अमेरिका टूर डायरी 15 : पर्यटन ही नहीं,सबक भी

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अमेरिका के विभिन्न शहरों का भ्रमण करते हुए उनके बारे में लिखते समय मेरे मस्तिष्क में एक बात बिल्कुल स्पष्ट रही है कि अमेरिका,अमेरिका है और भारत,भारत। दोनों की परिस्थितियों में जमीन आसमान का अंतर है,अतः कहीं से कहीं तक दोनों देशों की तुलना नहीं की जा सकती है।
वैसे भी दो-ढाई माह का समय किसी देश और उसके समाज को समझने के लिए पर्याप्त नहीं होता है;और जब मूड पर्यटन का हो तो इस तरफ विशेष ध्यान जाता भी नहीं है। हां,विभिन्न स्थानों की यात्रा और भ्रमण के दौरान अनायास कुछ ऐसा देखने-सुनने में आ जाता है,जो प्रभावित करता है और लिखने के लिए प्रेरित भी करता है।
आज ऐसे ही कुछ अनुभवों की चर्चा करते हैं।

वह शायद 9 दिसंबर की दोपहर थी जब मौसम विभाग ने अपने पूर्वानुमान में बताया कि 11 दिसंबर को बर्फबारी होने की प्रबल संभावना है। अमेरिकी मौसम विभाग के पूर्वानुमान प्रायः सटीक ही होते हैं।

बर्फबारी जहां एक ओर मौसम को खुशनुमा बनाकर आनंद का कारण बनती है,वहीं दूसरी ओर इसके कारण लोगों को कुछ समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है। स्थानीय प्रशासन की मुस्तैदी देखिए कि 10 दिसंबर की शाम को ही फुटपाथों और कॉलोनी की आंतरिक सड़कों पर बर्फ का जमाव रोकने के लिए नमक का छिड़काव कर दिया गया। मौसम विभाग के पूर्वानुमान का संज्ञान लेते हुए तत्परता पूर्वक की गई इस पहल का परिणाम यह हुआ कि लोगों को बर्फबारी से होने वाली दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा,बल्कि सभी ने मौसम की पहली बर्फबारी का भरपूर आनंद लिया।

उपभोक्तावादी संस्कृति का झंडाबरदार होने के बाद भी अमेरिका में प्रदूषण जैसे मानव निर्मित संकट अभी नियंत्रण में हैं। हम जितने भी शहरों में गए,कम से कम पर्यावरण प्रदूषण जैसी कोई समस्या देखने में नहीं आई।

अमरीकनों की जो बात सबसे अधिक प्रभावित
करती है वह है उनका ‘सिविक सेंस’, विशेष रूप से ट्रैफिक को लेकर। हमने सड़कों पर लोगों को प्रायः सावधानी पूर्वक वाहन चलाते हुए ही देखा;भले ही वह टैक्सी ड्राइवर ही क्यों ना हो।
शायद यही कारण है कि सड़कों पर हार्न का शोर अमूमन सुनाई नहीं देता।
सड़क पर वाहन चलाते समय,लाल बत्ती पर रुकते समय अथवा निर्धारित स्थान पर पार्किंग करते समय लोग यह प्रतीक्षा नहीं करते कि कोई पुलिस वाला आकर व्यवस्था बनाएगा। व्यवस्था बनाए रखना लोगों के स्वभाव में है।

अपवाद हर जगह होते हैं लेकिन आम नागरिकों द्वारा सामान्य रूप से कायदे कानून का पालन करने का स्वभाव किसी भी देश की तरक्की में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है,और अमेरिकी शहरों में घूमते हुए इसे साफ-साफ महसूस किया जा सकता है।

सरकार को अपने नागरिकों के जिम्मेदाराना व्यवहार पर कितना भरोसा है इसकी झलक अमेरिकी हवाई अड्डों पर देखी जा सकती है। अमेरिका के हवाई अड्डों पर आप चेक इन बैगेज ड्रॉप प्वाइंट तक बेरोकटोक जा सकते हैं। यह छूट केवल यात्रियों के लिए ही नहीं,उन परिजनों के लिए भी है जो यात्रियों की मदद के लिए हवाई अड्डा पहुंचते हैं। सुरक्षा जांच की कतार इसके बाद प्रारंभ होती है।

यदि सरकार अपने नागरिकों पर यह भरोसा करती है कि सुरक्षा जांच के पहले तक वह ऐसा कोई कृत्य नहीं करेंगे जो सुरक्षा मानकों पर खरा ना उतरता हो,तो नागरिक भी इस भरोसे और स्वतंत्रता की पूरी इज्जत करते हैं। यही परस्पर भरोसा और सहयोग नागरिक सुविधाओं को सुलभ बनाता हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि हवाई यात्रियों की सुरक्षा के प्रति अमेरिकी प्रशासन गंभीर नहीं है। यदि आप भरोसे पर खरे नहीं उतरते हैं,तो फिर सुरक्षा कर्मियों की कड़ाई आम और खास में भेद नहीं करती।आपकी जरा सी लापरवाही आपको महंगी पड़ सकती है।

