गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश के सबसे प्रतिष्ठित पद्म पुरस्कारों की घोषणा की गई। वर्ष 2026 के लिए विभिन्न क्षेत्रों की 131 हस्तियों का चयन पद्म पुरस्कारों के लिए किया गया है। मध्य प्रदेश के लिए यह गौरव की बात है कि प्रदेश की चार हस्तियों का चयन पद्मश्री अलंकरण के लिए किया गया है।

हिंदी के प्रचार-प्रसार और उन्नयन के लिए अपना जीवन होम देने वाले दादा कैलाश चंद्र पंत को पद्मश्री से अलंकृत किया जाना एक तरह से उनकी एकनिष्ठ तपस्या का सम्मान है। एक शिक्षक,
संपादक, कुशल संगठनकर्ता और संस्कृति कर्मी के रूप में उनकी सुदीर्घ सेवाओं को देखते हुए उन्हें पहले ही यह सम्मान मिल जाना चाहिए था। प्रदेश ही नहीं,पूरे देश में ऐसे कम ही लोग होंगे,जिन्होंने अपने जीवन के लगभग 6 दशक हिंदी के प्रचार प्रसार और उन्नयन में लगाए हों।
यह उनका हिंदी के प्रति लगाव ही था, जिसने उन्हें शासकीय नौकरी छोड़कर हिंदी पत्रकारिता अपनाने के लिए प्रेरित किया। उनके संपादन में निकलने वाला ‘साप्ताहिक जनधर्म’ एक समय समसामयिक घटनाक्रम,साहित्य और संस्कृति की मुखर आवाज हुआ करता था।
भोपाल का हिंदी भवन उनकी साधना का भव्य स्मारक है। दादा पंत के नेतृत्व में हिंदी भवन ने ऐसे संस्थान के रूप में प्रतिष्ठा अर्जित की है,जहां साहित्यकार,पत्रकार और हिंदी के काम में लगे अनगिनत लोग आश्रय पाते रहे हैं।
उनके मार्गदर्शन में प्रकाशित पत्रिका ‘अक्षरा’ हिंदी पत्रिकाओं में विशिष्ट स्थान रखती है।
एक हिंदी सेवी के रूप में दादा पंत को लोक सम्मान तो बहुत पहले से ही प्राप्त है,अब पद्मश्री अलंकरण ने उस पर सरकारी मोहर भी लगा दी है।

पुराविद डॉ. नारायण व्यास पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित होने वाली वह विभूति हैं,जिन्होंने मध्य प्रदेश सहित देश के अनेक राज्यों में पुरा संपदा के उत्खनन,शोध और संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। 37 वर्षों तक शासकीय सेवक के रूप में सेवाएं देने वाले डॉ. व्यास की सक्रियता सेवानिवृत्ति के उपरांत भी थमी नहीं है। एक पुराविद् के रूप में वह आज भी सक्रिय है। उनकी लिखी पुस्तकें पुरातत्व के क्षेत्र में महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ के रूप में मान्य की जाती हैं।
यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित भीमबेटका,सांची के स्तूप और पाटण(गुजरात) की रानी की बाव जैसे स्थलों के संरक्षण-संवर्धन में डॉ. व्यास की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
पुरातत्व और शैल चित्रकला में डी लिट की उपाधि पाने वाले डॉ व्यास अपने निजी संग्रहालय के माध्यम से निरंतर शोधार्थियों का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
पुरातत्व के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए डॉ व्यास को डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।

सागर के भगवान दास रैकवार एक ऐसी कला साधना के लिए पद्मश्री से सम्मानित किए गए हैं,जो सामान्यतः लोगों की नज़रों में नहीं आती। उन्हें प्राचीन अखाड़ा संस्कृति और मार्शल आर्ट के लिए सम्मानित किया गया है।
16-17 वर्ष की आयु में अखाड़े में कदम रखने वाले रैकवार फिर अखाड़े के ही होकर रह गए। अपनी साधना में भगवानदास रैकवार ऐसे रमे,कि अपनी बैंक की नौकरी को छोड़कर पूरा समय अखाड़े में ही देने लगे।
उन्होंने समय के साथ विलुप्त होती जा रही बुंदेलखंड की प्राचीन युद्ध कला (मार्शल आर्ट) की न केवल स्वयं साधना की अपितु सैकड़ो युवाओं को इसका प्रशिक्षण भी प्रदान किया।
उन्हें पद्मश्री अलंकरण प्रदान किए जाने की घोषणा के साथ ही केवल बुंदेलखंड ही नहीं,देशभर में फैले उनके शिष्यों द्वारा प्रसन्नता व्यक्त की जा रही है।

मूलतः राजगढ़ जिले के रहने वाले और बैतूल को अपना कार्य क्षेत्र बनाने वाले मोहन नागर, सामुदायिक-सामाजिक गतिविधियों,विशेषकर जल और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्यो के लिए पद्मश्री से सम्मानित किए गए हैं। 30 वर्षों से जल और पर्यावरण संरक्षण के कार्यों में संलग्न नागर ‘जल पुरुष’ के नाम से जाने जाते हैं। इसके पहले उन्हें भारत सरकार के जल प्रहरी पुरस्कार,भाऊराव देवरस राष्ट्रीय पुरस्कार और वाटर हीरो अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।वर्तमान में मोहन नागर,मध्य प्रदेश जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में सेवाएं प्रदान कर रहे हैं,जो प्रदेश की स्वयंसेवी संस्थाओं को प्रोत्साहित करने वाला महत्वपूर्ण उपक्रम है।
*अरविन्द श्रीधर


व्यास जी का काम वाकई अद्भुत है। सभी को बहुत बधाई।
Good information