आज सरदार वल्लभ भाई पटेल की 151वीं जयंती है। 31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के नडियाद में उनका जन्म हुआ था। अर्थात यह सरदार पटेल का सार्ध शती जयंती वर्ष है। सरदार को उनके बहुआयामी कृतित्व और यशस्वी व्यक्तित्व के विविध पहलुओं के संदर्भ में याद किया जाता है। तथापि, स्वतंत्र भारत के विस्तृत भूगोल की संरचना के लिए समूचे राष्ट्र की कृतज्ञ भावना के साथ उनका स्मरण करना सर्वाधिक कालजयी प्रसंग है। बीते दो-ढाई हजार वर्षों में भारत का भूगोल जिस तरह बदलता रहा है, उसका विवरण साम्राज्यों के संदर्भ में इतिहास में दर्ज है। इसमें मौर्य काल का सम्राट अशोक का साम्राज्य विस्तार है। गुप्त काल का सम्राट समुद्रगुप्त का साम्राज्य है। मुगल काल में बादशाह औरंगजेब का साम्राज्य है। फिर अंग्रेजी हुकूमत के अंतर्गत आने वाले भारत का विस्तार है। इसके बाद स्वतंत्र भारत का एकीकृत भूगोल है।
इस प्रस्तावना के साथ सरदार पटेल की राजनीतिक, कूटनीतिक और प्रशासनिक दक्षता का आकलन करना, उनके कृतित्व का सर्वोच्च शिखर प्रस्तुत करता है। सबसे पहले याद करें मौर्य सम्राट अशोक के साम्राज्य की, जिसके भूगोल से दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत बाहर था। फिर ध्यान दें समुद्रगुप्त के साम्राज्य पर जिसमें सिंध के पश्चिम, समूचा दक्षिण और पूर्वोत्तर का भाग नहीं था। औरंगजेब की बादशाहत से दक्षिण और पूर्वी हिस्सों के अलावा पश्चिमी भारत के भी कुछ हिस्से अलग थे। आजादी के समय जो ब्रिटिश साम्राज्य भारत में था उसमें अनेक राजे-रजवाड़े बाहर थे। सन 1947 में जब देश आजाद हुआ तब मजहब के आधार पर मुसलमानों के लिए अलग पाकिस्तान बना। इसमें पश्चिम पाकिस्तान और पूर्व पाकिस्तान दो हिस्से हुए। (सन 1971 में अपनी भाषा और संस्कृति की प्रबल चाह और पाकिस्तानी अत्याचारों तथा उपेक्षा से उपजे विद्रोह ने पूर्व पाकिस्तान को नया बांग्लादेश बना दिया।) आजादी के समय सबसे कठिन चुनौतीपूर्ण दायित्व स्वतंत्र भारत के उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के जिम्मे आया। उन्हें ब्रिटिश भारत के साथ-साथ लगभग 565 छोटी-बड़ी रियासतों का भारत संघ में विलय कराना था। यह ऐसा दायित्व था जिसमें सत्ता की शक्ति की भूमिका नगण्य हो सकती थी। भारतीय संस्कृति से उद्भूत एकात्मता की गहरी समझ, राजनयिक दक्षता, कूटनीतिक कुशाग्रता और प्रशासनिक दृढ़ता ही इस महान संकल्प को साकार कर सकती थी। यह सभी गुण सरदार पटेल के व्यक्तित्व में समाहित थे। जब क्रिप्स मिशन भारत आया था तब उसके सदस्य सरदार पटेल से वार्ता कर संतुष्ट होते थे। उनका मानना था कि बाकी नेताओं के विचारों में बदलाव आता रहता है, परंतु सरदार अपने विचारों पर अडिग रहने वाले नेता थे। बारदोली किसान आंदोलन के समय सरदार की असाधारण नेतृत्व क्षमता के कारण ही महात्मा गांधी ने उन्हें सरदार का विरुद प्रदान किया था जो उनके व्यक्तित्व का सटीक मूल्यांकन था।
सरदार पटेल को एक निस्पृह चक्रवर्ती के रूप में याद किया जाना सर्वाधिक प्रासंगिक है। उन्होंने अपनी कार्यकुशलता से भारत के जिस वृहद भूगोल की संरचना की, इतना एकीकृत मानचित्र भारत का पहले नहीं था। कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से असम-पूर्वोत्तर तक का विशाल क्षेत्रफल नए भारत का अविभाज्य अंग बना। निजाम का हैदराबाद, नवाब का भोपाल और जूनागढ़ की रियासतों के भारत संघ में विलय के लिए जरूर कठोर कदमों की जरूरत पड़ी, परंतु शेष भारत की सभी रियासतों ने संविलियन को खुशी-खुशी स्वीकार किया।
सामान्यत: सरदार पटेल को लौह पुरुष कहा जाता है। कठोर प्रशासक माना जाता है। परंतु यह उनके मानस का स्थायी भाव नहीं है। भारत की रियासतों में उदयपुर (चित्तौड़) ऐसा अकेला राज्य रहा जिसने कभी दिल्ली की अधीनता स्वीकार नहीं की। जब रियासत के विलय के संबंध में सरदार की उदयपुर के महाराणा से भेंट हुई, तब महाराणा ने कहा- ‘सरदार साहब क्या आज्ञा है ?’ सरदार पटेल का उत्तर था- ‘आज्ञा नहीं महाराणा साहब, अब उदयपुर छोडि़ए, दिल्ली सँभालिए।‘कल्पना की जा सकती है कि इस विनम्र संवाद से कैसा वातावरण बना होगा और कितनी सहजता से विलय पत्र पर महाराणा के हस्ताक्षर हो गए होंगे।
