दांडी यात्रा ने दुनिया को दिखाया अहिंसात्मक प्रतिकार का रास्ता

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भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन को गति और मजबूती देने वाली दांडी यात्रा ऐतिहासिक थी। इस यात्रा ने संपूर्ण भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध अहिंसात्मक प्रतिरोध की आँधी तो पैदा की ही, साथ ही शांति और अहिंसा के मूल्यों से युवाओं को जोड़कर ब्रिटिश हुकूमत को बैचैन कर दिया।

महात्मा गांधी के नेतृत्व में जो 78 अनुयायी दांडी यात्रा में सहभागी बने,मेहता एवं देसाई की पुस्तक दांडी कूच (1969) के अनुसार उनमें 16-30 आयु वर्ग के करीब 66 युवा एवं विद्यार्थी थे सबसे कम उम्र का अनुयायी 16 वर्ष का विट्ठल लीलाधर था। इन सत्याग्रहियों में विभिन्न क्षेत्रों, वर्गों और धर्मों के युवाओं के साथ शिक्षक,
किसान,गोपालन-डेयरी विशेषज्ञ,संगीत आदि से जुड़े सत्याग्रही थे भी थे।

साबरमती आश्रम जहां से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नया सूरज उगने को बेताब था, वह जगह पौराणिक कथाओं के अनुसार दधीचि ऋषि का स्थान था, जिन्होंने धर्म के खातिर अपनी हड्डियां तक दान में दे दीं थीं।
इसी भूमि पर महात्मा गांधी ने आश्रम वासियों को साहस,सहनशीलता,श्रम,आत्मनिर्भरता,मानवीय मूल्यों,सत्य,शांति,विनम्रता,निर्भय,अहिंसा,न्याय आदि की शिक्षा दी और देश के लिए न्यौछावर होने का ज़ज्बा दिया।

गांधी के इस प्रयोग ने अहिंसात्मक प्रतिरोध का एक नया रास्ता खोला,जिसने आगे चलकर भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया।

गांधी दांडी यात्रा में सामाजिक कुरीतियों, मद्य निषेध,,स्वच्छता, विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार एवं खादी की बात करते थे। सरल बातों को सरल तरीके से जनमानस में बिठा देते और उतने ही सरल तरीके से ब्रिटिश हुकूमत से लड़ने के अहिंसात्मक सूत्र देते थे। इस मुहिम में आवेश, गुस्सा,बदले की भावना, प्रतिपक्षी के अपमान की कोई जगह नहीं थी।उनका उद्देश्य तो प्रेम और नैतिक ताकत के बल पर प्रतिपक्षी के हृदय में परिवर्तन लाना था।इससे जनमानस आंदोलित हो उठा।
ब्रिटिश सरकार का नमक कर जन विरोधी तो था ही,नमक पर एकाधिकार के चलते इससे हजारों लोग बेरोजगार हो गए। यह एक तरह से घोर अनैतिक और जनविरोधी कदम था। गरीब किसानों की थाली से नमक गायब करने वाले ब्रिटिश सरकार के इस कदम का प्रतिकार करने के लिए गांधी ने उन आम लोगों को ही चुना जो इससे सबसे ज्यादा प्रभावित थे। नमक कानून तोड़कर वह ब्रिटिश सरकार और देशवासियों को यह संदेश भी देना चाहते थे कि अनैतिक कानूनों का अहिंसात्मक प्रतिकार करना भारतीयों का अधिकार है।

12 मार्च 1930 से 5 अप्रेल 1930 तक चली 240 मील यात्रा के बाद 6 अप्रेल को सुबह गांधी ने दांडी गांव में अरब सागर की लहरों और हवाओं के बीच समन्दर के तट पर मुट्ठी भर नमक अपने हाथ में लेकर सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरूआत कर दी।
अरब सागर से उठी बदलाव की लहर देश के हर कोने मे पहुंच गई ,और देश भर मे नमक कानून का विरोध करने की हवा चल पड़ी। इसके साथ-साथ महिला सत्याग्रहियों द्वारा शराब की दुकानों पर धरना दिया जाने लगा और विदेशी वेस्टन की होली जलाई जाने लगी।
इसने देश मे ब्रिटिश विरोधी जबरदस्त माहौल बना। हजारों लोग जेलों में गए।अंततः ब्रिटिश हुकूमत को झुकना पड़ा।

दांडी यात्रा ने दुनिया को न्याय प्राप्ति का एक नया रास्ता दिखाया कि शांति और अहिंसा के रास्ते पर चलकर भी आताई सत्ता को चुनौती दी जा सकती है।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन ने सत्याग्रह को एक अमोघ अस्त्र के रूप में दुनिया के सामने रखा था। आज जब विश्व में सर्वत्र युद्ध,हिंसा और संघर्ष का माहौल दिखाई देता है,तब गांधी का पथ एक बार पुनः प्रासंगिक हो उठता है।

दांडी यात्रा हमें याद दिलाती है कि नैतिक बल से बड़ा कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं होता। बलात थोपे गए कानून और हिंसक बल का प्रयोग कर जमाया गया आधिपत्य स्थाई प्रकृति का नहीं होता और ना ही इससे किसी का भला होता है।
मानवता की भलाई के लिए विश्व को दांडी यात्रा का यह फलसफा स्वीकार करने के अलावा और कोई विकल्प दिखाई नहीं देता।

डॉ भुवनेश जैन
(पूर्व निदेशक, मेरा युवा भारत,
युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय,
भारत सरकार)

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