दीप्ति चौरसिया को दिया गया भुवन भूषण देवलिया सम्मान….
भारत में महिला पत्रकारों से पत्रकारिता के क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों का सामना कड़ी मेहनत और लगन से करने का आह्वान करते हुए, जानी-मानी पत्रकार जयंती रंगनाथन ने कहा कि पत्रकारिता को कभी भी ग्लैमर के नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
राष्ट्रीय हिंदी दैनिक ‘हिंदुस्तान’ की सलाहकार संपादक जयंती रंगनाथन माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान में आयोजित 15वीं वार्षिक ‘भुवन भूषण देवलिया व्याख्यानमाला’ में मुख्य वक्ता के तौर पर बोल रही थीं।
उन्होंने कहा कि आज से 40 साल पहले बैंक की सुरक्षित नौकरी छोड़कर पत्रकारिता के पेशे को अपनाना एक जोखिम भरा निर्णय तो था, लेकिन परिवार ने इस निर्णय का पूरा-पूरा समर्थन किया। जब यह निर्णय लिया गया तब पत्रकारिता में आज की तरह ग्लैमर नहीं था,साथ ही यह क्षेत्र पूरी तरह पुरुष प्रभुत्व वाला था।
टाइम्स समूह और धर्मयुग जैसे संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। कार्यक्षेत्र में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हर चुनौती का दृढ़तापूर्वक सामना किया, जिससे सम्मान भी मिला और पहचान भी मिली।
महिला पत्रकारों को सलाह देते हुए उन्होंने कहा, “अगर आप कमज़ोरी के संकेत दिखाती हैं या कार्यस्थल पर अपनी निजी घरेलू समस्याओं के बारे में बताती हैं, तो हो सकता है कि आपके सहकर्मी आपका सहयोग न करें।”
चुनौतियां केवल पत्रकारिता में नहीं हर कैरियर में है, और सिर्फ महिलाओं के समक्ष नहीं पुरुषों के समक्ष भी हैं। जरूरत है दृढ़ता पूर्वक उनका सामना करने की।
महिला पत्रकारिता की चुनौतियां विषय पर बोलते हुए डॉ. मंगला अनुजा ने कहा, “भारत में महिला पत्रकारिता का पहला उदाहरण 1835 में देखने को मिलता है,इस तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में भारत की महिलाएं अपने वैश्विक समकक्षों से बहुत पीछे नहीं हैं।”
भुवन भूषण देवरिया पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार दीप्ति चौरसिया ने कहा-
जब किसी समस्या को दूर से देखा जाता है, तो वह पहाड़ जैसी विशाल लगती है; लेकिन, जब हम उससे गुज़र जाते हैं, तो वह बस ओझल हो जाती है। पत्रकारिता के क्षेत्र में महिलाओं को और भी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।चुनौती दोहरी पहचान को संभालने में है : एक महिला होना और एक पत्रकार होना। लेकिन महिलाएं फिर भी राह बना रही हैं,और आगे बढ़ रही हैं।
उन्होंने कहा कि धारणाएं अब धीरे-धीरे टूटने लगी हैं। अगर किसी पत्रकार को सिर्फ़ एक पत्रकार के तौर पर देखा जाए—चाहे उसका लिंग कुछ भी हो—तो लैंगिक असमानता अपने आप खत्म हो जाएगी।
निराला सृजन पीठ की निदेशक डॉ. साधना बलवाटे ने अपने भाषण में कहा-पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘ग्लैमर’ के कारण ‘मिशन’ की भावना कम हो गई है।हालांकि, इस क्षेत्र में आने वाली स्वाभाविक चुनौतियां शायद कम हो गई हैं, लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी बहुत कम है
उन्होंने कहा-पत्रकारिता और साहित्य एक-दूसरे के पूरक विषय हैं। हालांकि, पत्रकारिता के भीतर साहित्यिक तत्व काफी कम हो गया है। इन दोनों के बीच एक सामंजस्यपूर्ण संतुलन ज़रूरी है। साथ ही पत्रकारिता की भाषा की स्पष्टता और सुंदरता को बनाए रखने पर भी ज़ोर दिया जाना चाहिए।
इस अवसर पर भुवन भूषण देवरिया व्याख्यान माला समिति के सदस्यों सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