वाशिंगटन का यूनियन रेलवे स्टेशन एवं न्यूयॉर्क के ग्रैंड सेंट्रल टर्मिनल और पेन स्टेशन किसी हवाई अड्डे का सा आभास देते है। एकदम साफ सुथरे और सुरुचिपूर्ण ढंग से सज्जित।
कहा जाता है कि अमेरिका में ट्रेन सेवा और सार्वजनिक सड़क परिवहन सेवा देश के विशाल भूभाग को देखते हुए पर्याप्त नहीं है,लेकिन जो भी है वह उत्कृष्ट व्यवस्थाओं का नमूना है।

यूनियन स्टेशन पर उपलब्ध ‘रेड कैप असिस्टेंस’ ऐसी ही एक सुविधा है जो बुजुर्ग,दिव्यांग,
असहाय अथवा अधिक सामान के साथ यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए बड़ी मददगार साबित होती है। रेड कैप असिस्टेंस के कर्मचारी ऐसे यात्रियों का सामान उनकी निर्धारित सीट तक पहुंचाने और उसे व्यवस्थित रखने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
भारत की कुली व्यवस्था से यह इसलिए भिन्न है, क्योंकि यह सेवा पूर्णता निशुल्क है। यदि यात्री अपनी मर्जी से कर्मियों को टिप देना चाहे तो अलग बात है।

सड़कों-चौराहों पर बेतरतीब बैनर-पोस्टर भी प्रायः दिखाई नहीं देते,जबकि हम भारतीय मोहल्ले छाप नेताओं के जन्मदिन से लगाकर लगभग हर त्यौहार के दौरान इन्हें देखने के आदी हैं।
ऐसा नहीं है कि अमेरिका में राजनीतिक उठा-पटक नहीं होती,अथवा वहां ‘हृदय सम्राट’
टाइप के नेता नहीं हैं,लेकिन एक बात स्पष्ट है कि उन्हें सड़कों चौराहों को अपने बैनर पोस्टरों से पाटने जैसी अवांछनीय गतिविधियों की निरर्थकता का पूरा-पूरा एहसास है।

मैं पश्चिमी जगत के सबसे बड़े त्यौहार क्रिसमस के मौके पर न्यूयॉर्क शहर में था और अभ्यास के मुताबिक यह उम्मीद थी कि पूरा शहर बधाई और शुभकामना के बैनरों से पटा होगा, लेकिन मैं गलत साबित हुआ। बाजार और घरों पर परंपरागत साज सज्जा तो नजर आई,लेकिन नेताओं की तस्वीरों वाले बैनर्स सिरे से गायब थे।

हां,टाइम्स स्क्वेयर ज़रूर विशाल कलात्मक साइन बोर्डों की जगमग रोशनी में नहाया हुआ नजर आया;लेकिन यह जगमगाहट भव्यता का एहसास कराती है,रंग में भंग नही घोलती।

अमेरिकी प्रवास के दौरान राजधानी वॉशिंगटन डीसी में दो विरोध प्रदर्शन देखने में आए। एक व्हाइट हाउस के समक्ष पार्क में और दूसरा वॉशिंगटन मॉन्यूमेंट्स पर। दोनों प्रदर्शनों में दो-ढाई हजार के लगभग प्रदर्शनकारियों की उपस्थिति रही होगी।भाषणबाजी,नारेबाजी,
बैनर,ढोल- ढमाका सब कुछ वैसा ही जैसा प्रदर्शनों में होता है। लेकिन प्रदर्शन समाप्ति के बाद सब कुछ एकदम सामान्य। जैसे कुछ हुआ ही ना हो। इस दौरान ना तो ट्रैफिक प्रभावित हुआ और ना ही प्रदर्शन स्थल पर कचरा-कूड़ा नजर आया।

अमेरिका में सड़कों पर पान गुटके की पीक मारते हुए लोग नहीं दिखेंगे,यह पूर्वानुमान तो था,लेकिन हजारों भारतीय पर्यटकों के होते हुए ऐसा दृश्य दिखाई नहीं देना आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय सा लगा। इससे यह धारणा बलबती हुई कि यदि भारतीय चाहें तो अपने देश में भी संयमित आचरण का उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं।

एक बार पुनः स्पष्ट कर दूं कि इस आलेख में मैं अपने उन अनुभवों का जिक्र कर रहा हूं जो उल्लेखनीय और अनुकरणीय लगे,वरना लॉस एंजेलिस और न्यूयॉर्क की फुटपाथों और मेट्रो ट्रेन में नशेड़ियों की उपस्थिति भी एक सामान्य बात है। इन नशेड़ियों पर ध्यान नहीं देना है,बल्कि उनकी उपेक्षा करना है,यह हमें पहले ही बता दिया गया था। हमने वही किया।

अलग-अलग समूहों से बातचीत के दौरान भारतीय समुदाय की छवि को लेकर कुछ ऐसी बातें संज्ञान में आईं,जिन पर प्रत्येक भारतीय को ना केवल सोचना चाहिए वरन आवश्यक सुधार के लिए ठोस पहल भी करनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो एक समृद्ध सांस्कृतिक देश के रूप में भारत की विश्वव्यापी छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ना निश्चित है। बल्कि यह कहा जाना अधिक उचित होगा कि इसकी शुरुआत हो चुकी है।

