इन दिनों धार,झाबुआ,अलीराजपुर,बड़वानी और खरगोन जिलों में भगोरिया की धूम है। जनजातीय बहुल इन जिलों के सामाजिक जीवन में हॉट-बाजारों का बहुत महत्व है। होली के अवसर पर यही हाट-बाजार भगोरिया मेलों में बदल जाते हैं। भगोरिया को भंगर्या,भगुरिया,
भौंगर्या आदि नामों से भी जाना जाता है।
जनजातीय समाज में भगोरिया का बहुत महत्व है; इसीलिए यह लोग देश में कहीं भी रहते हों,भगोरिया के समय अपने गांव जरूर लौट आते हैं।
भगोरिया सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक मेलजोल और मस्ती का अनूठा संगम है। पारंपरिक सजधज,बंसी की टेर,मांदल की थाप और नाचते-गाते युवा इस पर्व में अनोखी रंगत भरते हैं। इस रंगत को भगोरिया हाट में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित रहकर ही महसूस किया जा सकता है।
भगोरिया गीतों का अपना भाव सौंदर्य है। बानगी देखिए-
भाया कावळियाॅं लाय दो जी,
कावळियाॅं पेरीनऽ मी तो भोंगर्यों देखूँगा।
यह एक निमाड़ी गीत है। मध्यप्रदेश के निमाड़ और मालवा अंचल में यह गीत काफी लोकप्रिय है। इस गीत के माध्यम से बहन अपने भाई से मनुहार करती है कि भाई! मुझे चूड़ियां ला दो। मैं उन्हें पहनकर भगोरिया हाट जाऊंगी।
भोंगर्या म जावांगा नऽ झांझर्या लेवाडूँगा,
असा झाँझर्या पेरीनऽ मी तो छम छम नाचूंगा।
बहन भाई से कहती है कि भैया! मुझे भगोरिया हाट से पायल ला दो। जब मैं वह पायल पहनूँगी, तो उसके रुनझुन स्वर पर थिरक-थिरककर नृत्य करूँगी।
भोंगर्या म जावांगा नऽ साड़ी लेवाडूँगा,
असी साड़ी पेरीनऽ मी तो वायड़ी देखाऊँगा।
भैया, जब मैं भगोरिया हाट जाऊँगी, तो मुझे एक रंग-बिरंगी साड़ी अवश्य दिला देना। उसे पहनकर मैं भी हाट की भीड़ में इठलाऊँगी।
इन गीतों में बहन भाई से केवल सौंदर्य प्रसाधन सामग्री नहीं माँग रही, बल्कि भगोरिया के उस आनंद में सहभागी होने की अपनी आकांक्षा भी व्यक्त कर रही है।

भगोरिया हाटों में ‘डोहिया नृत्य’ किया जाता है। युवक-युवतियाँ आमने-सामने खड़े होकर विभिन्न प्रकार से अंग-संचालन करते हुए कभी आगे बढ़ते हैं, और कभी पीछे हटते हैं,तो कभी दायीं-बायीं ओर झुककर झूमते हुए नृत्य करते हैं।
जनजातीय संस्कृति के समस्त रंगों के दर्शन इस हाट में हो जाते हैं।
भगोरिया में दैनिक जीवन से जुड़ीं सभी वस्तुओं तथा होली पर्व की खरीदारी भी होती हैं। गुड़ की जलेबी,भजिये,खारिये(सेंव),पान और कुल्फी इस हाट के विशेष व्यंजन हैं।
होटल म जाऊँगा न भजल्या मिरी खाऊँगा।
असा भजल्या खाइ न मी तो मोटली देखाऊँगा।
बहन हँसते हुए कहती है कि वह हाट में होटल जाएगी और वहाँ भजिये तथा मिर्ची खाएगी। भजिये खाकर वह हष्ट पुष्ट दिखने लगेगी। उसके इस कथन में स्नेह, चंचलता और बाल-सुलभ उत्साह झलकता है।
एक अन्य गीत देखिए-
आम्हू आखा चाल्या दादा भंगर्या मा।
बारा महना मा आवे भंगर्यू रे।
हाड़ जुड्या गाड़ी गेरी भंगर्या मा।
पुरीया पारी गाड़ीम गया भंगर्या मा।
पान खाजे आखा भंगर्या मा।
रंग खेलणे आखा भंगर्या मा।
गीत में कहा जा रहा है कि आओ, हम सब भगोरिया हाट चलें। जल्दी से बैलगाड़ी सजाएँ, बैल जोतें, और बच्चे-बूढ़े सभी हँसते-गाते भगोरिया की ओर निकल पड़ें।
भगोरिया हाट में भाग लेने की तैयारियों के लिये एक हाट इसके एक सप्ताह पूर्व लगता है। इसे ‘तिहवारया या त्योहारिया हाट’ (त्योहार पूर्व की हाट) कहा जाता है। प्राचीन समय में इन हाट-बाजारों में गुलाल उड़ाया जाता था, इसलिए इन्हें ‘गुलालिया हाट’ भी कहा जाता है। होली के बाद उजाड़िया हाट लगने की परंपरा भी है।
आयो रे भाया,भंगर्यो आयो।
तेवार्यो, गुलाल्यो, भंगर्यो आयो।