स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानी महावीर त्यागी ने सरदार पटेल की सादगी का उल्लेख करते हुए लिखा है कि उनका जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित था। उनकी अपनी कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी। राष्ट्र के लिए अपनी सेवाओं का प्रतिदान पाने की चाहत भी नहीं थी। यही संस्कार उनके पुत्र डाह्या भाई और पुत्री मणिबेन में भी थे। उनके रहन-सहन को देखकर कोई कह भी नहीं सकता था कि वे भारत के अग्रगण्य नेता के परिवार से हैं। एक बार मणिबेन की पैबंद लगी साड़ी पर महावीर त्यागी ने टिप्पणी कर दी- सरदार की बेटी होकर तुम्हें शर्म नहीं आती? मणिबेन का दो टूक जवाब था- शर्म आए उनको जो झूठ बोलते और बेईमानी करते हैं, हमको शर्म क्यों आए ? मणिबेन सरदार पटेल की सेवा में जुटी रहती थीं। डायरी लिखती थीं। चरखा कातती थीं। जो सूत बनता उसी से तैयार कपड़े से सरदार के धोती-कुर्ता बनते थे। उसी से मणिबेन की साड़ी-कुर्ती तैयार होती थी। इसी बातचीत में सरदार का हस्तक्षेप सरलता का दृष्टांत रचता है। वे बोले- गरीब आदमी की लड़की है, अच्छे कपड़े कहाँ से लाए ? उसका बाप कुछ कमाता थोड़ी ही है।
यह तथ्य है कि आजादी के समय कांग्रेस का नेतृत्व सौंपने के लिए लगभग सभी प्रदेश कांग्रेस कमेटियों ने सरदार वल्लभ भाई पटेल का नाम प्रस्तावित किया था। परंतु गांधी जी का मत जवाहरलाल नेहरू को नेतृत्व सौंपने का था। सरदार ने सहर्ष गांधी जी का मंतव्य स्वीकार कर लिया। राष्ट्र की सेवा में जुटे रहे। एकीकृत राष्ट्र की संरचना का असाधारण दायित्व निभाया। रामायण में राजा जनक को संतत्व के कारण ‘विदेहराज’ कहा गया है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में सरदार वल्लभ भाई पटेल को निस्संकोच ‘निस्पृह चक्रवर्ती’ के विरुद से सम्मानित किया जा सकता है।
सन 1954-55 में जब भारत सरकार ने विशिष्ट अवदान के लिए सर्वोच्च नागरिक सम्मानों की परंपरा आरंभ की, भारत रत्न उनमें शिखर अलंकरण था। सरदार पटेल के शिखर अवदान को सर्वप्रथम ‘भारत रत्न’ अलंकरण से सम्मानित किया जाना, राष्ट्र की ओर से कृतज्ञता की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति होती। इससे सरदार के आभामण्डल में कोई बड़ी कलगी जुड़ जाती, ऐसा नहीं था। वस्तुत: ऐसा करने से भारत रत्न अलंकरण की प्रतिष्ठा बढ़ जाती। सार्थकता सिद्ध होती।
सरदार वल्लभ भाई पटेल का सटीक मूल्यांकन करते हुए, उनके निधन पर ‘मानचेस्टर गार्जियन’ ने लिखा था- ‘’पटेल के बिना गांधी जी के विचारों का व्यावहारिक प्रभाव कम पड़ेगा और नेहरू के आदर्शवाद का क्षेत्र संकुचित हो जाएगा। पटेल स्वतंत्रता संग्राम के नायक ही नहीं थे, बल्कि वे स्वातंत्र्योत्तर भारत के निर्माता भी थे। एक ही व्यक्ति क्रान्तिकारी और कुशल राजनीतिज्ञ के रूप में प्राय: सफल नहीं होता है। किंतु सरदार पटेल के इसके अपवाद थे।‘’
भारत के अंतिम ब्रिटिश गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबैटन ने श्रद्धांजलि दी- ‘’ उनकी छवि भारत के जनमानस पर सदैव अंकित रहेगी। सन 1947-48 में रियासत मंत्रालय के प्रभारी के रूप में उनका महान कार्य इतिहास में लिखा जाएगा, क्योंकि उन्होंने रियासतों की समस्या को भलीभाँति समझकर तथा उनके शासकों का पूर्ण सम्मान करते हुए अत्यंत ही जटिल समस्या का जिस प्रकार समाधान किया, वैसा आजतक कोई भी राजनीतिज्ञ नहीं कर पाया था’’। सरदार पटेल असंभव को संभव बना सके क्योंकि उनका मानना था कि ‘’ऐसा कोई विघ्न नहीं है जो दूर न किया जा सके।‘’ हिन्द के सरदार का समूचा जीवन और कर्म चिरस्थायी महत्व का प्रकाश स्तंभ है जिससे पीढ़ी दर पीढ़ी भारतीय सबक और सीख ग्रहण कर सकते हैं।

(विजयदत्त श्रीधर)
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