अमेरिका,ब्रिटेन सहित तमाम यूरोपीय देशों में यह धारणा आम हो चली है कि जिन-जिन स्थानों पर भारतीय प्रवासी अधिक संख्या में निवासरत हैं, वहां शोर-शराबा और उच्छ्रंखलता सामान्य सी घटनाएं हैं। इसे एक तरह से भारतीयों की स्वभावगत कमजोरी मान लिया गया है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि विकसित देशों में भारत की छवि एक ऐसे देश की बनती जा रही है जिसमें धार्मिक,जातिगत और राजनीतिक कटुता ना केवल स्थाई भाव की तरह है,बल्कि दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है।
पलक झपकते ही विश्व के कोने-कोने तक खबरें पहुंचा देने वाला सोशल मीडिया,दिन-दूनी,
रात-चौगुनी रफ्तार से इस नकारात्मक छवि को प्रसारित कर रहा है।

हाल ही में क्रिसमस के दौरान कुछ विघ्नसंतोषी तत्वों ने देश के कुछ नगरों में उपद्रव मचाया। ऐसे अवांछित कृत्यों का उद्देश्य होता है मीडिया की सुर्खियां बटोरना; लेकिन उन्हें शायद यह एहसास नहीं है,कि ऐसी हरकतें न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबार के मुख्य पृष्ठ पर जगह बनाकर भारत की छवि को धूमिल करने का कारण बनती हैं।
ऐसी खबरें अमेरिका अथवा अन्य देशों के उन भारत विरोधी समूहों के लिए भी मददगार साबित होती हैं,जो भारतीयों के प्रति समर्थन का भाव नहीं रखते और उन्हें अपना हक मारने वाला मानते हैं।

घोर आश्चर्य की बात तो यह है कि अमेरिका में कार्यरत अधिसंख्य भारतीय युवा बिल्कुल नहीं चाहते कि उनकी टीम का मैनेजर कोई भारतीय हो। इसकी वजह भी सोचने पर मजबूर करती है। दरअसल भारतीय मैनेजरों की कार्यशैली उन परंपरागत अधिकारियों जैसी होती है जो ना केवल अनावश्यक हस्तक्षेप करते है,बल्कि समय-समय पर इसलिए रौब-दाब दिखाते रहते हैं,ताकि अपने बॉस होने के अहम को संतुष्ट कर सकें। युवा कार्मिकों को यह स्वीकार्य नहीं है।

यद्यपि दूसरे देशों में प्रवास के दौरान हमारे नागरिक अपेक्षाकृत संयमित व्यवहार करते हैं,लेकिन क्या करें ? हम सबके अंदर एक उच्छ्रंखल बच्चा मौजूद है,जो मौका मिलते ही उछल-कूद मचाने लगता है।अब इस उछल-कूद से चाहे भौतिक वस्तुओं की टूट-फूट हो,अथवा देश की छवि दरके; बच्चे को तो अपनी मौज से मतलब!

सामान्य शिष्टाचार और व्यवहार को लेकर हमारी छवि कितनी नकारात्मक बन गई है इसकी एक झलक देखने को मिली न्यूयॉर्क से नई दिल्ली आने वाली एयर इंडिया की फ्लाइट में।

विमान में अधिकांश यात्री भारतीय ही थे। सर्वविदित है कि टेक ऑफ के पहले क्रू द्वारा सुरक्षा उपायों के बारे में बताया जाता है।
सुरक्षा पेटी कैसे बांधना और खोलना है,ऑक्सीजन का दबाव कम होने पर क्या करना है, इमरजेंसी लैंडिंग के दौरान क्या करना है,यह सब तो बताया ही गया; लेकिन अजीब तब लगा जब यात्रियों से यह निवेदन किया गया कि वह शौचालय का प्रयोग इस तरह से करें ताकि अन्य यात्रियों को असुविधा न हो, साथ ही शौचालय में लगे सुरक्षा उपकरणों के साथ छेड़छाड़ ना करें।

दो माह के भ्रमण के दौरान हमने चार-पांच एयरलाइंस में उड़ान भरी,लेकिन ऐसी उद्घोषणा सिर्फ एयर इंडिया की उड़ान के दौरान ही सुनने को मिली।
मैं पक्के तौर पर कह सकता हूं की ऐसी उद्घोषणा करते समय एयर इंडिया क्रू मेंबर्स को प्रसन्नता तो नहीं ही होती होगी!

दरअसल हमारी समस्या यह है कि हम विश्व की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यता का वारिस होने का दावा तो करते हैं,लेकिन हमारे रोजमर्रा के व्यवहार में उसके कोई चिन्ह परिलक्षित नहीं होते। जब तक हमारे चरित्र में यह विरोधाभास मौजूद रहेगा,तब तक ना तो हम अपनी सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत के वारिस कहलाने के लायक हैं,और ना ही ऐसा मानने के लिए हमें विश्व से अपेक्षा रखनी चाहिए।

*अरविन्द श्रीधर

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