माना जाता है कि भगोरिया की शुरुआत राजा भोज के कालखंड में हुई थी। तत्कालीन भील राजाओं कासूमरा और बालून ने अपनी राजधानी भगोर में मेले की शुरुआत की। इसके बाद अन्य क्षेत्रों में भी यह मेला लगने लगा। कालांतर में स्थानीय हाट और मेलों में लोग इसे भगोरिया कहने लगे।
लोक मान्यता अनुसार, भगोरिया शब्द भील जनजाति के भगोर देव के नाम पर अथवा भील जन पर शैव (भग-शिव, गौर-पार्वती) के प्रभाव के कारण प्रचलित है।
इतिहासकारों के अनुसार, झाबुआ से करीब सात-आठ किमी दूर भृगु ऋषि की तपस्थली भगोर है। लगभग साढ़े सात सौ साल पहले यहां सघन बस्ती हुआ करती थी। प्राकृतिक अकाल की वजह से बस्ती पूरी तरह से उजड़ गई। भगोर के लोग जाकर रतलाम में बस गए। इसलिए तब से एक कहावत प्रचलित हुई – ‘भाग्यो भगोर और बसियो रतलाम।’
इस घटना के बाद वहां के आम जनों ने मिलकर भगवान शिव और पार्वती की पूजा की। भव-गौरी का मंदिर नेगड़ी नदी के पास मदन तालाब के किनारे स्थित है। उसी के आधार पर भगोर का नामकरण हुआ।
करीब 450 साल पहले जो भग्गा नायक शासक था, उसने भगोर को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। प्रतिवर्ष यहां होली के पहले हाट बाजारों में पूजन के लिए मेला आयोजित किया जाने लगा। यही मेला जो भगोर का हाट था वह भगोरिया कहलाने लगा। तब से यह हाट पलवाड़, मेघनगर, थांदला, पेटलावद से होते हुए रतलाम और धार क्षेत्र तक फैला। दूसरी तरफ निमाड़ अंचल में बड़वानी और खरगोन तक पहुंच गया।
कालांतर में भगोर के भील धार जिले की कुक्षी तहसील के ग्राम वाणधा,आगर व घटबोरी में जाकर बस गए और इन्हें ही ‘भगुरिया भील’ के नाम से संबोधित किया जाने लगा।
भगोरिया हाट को लेकर लोगों में एक भ्रम है कि यह “भागने का उत्सव” है। प्रचलित धारणा है कि मेले में युवक-युवतियाँ एक-दूसरे को पान प्रस्तुत करते हैं। यदि पान स्वीकार कर लिया जाए तो इसे प्रणय निवेदन की स्वीकृति माना जाता है। इसके बाद युवक युवती भाग जाते हैं।
इस तरह की धारणाओं का प्रचार-प्रसार मीडिया के माध्यम से हुआ है,जो कि सत्य नहीं है।
वास्तविकता इससे भिन्न है। आदिम जाति कल्याण विभाग की अनुसंधान एवं विकास संस्था के एक अध्ययन के मुताबिक,भगोरिया होली के अवसर पर मिलने-जुलने और सामूहिक नृत्य-संगीत के माध्यम से प्रसन्नता और उल्लास व्यक्त करने का अवसर है। अध्ययन में पाया गया कि भगोरिया से कोई भी युवक किसी भी युवती को भगाकर नहीं ले जाता है। होलिका दहन तक समाज में किसी भी तरह के मांगलिक कार्य नहीं होते हैं। विवाह भी नहीं होते हैं।
नि:संदेह,भगोरिया हॉट युवाओं को आपसी परिचय और मेलजोल का अवसर देता है,किंतु इसे “परिणय पर्व” या “भागने का उत्सव” के रूप में परिभाषित करना न केवल अतिरंजित है, बल्कि जनजातीय परंपरा की अस्मिता और गरिमा के साथ अन्याय भी है।
समय के साथ-साथ भगोरिया के स्वरूप में भी परिवर्तन हुआ है। पहले पुरुषों का मुख्य परिधान धोती, साफा, झुलड़ी हुआ करता था, आजकल युवा जींस,शर्ट,टी-शर्ट में नजर आते हैं। दूसरी ओर महिलाओं ने भी समय के साथ कदम मिलाते हुए सूट-सलवार, साड़ियाँ पहनना प्रारम्भ कर दिया है। चश्मा महिला एवं पुरुष दोनों में समान रूप से लोकप्रिय है। मोबाइल फोन भी प्रायः सबके हाथों में दिखने लगा है।
यह कृषि चक्र की पूर्णता का भी उत्सव है। जनजातीय समाज इस उत्सव के माध्यम से प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता है।
ताड़ी और महुआ से निर्मित पारंपरिक पेय भी केवल नशे के साधन नहीं अपितु जनजातीय समाज की आजीविका, देव पूजा और प्रकृति-आधारित अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग हैं।
भगोरिया को समझने के लिए उसके धार्मिक, सामाजिक और सामाजिक संदर्भों को समझना आवश्यक है।
वस्तुतः भगोरिया जनजातीय समाज की उस जीवंत विरासत का प्रतीक है, जिसने आधुनिकता की आंधी में भी अपने पारंपरिक मूल्यों को सहेज कर रखा है। यह उत्सव हमें स्मरण कराता है कि संस्कृति केवल स्मृति नहीं होती,यह एक जीवंत आचरण है और भगोरिया जैसे पर्व उस आचरण की अभिव्यक्ति।

*रक्षा पंड्या
(लेखिका लोक संस्कृति अध्येता हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके अपने हैं।)

