बिरसा मुंडा : आजादी और सामुदायिक अस्तित्व की लड़ाई के योद्धा

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भारतीय विद्वान , दार्शनिक,राजनेता और देश के दूसरे राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का एक कथन मुझे एक पसंदीदा पुस्तक में बरबस देखने को मिल जाता है कि लोकतंत्र सिर्फ विशेष लोगों में नहीं बल्कि हर एक मनुष्य की आध्यात्मिक संभावनाओं में एक यकीन- एक विश्वास है । शायद इसलिए अपने देश के लोकतंत्र की जड़े बहुत गहरी और मजबूत हैं कि हर संघर्ष के बाद अपना देश पहले से ज्यादा सुदृढ़,सक्षम और मजबूत खड़ा दिखाई देता है । कोई ना कोई आध्यात्मिक और राष्ट्रीय संभावना उजागर होकर नेतृत्व करती है ,पथ प्रदर्शित कर संघर्ष और साहस का रास्ता प्रशस्त करती है । बिरसा मुंडा देश के लोकतंत्र, उसकी मिट्टी का यह ही विश्वास है जिसने भारतीय लोकतंत्र के मूल्यों को बचाने के लिए अमिट संघर्ष किया । इतिहास व्यक्त करता है कि भारत को हर दमन और हर शोषण से उबरने और उससे मुक्त करने के लिए सशस्त्र विद्रोह की अखंड परंपरा रही है । अंग्रेजी हुकूमत की स्थापना के बाद सशस्त्र विद्रोह जो शुरू हुआ तो इसकी आग साल दर साल आगे बढ़ती रही, उस समय तक जब तक कि हमारा देश गुलामी की जंजीरों से मुक्त नहीं हुआ । भारतीय जनजातीय इतिहास में बिरसा मुंडा का नाम एक विद्रोही या स्वतंत्रता सेनानी के रूप में नहीं बल्कि ऐसे जननायक के रूप में लिया जाता है जिसने आध्यात्मिक शक्ति के साथ-साथ समाज सुधार के रूप में उल्लेखनीय योगदान दिया ।
उन्होंने दमन, शोषण के खिलाफ संघर्ष शुरू कर देश को एक आंदोलन का रास्ता बताया । औपनिवेशिक शासन और जमीदारी दमन के बीच उन्होंने समुदाय की सामूहिक चेतना को नई दिशा दी ।उनका आंदोलन उलगुलान सिर्फ एक विद्रोह भर नहीं है बल्कि जन जातीय अस्मिता संस्कृति की आजादी,भू अधिकार राजनीतिक आत्मनिर्णय और धन धार्मिक जन जागरण का एक अनुष्ठान रहा । उनका आंदोलन आधुनिक भारत में आदिवासी प्रतिरोध की सबसे संगठित प्रभावी और दीर्घकालिक याददाश्त है ।
झारखंड का बड़ा हिस्सा जो कुछ समय पहले तक छोटा नागपुर कहलाता था वहां मुंडा, उरॉव, संथाल जनजाति का निवास रहा है इन समुदायों ने उस समय एक विशेष प्रणाली विकसित की जिसे खूंटकटटी कहा जाता है । जिसका वहां अर्थ होता है जमीन पर सामुदायिक स्वामित्व । भूमि का अधिकार व्यक्तिगत नहीं बल्कि कबीलाई एकता पर आधारित था ।अंग्रेजों के आने के बाद इस व्यवस्था को ग्रहण लगा । अंग्रेजों ने राजस्व और जमीदारी आधारित संरचना लागू की और मनमाने ढंग से जमींदारों ,ठेकेदारों ,महाजनों को भूमि के अधिकार दिए । इससे मुंडा समुदाय अपने ही पैतृक क्षेत्र में दोयम दर्जे का बन गया । किराएदार जैसा । खेती पर भारी भरकम राजस्व, बेगारी के काम , बढ़ता कर्ज और जमीदारों का शोषण ,जंगल पर दूसरे का अधिकार और फिर सांस्कृतिक विरासत पर चोट, प्रहार , इस सबने जनजातीय समाज को एक गहरे संकट में डाल दिया। पारंपरिक सामुदायिक जीवन, प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार और स्वायत्त राजनीतिक ढांचा सब कुछ टूटने लगा । तब बिरसा मुंडा के उदय ने सामाजिक संस्कृति चेतना का शंख फूंक दिया।
