महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग : लोक आस्था का अनूठा पर्व ‘शिव नवरात्रि’

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शिवरात्रि सनातन परंपरा का एक महत्वपूर्ण पर्व है। जहां-जहां भी सनातन धर्मावलंबी हैं,वहां किसी न किसी रूप में यह पर्व मनाया ही जाता है। महाशिवरात्रि पर्व क्यों मनाया जाता है? इसे लेकर पौराणिक साहित्य और लोकमान्यताओं में मतांतर देखने को मिलता है। 

विभिन्न पुराणों एवं शैव परंपरा के ग्रंथों के अनुसार महाशिवरात्रि महादेव शिव के लिंग स्वरूप में प्राकट्य का दिन है,तो लोकआस्था के अनुसार इस दिन शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था।

शिव और भगवती सती के विवाह के संबंध में शिव पुराण की रूद्र संहिता के सती खंड(अध्याय 18, श्लोक संख्या 20 एवं अध्याय 20,श्लोक संख्या 38) में उल्लेख आता है- चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी,रविवार को पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में भगवान महेश्वर ने विवाह के लिए यात्रा तथा विवाह कार्य संपन्न किया। 

शिव-पार्वती विवाह के संबंध में शिवपुराण के ही पार्वती खंड (अध्याय 35 श्लोक संख्या 58 से 60)में स्पष्ट उल्लेख है-

वशिष्ठ जी हिमालय को कहते हैं कि- “एक सप्ताह बीतने पर एक दुर्लभ उत्तम सुयोग आ रहा है। उस लग्न में लग्न का स्वामी स्वयं अपने घर में स्थित है, और चंद्रमा भी अपने पुत्र बुद्ध के साथ स्थित रहेगा। चंद्रमा रोहिणी युक्त होगा, इसलिए चंद्र तथा तारागणों का योग भी उत्तम है। मार्गशीर्ष का महीना है, उसमें भी सर्वदोषविवर्जित चंद्रवार का दिन है। वह लग्न सभी उत्तम ग्रहों से युक्त तथा नीच ग्रहों की दृष्टि से रहित है।उस शुभ लग्न में बृहस्पति उत्तम संतान तथा पति का सौभाग्य प्रदान करने वाले हैं।

हे पर्वत! ऐसे शुभ लग्न में अपनी कन्या मूल प्रकृतिरूपा ईश्वरी जगदंबा को,जगत्पिता शिव जी के लिए प्रदान करके आप कृतार्थ हो जाएंगे।”

उक्त दोनों उद्धरणों से स्पष्ट है कि शिव-पार्वती विवाह महाशिवरात्रि पर नहीं हुआ था,क्योंकि महाशिवरात्रि तो फाल्गुन मास में आती है।

महाशिवरात्रि पर्व का माहात्म्य प्रतिपादित करते हुए शिव पुराण की ही विश्वेश्वर संहिता में कहा गया है – महाशिवरात्रि के दिन देवाधिदेव महादेव ने सर्वप्रथम ब्रह्मा और विष्णु जी को लिंग स्वरूप का दर्शन कराया था।महाशिवरात्रि के दिन ही शिव निराकार से साकार हुए थे।

ईशान संहिता में शिवरात्रि के संबंध में कहा गया है- फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि।

शिवलिंङ्गतयोद्भूत: कोटि सूर्य समप्रभ:।।

फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी की महानिशा में आदिदेव महादेव कोटि सूर्य के समान दीप्तिसंपन्न हो शिवलिंग के रूप में आविर्भूत हुए थे।

अन्य शैव ग्रंथ भी इसी मत की पुष्टि करते हैं।

पुराणोक्त मत कुछ भी हो,बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में तो यह पर्व शिव-पार्वती विवाहोत्सव के रूप में ही मनाए जाने की परंपरा है। 

उज्जैन की उत्सव प्रियता अद्भुत है। लगभग वर्षपर्यंत यहां कोई ना कोई उत्सव चलते ही रहते हैं।

महाकाल मंदिर में मनाया जाने वाला शिव नवरात्रि पर्व इस तीर्थ नगरी की उत्सवप्रियता का अद्भुत उदाहरण है। अन्य किसी शैव तीर्थ में शिव नवरात्रि मनाए जाने की परंपरा प्रायः देखने में नहीं आती।

