्षण काल में प्रोजेक्ट वर्क के रूप में बनाई कुछ फिल्में इस उम्मीद के साथ दिखाईं कि शायद उनकी फिल्मों में काम मिले। लेकिन फिल्म देखकर एलबी प्रसाद की प्रतिक्रिया उत्साहजनक नहीं रही। उन्होंने कहा- “भाई क्या रोल दें आपको ? कुछ समझ में नहीं आता… हीरो आप लगता नहीं! विलेन हमारे पास बहुत हैं! कैरेक्टर आर्टिस्ट की कमी नहीं! मैं क्या रोल दूं आपको?… बेहतर है आप वापस जाओ!”
लेकिन असरानी वापस आने के लिए मुंबई नहीं गए थे। पुणे फिल्म संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त करने के उपरांत उन्हें पहली फिल्म पाने में भले ही 5 साल लग गए हों, लेकिन एक बार रूपहले पर्दे पर आने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा,और 350 से अधिक फिल्मों को अपनी विशिष्ट अभिनय शैली से सजाया। एक ऐसी शैली जो मानक बन गई और जिसके दम पर दर्जनों फिल्मों ने सफलता के झंडे गाड़े।

1967 में असरानी की पहली फिल्म आई थी -‘हरे कांच की चूड़ियां’,और उसके बाद का उनका फिल्मी सफर सर्वज्ञात है।
यह अभिनय कला के प्रति उनके समर्पण का ही प्रतिफल था कि अपने कैरियर के 55-60 वर्षों में उन्होंने फ़िल्म जगत की दो-तीन पीढ़ियों के साथ काम किया। अपनी मृत्यु से एक सप्ताह पहले तक असरानी प्रियदर्शन की फिल्म ‘हैवान’ की शूटिंग कर रहे थे।

उनकी अचानक मृत्यु के समाचार से स्तब्ध फिल्म में उनके सह कलाकार अक्षय कुमार ने X पर पोस्ट करते हुए लिखा- “असरानी जी के निधन से मैं निःशब्द हूं…अभी एक हफ्ते पहले ही हैवान की शूटिंग के दौरान हमने एक-दूसरे को गले लगाया था…मेरी सभी चर्चित फिल्मों हेराफेरी से लेकर भागमभाग,दे दनादन,वेलकम,भूत बंगला और हैवान तक मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा।”

असरानी मुख्यतः अपनी हास्य भूमिकाओं के लिए जाने जाते हैं,लेकिन उन्होंने कई फिल्मों में संजीदा भूमिकाएं भी निभाईं। ‘अभिमान’, ‘चुपके- चुपके’, ‘तपस्या’ ‘खून पसीना’ ‘चला मुरारी हीरो बनने’ जैसी फिल्मों में उनके किरदार अलग-अलग रंग लिए हुए थे।

अपने जमाने के सुपरस्टार राजेश खन्ना उनके काम से इतने प्रभावित थे कि उनकी लगभग 25 फिल्मों में असरानी उनके सह कलाकार रहे। राजेश खन्ना अपने हर निर्माता से असरानी को कास्ट करने की सिफारिश किया करते थे। ‘अवतार’,’अमरदीप’,’नौकर’,’कुदरत’,’बावर्ची’, ‘धर्मकांटा’,’आंखों आंखों में’ जैसी फिल्मों में दोनों ने साथ काम किया।

1972 में आई फिल्म ‘कोशिश’ और ‘चैताली’ में असरानी ने खलनायकनुमा भूमिका भी निभाई, लेकिन दर्शकों को उनके कॉमिक रोल ही अधिक पसंद आए।

उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बनाया 1975 में आई फिल्म ‘शोले’ ने। फिल्म में असरानी द्वारा निभाए गए पात्र ‘अंग्रेजों के जमाने के जेलर’ को दर्शकों का उतना ही प्यार मिला जितना फिल्म के हीरो अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र को मिला था। यह अपने आप में एक विशिष्ट घटना थी।

शोले के जेलर वाले पात्र को पर्दे पर जीवंत करने के लिए असरानी ने बहुत तैयारी की थी। मशहूर फिल्म लेखक सलीम-जावेद की कल्पना जेलर को हिटलर जैसा स्वरूप देने की थी। इसके लिए असरानी ने हिटलर से संबंधित तमाम वीडियो और किताबों का सहारा लिया था। कई दिनों तक हिटलर जैसा बोलने का अभ्यास किया था,तब कहीं जाकर ‘अंग्रेजों के जमाने का जेलर’ एक अविस्मरणीय पात्र बन सका।
एक साक्षात्कार में असरानी ने यह भी बताया था कि शोले 70 एमएम और 35 एमएम दोनों प्रिंट में रिलीज हुई थी। 70 एमएम में तो जेलर वाला सीन था,लेकिन 35 एमएम में काट दिया गया था। तमाम शिकवा शिकायतों के बाद उसे जोड़ा गया।
वैसे तो शोले का हर फ्रेम अपने आप में विशिष्ट है, लेकिन कल्पना करिए यदि फिल्म से जेलर वाले सीन हटा दिए जाएं तो फिल्म कैसी लगेगी?

ज़रा एक कल्पना करके और देखिए। यदि एलबी प्रसाद की बात मानकर असरानी अपने घर जयपुर लौट गए होते, तो भारतीय फिल्म जगत एक ऐसी प्रतिभा से वंचित रह गया होता जो कभी-कभार ही पैदा होती हैं।

उनके अचानक अवसान ने भले ही प्रशंसकों को चौंकाया हो,लेकिन बेहद खामोशी के साथ अंतिम विदाई की उनकी इच्छा ने कम से कम मुझे तो आश्चर्यचकित नहीं किया। जो कलाकार तमाम उम्र अपने प्रशंसकों को हंसाता रहा हो, वह दिवाली के उल्लास में खलल डालना आखिर कैसे स्वीकार कर सकता है?
यदि उनकी मृत्यु और अंतिम संस्कार की सूचना सार्वजनिक की जाती, तो क्या उनके लाखों प्रशंसक गमगीन नहीं होते?

यही है एक सच्चे कलाकार और खरे इंसान की पहचान। अपने फन का उस्ताद होते हुए भी सहज-सरल बने रहना हर किसी के लिए आसान नहीं है।
कला जगत में असरानी की अनुपस्थिति लंबे समय तक खालीपन का सबब बनी रहेगी।

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