टीम सूर्या ने ही नहीं,भारतीय संस्कृति ने भी जीता है वर्ल्ड कप

अजय बोकिल By अजय बोकिल
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टी 20 वर्ल्डकप 2026 का भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुआ धमाकेदार फाइनल मैच इस मायने में अलग था कि इसमें भारत और इंग्लैंड के मध्य हुए सेमीफाइनल मैच जैसा दिल की धड़़कने थमा देने वाला रोमांच भले न हो, लेकिन मैच का हर क्षण टीम सूर्या की हर हाल में जीत की जिद से सराबोर था। मानो रंगपंचमी का त्यौहार क्रिकेट की दीवाली में तब्दील हो गया हो। खास बात ये कि यह ‍वर्ल्ड कप का यह खिताब न केवल टीम सूर्या ने जीता बल्कि उस उदात्त भारतीय संस्कृति ने जीता है, जिसकी नुमाइंदगी ये 11 खिलाड़ी अहमदाबाद के नरेन्द्र मोदी स्टेडियम में कर रहे थे। सांस्कृतिक संजीदगी का ये नजारा एक बार नहीं चार-चार बार दिखा। मसलन इंग्लैंड की टीम के साथ हुए कशमकश भरे सेमीफाइनल को अपने नाम करने के बाद भारतीय टीम के स्टार बल्लेबाज संजू सैमसन ने ‘प्लेयर आफ द मैच’ की ट्राफी उस मुखालिफ टीम के मासूम युवा खिलाड़ी जेकब बेथल को यह कहकर थमा दी कि आज इसके असल हकदार तुम्ही हो। बेथल ने अपनी टीम को जिताने के लिए जी जान लगा दी, सेंचुरी भी मारी, लेकिन टीम आखिर में सात रनों से हार गई। अपनी इस बेबसी पर रोते बेथल को संजू ने जिस बड़प्पन के साथ हिम्मत बंधाई, श्रेय दिया, उसके लिए दरिया जैसा दिल चाहिए। यही नहीं, अपनी कामयाबियों कर इठलाने की जगह संजू ने जिस हिमालय-सी उदारता का परिचय देते हुए फाइनल में हार से व्यथित न्यूजीलैंड टीम के कप्तान मिशेल सेंटेनर आगे बढ़कर उठाया और ‘प्लेयर आॅफ द टूर्नामेंट’ की अनमोल ट्रॉफ़ी फी भी मिशेल को सौंप दी। यह केवल दिल बहलाने की बात नहीं थी, बल्कि निष्काम भाव से प्रतिद्वंद्वी के परिश्रम का स्वीकार था। जीत के गुरूर और उन्माद के बीच करूणा और उदारता की कविता रच देना, किसी साधारण खिलाड़ी का काम नहीं है। संजू ने साबित कर दिया कि वो एक बेहतरीन खिलाड़ी ही नहीं हैं, एक महान इंसान भी हैं। ऐसा इंसान, जिसकी तारीफ हमारे दुश्मन देश पाकिस्तान के खिलाडि़यों ने मुक्त कंठ से की।

मैदान पर एक नायाब नजारा वो भी दिखा जब इंग्लैंड टीम के कप्तान हैरी ब्रूक ने वानखेडे स्टेडियम के दर्शकों से भरे स्टेडियम में सार्वजनिक रूप से अपनी प्रतिद्वंद्वी टीम के कप्तान सूर्यकुमार यादव के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लिया। गौरतलब है कि दुनिया में पैर छूने की परंपरा केवल भारतीय संस्कृति में है, जहां बड़ों और महान लोगों के आगे झुकने का अर्थ अपने भीतर के अहंकार तो तिरोहित करना है न कि किसी के आगे सरेंडर करना। एक और नजीर फाइनल में गेंदबाज अर्शदीप सिंह द्वारा विकेट उड़ाने की जल्दी में फेंकी गई गेंद न्यूजीलैंड टीम के बल्लेबाज डेरिल मिशेल को जा लगना और उनका बिफरना थी। अर्शदीप ने ऐसा जानबूझकर नही किया था,जल्दबाजी में ऐसा हुआ। लेकिन अपने इस ‘अपराध बोध’ से व्यथित अर्शदीप ने मिशेल से एक नहीं दो-दो बार माफी मांगी। कप्तान सूर्या ने भी अपने साथी की इस चूक पर क्षमायाचना में कोताही नहीं की। मामला वहीं खत्म हो गया। क्रिकेट जैसे खेल और मैच के दौरान किलिंग इंस्टिंक्ट के तकाजों के बीच असाधारण संयम और दरियादिली का परिचय देकर भारतीय खिलाडि़यों ने खिताबी ट्राॅफी के साथ-साथ सारी दुनिया का दिल भी जीत लिया।