उज्जैन में शिव नवरात्रि की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। इसकी पुष्टि उज्जैन के उद्भट विद्वान पं. सूर्य नारायण व्यास के एक लेख से होती है,जो सनातन धर्म की प्रमुख पत्रिका ‘कल्याण’ के आठवें वर्ष (1934) के विशेषांक में प्रकाशित हुआ था। नवरात्रि उत्सव की और इंगित करते हुए वह लिखते हैं-

‘महाशिवरात्रि के नौ रोज पूर्व ही मंदिर के ऊपर के आंगन में नौ रोज हरि कीर्तन होता है।’

नई पीढ़ी में पौराणिक साहित्य के गहन अध्येता डॉ विवेक चौरसिया भी शिवरात्रि को शिव-पार्वती परिणयोत्सव ही मानते हैं।

लोकमान्यता प्रमाण में नहीं आस्था में आश्रय खोजती है; और बाबा महाकाल को राजाधिराज मानने वाली अवंतिका नगरी परंपरागत रूप से शिवरात्रि को शिव-पार्वती परिणयोत्सव के रूप में ही मनाती आ रही है।

इस लोक आस्था के चलते यह आश्चर्य की बात नहीं है कि महाकाल मंदिर में शिव नवरात्रि के दौरान पूजा-पाठ और रीति-रिवाजों का वैसा ही पालन किया जाता है,जैसा सनातन धर्म के अनुसार विवाहोत्सव में प्रचलित है।

इन नौं दिनों में महाकाल का श्रृंगार दूल्हा मानकर ही किया जाता है। सामान्यतः शिवपूजन में हल्दी का निषेध है,लेकिन दूल्हे को बगैर हल्दी चढ़ाए विवाह कैसे हो सकता है? इसलिए इन नौं दिनों में महाकाल को हल्दी,चंदन और केसर का उबटन लगाया जाता है। सुगंधित द्रव्यों एवं औषधियों से स्नान कराया जाता है। नवीन वस्त्र आभूषण धारण कराए जाते हैं। गर्भ ग्रह में विशेष पूजन किया जाता है और प्रतिदिन नए-नए स्वरूपों में श्रृंगार किया जाता है।

शिव नवरात्रि का प्रारंभ नैवेद्य कक्ष में भगवान चंद्रमौलेश्वर और कोटितीर्थ कुंड के समीप कोटेश्वर महादेव की पूजन और संकल्प के साथ से होता है। इसके पश्चात महाकाल का क्रमशः शेषनाग,घटाटोप, छबीना,होलकर स्वरूप,

मनमहेश,उमा-महेश एवं शिव तांडव स्वरूप में श्रृंगार किया जाता है।

इन नौं दिनों में देवाधिदेव महादेव भगवान महाकाल हरि कथा का श्रवण भी करते हैं, जिसका उल्लेख पं. सूर्यनारायण व्यास ने 1938 के एक लेख में किया है। नारदीय संकीर्तन शैली में महाकाल को हरि कथा सुनाने की यह परंपरा एक शताब्दी से अधिक प्राचीन है।

महाशिवरात्रि के दिन अर्धरात्रि में महानिशाकाल की विशेष पूजा होती है। दूसरे दिन प्रातः महाकाल को सप्तधान मुघौटा धारण कराया जाता है। नवीन वस्त्र आभूषणों के साथ उनका दूल्हे जैसा श्रृंगार किया जाता है,और उनके शीश पर फूलों एवं फलों का आकर्षक सेहरा सजाया जाता है।

भक्तों को महाकाल के सेहरा दर्शन का सौभाग्य वर्ष में केवल एक बार शिवरात्रि के दिन ही मिलता है। 

शिवरात्रि के साथ एक विशिष्ट प्रसंग और भी जुड़ा हुआ है। इस दिन महाकाल की भस्म आरती प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में न होकर,दोपहर 12:00 बजे की जाती है। और अब तो शिव-पार्वती विवाह के उपलक्ष में पुजारी परिवार और मंदिर समिति की ओर से प्रीतिभोज का आयोजन भी किया जाने लगा है।

प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में होने वाली भस्म आरती और शिवनवरात्रि का पर्व,12 ज्योतिर्लिंगों में से सिर्फ महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की ही परंपरा है। 

इन अनूठी परंपराओं के चलते यह शैवतीर्थ सनातन धर्मावलंबियों की आस्था और श्रद्धा का केंद्र बन गया है।

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