हम इस बात से भली भांति अवगत है कि जब किसी की भूमि पर कोई बाहर का कब्जा कर लेता है । झूठे मुकदमे थोपे जाते हैं ,जबरन वसूली होती है और दमन का सिलसिला शुरू होता है तो व्यक्ति कई बार संघर्ष का पर्याय बन जाता है । कुछ यही बिरसा मुंडा के साथ रहा । महज 20 वर्ष की आयु में बिरसा मुंडा ने ब्रिटिश हुकूमत का विरोध करना शुरू कर दिया । सन 1875 में उलिहातू गांव में जन्मे बिरसा मुंडा में आध्यात्मिक और बौद्धिक चेतना असामान्य थी । एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व के रूप में उभरकर उन्होंने प्रकृति पूजा, धर्म का उद्धार, समाज में नैतिक अनुशासन, अंधविश्वास व शराबखोरी तथा सामाजिक बुराइयों के खिलाफ अभियान चलाकर अपने समुदाय में एकता और आत्म सम्मान का संचार किया ।इसलिए लोगों ने उन्हें धरती आबा अर्थात धरती का पिता कहना शुरू किया । जब ब्रिटिश शासन और जमीदारी व्यवस्था का शोषण बहुत अधिक अत्याचार पर आ गया तब बिरसा मुंडा ने आंदोलन की अलख जगाई । उन्होंने 1895 से 1900 के बीच प्रारंभिक शुरुआत में लोगों में जागरूकता का कार्य शुरू किया। उनकी जमीन पर बाहरी कब्जा, झूठे मुकदमे ,जंगली उपज पर प्रतिबंध और कई राजनीतिक कारण के साथ-साथ स्थानीय शासन पर ब्रिटिश अधिकारियों का अत्यधिक हस्तक्षेप जनजाति स्वायत्तता की अवहेलना ,सामाजिक ,धार्मिक कारण जैसे मिशनरियों द्वारा धर्मांतरण, पारंपरिक त्योहार और अनुष्ठानों पर प्रतिबंध ने समाज को झकझोर दिया।
तब समाज के लिए बिरसा मुंडा नेतृत्व के लिए आगे आए और उनके आंदोलन ने समाज को नई क्रांति के लिए आह्वान किया। उन्होंने समुदाय से कहा कि हमारी धरती ,हमारी मां है। इसका अपमान हम सहन नहीं करेंगे । यह जनजातीय अस्मिता का सवाल है । उनका आह्वान रहा कि शराब छोड़ो , जंगल- पहाड़ ,नदी ,मिट्टी की रक्षा करो । निरर्थक अनुष्ठान छोड़ो ,बाहरी दमन का विरोध करो । उनका कहना था कि अंग्रेज परदेसी हैं उनका शासन अवैध है । अब समय आ गया है कि हम अपनी धरती को वापस लें और इसलिए अब उलगुलान यानी आंदोलन होगा ।
इसी क्रम में 1895 से 1897 का पहला दौर था जब बिरसा मुंडा ने शांतिपूर्ण आंदोलन की शुरुआत की और लोगों में पुनर्जागरण को लेकर अभियान चलाया । इसके बाद 1897 से 1899 तक का समय उनके लिए बड़े संघर्ष का रहा । इस दरमियान उन्होंने जमीदारों का खुलकर विरोध किया । महाजनी शोषण व्यवस्था का प्रतिकार करते हुए जंगल के अधिकारों की रक्षा के लिए उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत से भी टकराव लिया । शायद इसी वजह से उन्हें 1895 में अंग्रेजी हुकूमत ने खतरा मानकर उन्हें पहली बार गिरफ्तार किया लेकिन जब जेल से निकले तो उनका प्रभाव और अधिक बढ़ गया ।
