वर्ष 2026 का आगमन भारत के लिए केवल एक साल बदलने वाली घटना नहीं है। यह एक रणनीतिक मोड़ है, ऐसा मोड़ जहाँ राष्ट्र की पहचान इतिहास की गति से नहीं, बल्कि अपनी नागरिक चेतना की गुणवत्ता की कसौटी पर परखी जाएगी। आज का भारत उस दहलीज़ पर खड़ा है जहाँ उसकी वैश्विक स्वीकार्यता, आर्थिक सामर्थ्य और कूटनीतिक प्रभाव निर्विवाद हैं। किंतु ठीक इसी क्षण एक असहज प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है, क्या हमारा नागरिक आचरण हमारी राष्ट्रीय आकांक्षाओं के अनुरूप विकसित हो पाया है। यह प्रश्न भावनात्मक नहीं, नीतिगत है। और इसका ईमानदार उत्तर भारत के भविष्य की दिशा तय करेगा।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य गहरे असंतुलन के कोहरे से ढंका धुंधला नजर आता है। संरक्षणवादी आर्थिक नीतियाँ, क्षेत्रीय युद्ध, आपूर्ति शृंखला का विघटन और वैचारिक ध्रुवीकरण, इन सबके बीच भारत एकमात्र ऐसा समर्थ लोकतंत्र बनकर उभरा है, जो संवाद, संतुलन और स्थिरता की बात करता है। आज का भारत न तो युद्ध चाहता है, न वर्चस्व। वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका संतुलनकारी शक्ति (स्टेबलाएजिंग पॉवर) के रूप में देखी और मानी जा रही है।
जी20, संयुक्त राष्ट्र, वैश्विक दक्षिण की आवाज़, जैसे प्रत्येक वैश्विक मंच पर भारत अब कोरी औपचारिक उपस्थिति नहीं, बल्कि निर्णायक प्रभाव बन चुका है। यह स्थिति संयोग नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक स्थिरता, नीतिगत निरंतरता और संस्थागत परिपक्वता का परिणाम है।
लेकिन बाहरी सफलता के समानांतर, नागरिक अनुशासन और सार्वजनिक जिम्मेदारी के क्षरण के स्वरूप में भीतर ही भीतर एक गंभीर कमजोरी उभर रही है। हम विश्वस्तरीय बुनियादी ढाँचे बना रहे हैं, पर उसका उपयोग अव्यवस्थित है। हम डिजिटल गवर्नेंस में अग्रणी हैं, पर सार्वजनिक स्थानों पर लापरवाही आम है। हम “इज ऑफ डूइंग बिजनेस” तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन “इज ऑफ लिविंग” हमारे नागरिक आचरण के कारण बुरी तरह से प्रभावित है। रेड लाइट तोड़ना, एम्बुलेंस को रास्ता न देना, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना, जीवन रक्षक औषधियों और खाद्य पदार्थों में जहरीली मिलावट, आदि केवल सामाजिक अव्यवस्थाएँ नहीं, बल्कि राष्ट्रीय छवि और संस्थागत विश्वसनीयता से जुड़ी समस्याएँ हैं।
1947 में भारत ने राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की। लेकिन 2026 का भारत अब नागरिक स्वतंत्रता के साथ अनुशासन की परीक्षा दे रहा है। क्योंकि स्वराज का अर्थ केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं, बल्कि स्वयं पर शासन (सेल्फ डीसिप्लीन) है। इतिहास साक्षी है, कोई भी राष्ट्र केवल शक्तिशाली सरकारों से महान नहीं बनता। महाशक्ति वे राष्ट्र होते हैं, जहाँ नागरिक अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों को भी समान गंभीरता से लेते हैं। जापान, सिंगापुर, इज़राइल जैसे देशों की शक्ति उनके संसाधनों में नहीं, बल्कि नागरिक चरित्र में निहित है।
पंचप्रण की अवधारणा नागरिक कर्तव्यबोध को नए तरीके से प्राण वायु देने का एक उपक्रम है। इसके तहत नागरिकों से अपेक्षा की गई है कि वह गुलामी की मानसिकता से मुक्त हों,विरासत पर गर्व करें,राष्ट्रीय एकता को मजबूत करें,नागरिक कर्तव्यों का पालन करें और विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने में हाथ बटाएं।
इनमें सबसे कम चर्चा जिस बिंदु पर होती है, वही सबसे निर्णायक है, नागरिक कर्तव्य। सरकारें कानून बना सकती हैं, ढाँचा खड़ा कर सकती हैं, संसाधन उपलब्ध करा सकती हैं,लेकिन अनुशासन, संवेदनशीलता और सार्वजनिक नैतिकता का निर्माण केवल समाज के भीतर से होता है।
तेज़ी से विकसित हो रहे भारत की चुनौती अब विकास नहीं रहा है। असली चुनौती है, विवेकपूर्ण विकास। बिना विज्ञान के गरीबी समाप्त नहीं हो सकती। और बिना नैतिकता और विवेक के विज्ञान स्वयं खतरा बन सकता है। भारत की विशिष्टता यही है कि वह तकनीक और अध्यात्म को विरोधी नहीं, पूरक मानता है। यदि भारत को ‘विश्व गुरु’ बनना है, तो उसे केवल एआई और क्वांटम में नहीं, बल्कि मानवीय नेतृत्व में भी अग्रणी होना होगा।
कोई भी राष्ट्र तब तक पूर्ण विकसित नहीं कहलाता, जब तक समाज का अंतिम व्यक्ति प्रगति की मुख्यधारा में शामिल न हो। अमृत काल की सफलता का वास्तविक पैमाना जीडीपी नहीं, बल्कि समावेशन और गरिमा है। शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसर, इन तीनों तक समान पहुँच भारत की नीति का केंद्रीय लक्ष्य होना चाहिए। और यह लक्ष्य केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि सामाजिक सहभागिता से पूरा होगा।
वस्तुत: 2026 भारत के लिए आत्मप्रशंसा का नहीं, आत्ममंथन का वर्ष होना चाहिए। यह तय करने का वर्ष कि क्या हम केवल तेज़ी से आगे बढ़ना चाहते हैं, या सही दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। एक ऐसा भारत जहां नियमों का पालन डर से नहीं, बल्कि आत्मसम्मान से हो। सार्वजनिक संपत्ति “सरकारी” नहीं, “राष्ट्रीय” मानी जाए। नागरिक आलोचक नहीं, साझेदार बनें।
भारत को आज किसी नए नारे की आवश्यकता नहीं है। उसे आवश्यकता है, नागरिक चेतना के उन्नयन की। यदि भारतीय नागरिक अपने दैनिक आचरण को राष्ट्र की वैश्विक आकांक्षाओं के स्तर तक उठा सकें, तो यह शताब्दी केवल भारत की नहीं, बल्कि भारत से प्रेरित विश्व की शताब्दी होगी।
आने वाला समय निश्चित ही भारत का है, लेकिन वह भारत केवल नारों से नहीं,भारत वासियों के चरित्र से बनेगा।

-राजकुमार जैन
(लेखक समसामयिक विषयों पर निरंतर लिखते रहते हैं. लेख में व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत हैं.)

