वैसे तो खेलों में हार-जीत का सिलसिला चलता ही रहता है,लेकिन भारतीय महिला क्रिकेट टीम द्वारा विश्वकप जीतने की घटना एक सामान्य हार-जीत का मामला भर नहीं है। यह जीत उतनी ही महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है,जितनी 1983 की जीत थी; जब कपिल देव के नेतृत्व में भारत ने पहली बार क्रिकेट विश्व कप अपने हाथों में पकड़ा था। क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर के शब्दों में- “1983 ने एक पीढ़ी को प्रेरित किया था।अब हमारी महिला टीम ने वही इतिहास दोहराया है।उन्होंने हर लड़की को यह विश्वास दिया है कि वह भी विश्व चैंपियन बन सकती हैं।”
यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विजेता टीम की अधिकांश खिलाड़ी सामान्य घर-परिवारों से निकली हैं,और उन्होंने कठोर परिश्रम और संघर्ष की बदौलत यह मुकाम हासिल किया है।
22 वर्षीय क्रांति गौड़ को ही ले लीजिए। तेज गेंदबाजी करने वाली क्रांति मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के एक छोटे से गांव धुबारा की रहने वाली हैं। आर्थिक तंगी के चलते कोचिंग के लिए उन्हें अपनी मां के गहने तक बेचने पड़े, लेकिन उन्होंने संघर्ष का रास्ता नहीं छोड़ा। उनकी हौसला अफजाई के लिए प्रारंभिक स्थानीय कोच और परिवार की जितनी भी प्रशंसा की जाए,कम है।
यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह टीम के सामूहिक प्रयासों का नतीजा है। पूरे टूर्नामेंट के दौरान टीम की हर खिलाड़ी ने अपना शत-प्रतिशत योगदान दिया। खेल के हर विभाग का पृथक-पृथक विश्लेषण करने से इसे सहजता से समझा जा सकता है।
यह जीत इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि भारत में पुरुष क्रिकेट का जुनून तो लोगों के सिर चढ़कर बोलता है,लेकिन महिला क्रिकेट की हैसियत आज भी दोयम दर्जे की ही है। क्रिकेट की निमायक संस्था के कर्ताधर्ता खुद ही महिला क्रिकेट के औचित्य पर सवाल उठाते रहे हैं।
आज के कर्ताधर्ता भले ही ऐसा कोई सवाल ना उठा रहे हों, लेकिन यह तो एकदम स्पष्ट है कि महिला विश्व कप की वैसी मार्केटिंग तो नहीं की गई,जैसी पुरुष विश्व कप के लिए की जाती रही है। इतना ही नहीं, महिला विश्व कप का फाइनल मैच निजी स्वामित्व वाले डीवाई पाटिल स्टेडियम में इसलिए खेला गया क्योंकि महाराष्ट्र क्रिकेट संघ के मैदान पर रणजी ट्रॉफी के मैच चल रहे हैं। क्या क्रिकेट का वार्षिक कैलेंडर बनाते समय इस बात का ध्यान नहीं रखा जाना चाहिए था कि महिला एक दिवसीय क्रिकेट विश्व कप का फाइनल मुकाबला तो कम से कम वानखेड़े स्टेडियम में खेला जाता।
इसके बावजूद महिला क्रिकेट टीम का हौसला बढ़ाने के लिए दर्शकों की असाधारण भीड़ स्टेडियम में जुटी। इतना ही नहीं,विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस मैच को लगभग 8 करोड लोगों ने लाइव देखा,जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।
हो सकता है अब शायद क्रिकेट निमायक संस्था के कर्ताधर्ता और प्रायोजक महिला क्रिकेट टीम के प्रति प्रशंसकों के इस समर्थन को अनदेखा न कर पाएं।
यह जीत महिला क्रिकेट टीम के कोच अमोल मजूमदार के कैरियर में भी ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में दर्ज रहेगी। घरेलू क्रिकेट के दिग्गज खिलाड़ी अमोल मजूमदार तमाम उपलब्धियों के बावजूद राष्ट्रीय टीम की जर्सी नहीं पहन पाए। उन्होंने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 11000 से रन अधिक रन बनाए, लेकिन यह उनका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि वह ऐसे समय में क्रिकेट खेलते थे,जब एक से एक धुरंधर बल्लेबाज भारतीय टीम में खेल रहे थे। एक खिलाड़ी के रूप में वह भले ही भारतीय टीम की जर्सी नहीं पहन सके, लेकिन उनकी कोचिंग में महिला टीम ने वह कारनामा कर दिखाया, जिसकी कामना हर खिलाड़ी करता है।
यह जीत नियति के ऐसे खेल के लिए भी याद की जाएगी जिसमें कोई तो मंजिल के करीब पहुंचकर भी खाली हाथ रह जाता है,और कोई अनायास मिले अवसर को अपने कैरियर की यादगार उपलब्धि बना लेता है। शेफाली वर्मा ऐसे ही एक नाम हैं,जो नियमित टीम का हिस्सा नहीं थीं,लेकिन नियति ने उन्हें अवसर दिया और उन्होंने उसे बखूबी भुनाया।
टीम की नियमित खिलाड़ी प्रतिका रावल ने टूर्नामेंट में 51.33 की औसत से 308 रन बनाए, लेकिन बांग्लादेश के खिलाफ मैच के दौरान टखने में चोट लगने के कारण उन्हें सेमी फाइनल और फाइनल मैचों से बाहर होना पड़ा। उनका स्थान लिया शैफाली वर्मा ने। शैफाली ने फाइनल मैच में 87 रन बनाए और दो विकेट भी लिए। इस ऑलराउंड प्रदर्शन के लिए उन्हें ‘प्लेयर आपका फाइनल’ चुना गया। वह शैफाली, खराब फार्म के चलते जिनका टीम में चयन नहीं हुआ था, टूर्नामेंट के सिर्फ दो मैच खेलकर विश्व विजेता टीम का हिस्सा बन गईं।
महिला क्रिकेट टीम की यह उपलब्धि न केवल खेलों के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज होगी,बल्कि उन करोड़ों महिलाओं के लिए प्रेरणा का काम भी करेगी जो खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती हैं,और जिनकी प्रतिभा का दम केवल महिला होने की वजह से घुट कर रह जाता है।
*अरविन्द श्रीधर

