भारत का असली चेहरा, उसकी आत्मा और धड़कन हमारे गाँवों में बसी है। महानगरों की चकाचौंध भले ही सुर्खियाँ बटोरे, पर हिंदुस्तान की सच्ची विविधता, उसकी आस्था, संघर्ष और विजय यहीं की मिट्टी में पनपती है।
श्रीलाल शुक्ल के प्रसिद्ध उपन्यास रागदरबारी की शुरुआत इस तरह होती है, ” महानगर का किनारा, उसे छोड़ते ही देहात का महासागर शुरु हो जाता है….
यह जानना सुखद है कि भारत में अभी भी ऐसे गांव है,जहाँ बिना दरवाजे के घर हैं, साँप परिवारो के सदस्य हैं, जुड़वाँ बच्चे वैज्ञानिकों को चुनौती देते हैं, और हर घर से कोई न कोई सैनिक निकलता है। आइए, ऐसे ही अनूठे गाँवों के बारे में जाने।
महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर में सदियों से बिना दरवाजों के घरों की परंपरा चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि शनिदेव के रहते यहाँ चोरी का भय नहीं होता। हालाँकि अब बदलते समय के साथ घरों और दुकानों में दरवाजे लगने लगे हैं, फिर भी मंदिर, दूकान ,घर बिना ताले के होना विस्मयकारी है। यहाँ विश्वास ही सबसे बड़ा दरवाजा और संयम ही ताला है।
महाराष्ट्र राज्य के ही सोलापुर ज़िले में स्थित शेटफळ एक ऐसा गाँव है, जहाँ विषधर नाग अधिकांश परिवारो का अभिन्न हिस्सा हैं। यहाँ कोबरा स्वतंत्र विचरते हैं और उन्हें मारना वर्जित माना जाता है।
महाराष्ट्र में ही अहमदनगर का हिवरे बाज़ार है, जो कभी सूखे से जूझता था। आज यह गाँव जल संरक्षण और लोगों की मेहनत की बदौलत महाराष्ट्र का सबसे धनी गाँव बन चुका है।
गुजरात के साबरकांठा में स्थित पंसारी गाँव आधुनिक ग्राम-विकास की जीती-जागती मिसाल है। यहाँ 24 घंटे वाई-फाई, सीसीटीवी कैमरे, सोलर लाइट्स और पक्की नालियाँ हैं। शहरों से होड़ लेता यह गाँव साबित करता है कि सुविधाएँ किसी महानगर की मोहताज नहीं।
वहीं, गिर के जंगलों से सटे जम्बूर में सिद्दी समुदाय बसता है। अफ्रीकी मूल और पुर्तगाली नाविकों के वंशज यह लोग आज पूरी तरह भारतीय हैं और गुजराती बोलते हैं। उनकी हस्तकला, नृत्य और जीवनशैली इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि समावेशी विविधता ही भारत की पहचान है।
राजस्थान के कुलधरा गांव का रहस्य अब भी उद्घाटित नहीं हुआ है। यह गाँव रातों रात खाली हो गया था।कोई इसे शापित कहता है,तो कोई अत्याचार का नतीजा। खंडहरों में तब्दील यह बस्ती मौन होकर भी बहुत कुछ कहती है।
केरल के मलप्पुरम में कोडिन्ही का गाँव वैज्ञानिकों के लिए पहेली बना हुआ है। यहाँ जुड़वा बच्चों की 300-400 जोड़ियाँ हैं। प्रति हज़ार जन्मों पर 45 जुड़वाँ बच्चों का होना अजीबोगरीब संयोग है।अब तक इसका कोई वैज्ञानिक कारण नहीं खोजा जा सका है।
कर्नाटक के शिवमोग्गा में मत्तूर नामक गाँव संस्कृत बोलता है। यहाँ की दैनिक बातचीत में संकेथि के साथ संस्कृत का प्रचलन है। हालाँकि पूरा गाँव शत-प्रतिशत संस्कृतभाषी नहीं, फिर भी प्राचीन भाषा को जीवित रखने का यह एक अनुपम प्रयास है।
बिहार के कैमूर में बरवाँ कला को पचास वर्षों तक ‘कुंवारों का गाँव’ कहा गया। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और गरीबी के कारण यहाँ कोई अपनी बेटी ब्याहने को तैयार नहीं होता था। 2017 में यहाँ पहली शादी हुई और तब से धीरे-धीरे इस गाँव की बदहाली भी पीछे छूट रही है।
मेघालय का मावलिननोंग एशिया का सबसे स्वच्छ गाँव है। बाँस के डस्टबिन, प्राकृतिक कम्पोस्ट और पत्तों से बनी थालियाँ यहाँ की जीवनशैली का हिस्सा हैं।
असम के रोंगडोई में आज भी मेंढकों का विवाह रचाया जाता है। यह रस्म अच्छी वर्षा के लिए निभाई जाती है।
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में कोरलई नामक गाँव की अपनी भाषा है -क्रियोल पुर्तगाली,जो औपनिवेशिक विरासत की जीवित गवाही है। सुदूर छत्तीसगढ़ में पुर्तगाली भाषा के प्रयोग के चलते इस गांव की खास पहचान बन गई है।
उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर में बसा एक गांव है गमहर। यह एशिया का सबसे बड़ा ग्राम है। आबादी डेढ़ लाख से अधिक है,पर रिकॉर्ड में गहमर गांव ही है। यहाँ हर घर से कोई न कोई सैनिक निकला है।पंद्रह हज़ार से अधिक पूर्व सैनिक, और कारगिल से लेकर प्रथम विश्वयुद्ध तक के योद्धाओं की गाथाएँ यहाँ की हर गली में बसी हैं।
भारत की विविधता अपने आपमें विशिष्ट है,और इस तरह के गांव विविधता को और भी समृद्ध करते हैं।
आप भी अपने आसपास नजर दौड़ाइए। हो सकता है कोई ऐसी विशेषता नजर आए,जिस पर अब तक आपकी दृष्टि नहीं गई थी।

- विवेक रंजन श्रीवास्तव
(स्वतंत्र लेखक)