दक्षिण अफ्रीका के हाथों ग्रुप मैच में भारत की करारी हार जैसे अवांछित और सबक सिखाने वाले प्रसंग को छो़ड दिया जाए तो ऐसा बार- बार लगा कि भारतीय क्रिकेट टीम एक जिद की साथ उतरी है। फाइनल में खिताबी मैच के एक दिन पहले तक अपनी जीत और भारतीय टीम के घरेलू मैदान पर भारी दबाव में खेलने की डींगे हांकने वाले न्यूजीलैंड के कप्तान मिशेल सेंटेनर की जबान तब खामोश हो गई, जब टाॅस जीतकर भी गेंदबाजी करने का उनका अपना दांव उलटा पड़ गया। दूसरी तरफ भारतीय कप्तान सूर्यकुमार यादव और उनकी टीम टाॅस की क्षणिक हार को रिकाॅर्ड जीत में बदलने के लिए बेताब थी। सभी 11 खिलाड़ी तय करके मैदान में उतरे थे कि अपनी दो साल पहले जीती ट्राॅफी को हर हाल में बचाए रखना है, यानी मोर्चे पर तैनात उस योद्धा की तरह, जो अपनी इंच भर जमीन भी दुश्मन को देने के लिए तैयार नहीं है। अगर आप गौर से देखें तो हर कप्तान की अपनी बाॅडी लैंग्वेज होती है, जो कुछ कहती है। भारतीय टीम के पूर्व विश्वविजेता कप्तानों और वर्तमान कप्तान सूर्य कुमार यादव की देहभाषा में फर्क यह है कि उनका चेहरा बोलता है। तनाव, संकल्प, हैरत और जिद के लमहों में उनके होठ चंबू ( भगवान को जल चढ़ाने वाला सुराही जैसे मुंह वाला छोटा पात्र) की माफिक गोल हो जाते हैं। सेकंड के भी शतांश-सी उनकी यह शारीरिक प्रतिक्रिया इंट्रोस्पेक्शन के साथ-साथ मैच की स्क्रिप्ट किसी ब्लाॅक बस्टर फिल्म की पटकथा लिखती-सी प्रतीत होती है। सूर्या के होंठ सामान्य होते ही संदेश चला जाता था कि कोई एरर आई थी, जो साॅल्व हो गई। जीत का कारवां अपनी सरगम के साथ लय में आगे बढ़ रहा है। सूर्या के होठों और आंखों की मौन भाषा को शायद उनके सहयोगी खिलाड़ी भी बड़ी सफाई से पढ़ और समझ लेते हैं। यही कारण है ‍कि जब रनों की जरूरत थी, तब रनों का अंबार रचा, जब विकेट गिराने की जरूरत थी, विकेट ध्वस्त किए, जब कैच पकड़ने की दरकार थी तो किसी सजग प्रहरी से अधिकांश कैचों को जीत के फोल्डर में डाला, जब किफायती गेंदबाजी की आवश्यकता था तब किसी मारवाड़ी की मानसिकता से रन दिए। इन सब बातों का यूनिक मिश्रण मैदान में कीवियों का फालूदा बना गया। कह सकते हैं कि टी 20 वर्ल्ड कप के पहले भारत आई न्यूजीलैंड की टीम को इस फार्मेट में देशी मैदानों पर पहले ही मात देने का अनुभव भारतीय टीम के काम आया। संभवत: टीम सूर्या ने टीम सेंटेंनर की खामियों और खूबियों को भली भांति सेव कर लिया था और मौका लगते ही उसमें आवश्यकतानुसार ‘करेक्शन’ शुरू कर दिए। इस टी 20 वर्ल्ड कप ने साबित कर दिया कि आज क्रिकेट के इस फार्मेट में टीम इंडिया ही बाहुबली है।

आलोचकों ने कप्तान सूर्यकुमार यादव की इस बात के लिए आलोचना की कि उन्होंने भारत को खिताब भले दिलाया हो, लेकिन टूर्नामेंट में उनका अपना निजी योगदान बहुत कम रहा। मान लिया, लेकिन नतीजे आपके पक्ष में हों तो सफलता को जाती कूवत की तराजू पर तौलना नाइंसाफी है। कप्तान का पैमाना अव्वल उसकी कप्तानी है, न कि निजी योगदान। सूर्यकुमार यादव पहले पैमाने पर सौ टंच खरे साबित हुए। टीम सूर्या ने अपने टाइटल को बचाते हुए कई नए रिकाॅर्ड कायम किए और पुराने रिकाॅर्डों को शिकस्त दी। इस टीम ने कई खेल मिथकों को ध्वस्त किया तो कई नए पैमानों की संरचना की। बतौर सूर्यकुमार यादव अगला लक्ष्य अब ओलंपिक में गोल्ड हासिल करना है। यही चाल रही तो वो भी झोली में होगा।

*अजय बोकिल
(वरिष्ठ पत्रकार)

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