संघर्ष का तीसरा दौर 1899 से 1900 के बीच का रहा जब विद्रोह चरम अवस्था पर आया ।इस दरमियान थानों पर हमले हुए, जमींदारी प्रथा का जमकर विरोध शुरू हुआ । सरकारी भवन निशाने पर आए ।
बढ़ते विरोध और बहुत खिलाफत के कारण ब्रिटिश हुकूमत ने इसे बड़ा जनजातीय विद्रोह कहा । इसी वजह बिट्रिश हुकूमत ने हजारों सैनिकों और पुलिस बल के साथ बड़े पैमाने पर कई निर्दोष हत्याएं कीं । सैकड़ो गिरफ्तारियां हुई । गांव के गांव जला दिए गए । फर्जी मुकदमे थोपे गए और अंततः 3 फरवरी 1900 को जमकोपाल के जंगल में बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर लिया गया फिर 9 जून 1900 को रांची जेल में उनकी रहस्यमई मौत हो गई । तब उनकी आयु महज 25 वर्ष थी । इसके बाद यह परिणाम रहा कि आंदोलन की भयानकता को देखते हुए अंग्रेज सरकार ने भूमि कानून में सुधार किया और उसे वक्त छोटा नागपुर सीएनटी एक्ट 1908 बनाकर जनजातीय भूमि पर बाहरी कब्जे को अवैध घोषित करना पड़ा ।
यह उस समुदाय के लिए और गोलोक वासी बिरसा मुंडा के लिए बहुत बड़ी जीत थी जो उन्होंने अपनी मौत के बाद साकार की । बिरसा मुंडा और उनके आंदोलन ने पूरे देश में जन विद्रोह की प्रेरणा दी ।
कहते हैं की आजादी जंगल से शुरू हुई और देश के हर कोने में पहुंची । यहीं से आदिवासी क्षेत्रों में राजनीतिक चेतना का निर्माण शुरू हुआ । झारखंड राज्य के निर्माण की वैचारिक पृष्ठभूमि में बिरसा आंदोलन एक प्रमुख कारक है । बिरसा मुंडा ने स्पष्ट किया कि उपनिवेशवाद केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और आर्थिक दमन का हथियार है । उनका विचार था कि जंगल बचाओ तभी जनजातीय बचेगी । आज के पर्यावरण आंदोलन के अग्रदूत वही हैं । उनके आंदोलन में जनजाति समुदाय में आंतरिक सुधार आया । बाहरी प्रतिरोध की क्षमता विकसित हुई । बिरसा आंदोलन से यह सिद्ध हो गया कि इतिहास केवल साम्राज्य नहीं बनाते बल्कि सबसे गरीब और सबसे हाशिए पर खड़े लोग भी इतिहास रचते हैं । बिरसा मुंडा का आंदोलन एक विद्रोह नहीं बल्कि वैचारिक क्रांति थी उनके लिए समुदाय की जमीन समाज का अस्तित्व थी ।
उनका कहना था- जंगल अकेले संसाधन नहीं बल्कि संस्कृति, धर्म एवं सामुदायिक पहचान है। स्वतंत्रता सिर्फ राजनीतिक अधिकार नहीं बल्कि आत्मसम्मान है।
बिरसा मुंडा का व्यक्तित्व एवं कृतित्व हमेशा से प्रेरणादाई रहा है और हमेशा प्रासंगिक बना रहेगा।

*डॉ. बृजेश शर्मा
( लेखक विगत लंबे समय से सामयिक विषयों पर लेखन कर रहे हैं। यहां व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत हैं। )

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