भाषा अस्तित्व, अस्मिता, स्वाभिमान और संस्कृति की द्योतक होती है। भारत भाषायी बहुलता वाला राष्ट्र है। इस महादेश को भावात्मक एकता और अखंडता के सूत्र में बांधने का काम ऋषियों और अन्य मनीषियों ने अभिव्यक्ति के जिन माध्यमों से किया है, उनमें भाषा प्रमुख है। भारतीय ज्ञान परंपरा के जितने भी महान ग्रंथ रचे गए हैं, उनके मूल भाव को लगभग सभी भारतीय भाषाओं में ढाला गया है। जन-जन तक पहुँचाया गया है। रामायण और गीता इसके सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं। सभी भाषाओं में इनके अनुवाद और भाष्य उपलब्ध हैं और समाज द्वारा अपनाए गए हैं। अपभ्रंश हो या संस्कृत, अनेक भारतीय भाषाओं का उद्गम इनमें मिलता है। मराठी का प्रादुर्भाव का दृष्टांत विलक्षण है। 79 वर्ष पहले प्रकाशित ‘विक्रम स्मृति ग्रंथ’ में भाषाविद् वि.भि. कोलते का शोध आलेख ‘अवंति: मराठी का मायका’ एक नया तथ्य प्रकट करता है। तमिल व्याकरण के रचनाकार ऋषि अगस्त्य माने जाते हैं। ऐसे तथ्य यह जतलाते हैं कि भारत में भाषायी बहुलता का मूल एकात्मता है।

भारतीय भाषाओं में अपनापा और बहनापा है। इनमें न तो किसी तरह की प्रतिद्वंद्विता है और न ही प्रतिस्पर्धा का भाव है। स्थानीयता के प्रभाव से भिन्नता अवश्य दृष्टिगोचर होती है, परंतु वह दुराव का कारण नहीं बनती। मातृभाषाओं का महत्व प्रकारांतर से राष्ट्रीयता को सुदृढ़ आधार ही प्रदान करता है। भारत की स्वाधीनता को संपूर्णता प्रदान करने के लिए भारत में भाषा- स्वराज अपरिहार्य है। ‘अपनी भाषा पर अभिमान, सब भाषाओं का सम्मान’ के सामंजस्यपूर्ण उद्घोष के साथ भोपाल से भारतीय मातृभाषा अनुष्ठान का राष्ट्रीय अभियान आरंभ हो रहा है। माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल की इस पहल को अखिल भारतीय स्तर पर हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग और राष्ट्रभाषा प्रचार समितिए वर्धा का अनुमोदन और सहभागिता प्राप्त है। इसका मूल मंत्र है- ‘संकल्प का विकल्प नहीं होता।’ सर्वप्रथम मातृभाषाओं का सर्वोच्च सम्मान हो, और, लोक व्यवहार में मातृभाषाओं को गरिमापूर्ण स्थान मिले। मूल राजभाषा अधिनियम का अनुपालन हो। राष्ट्रीय राजभाषा के रूप में हिन्दी निर्विवाद रहे और हिन्दीतर भारतीय भाषाओं वाले राज्यों में उनकी अपनी भाषा प्रांतीय राजभाषा हो। बतौर राजभाषा अंग्रेजी का कोई स्थान नहीं हो। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में शिक्षा में भाषा विषयक प्रावधान बहुत स्पष्ट हैं। इसमें मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा तथा समुन्नत प्रादेशिक भाषाओं और हिन्दी में उच्चतर शिक्षा की व्यवस्था है। यह सभी भारतीय भाषाओं को महत्व और सम्मान देती है। राजनीतिक स्वार्थ और सत्ता के दुष्चक्र में भाषा के सवाल को जिस तरह उलझाया गया है, उसमें समाधान का मार्ग राष्ट्रीय संकल्प से ही निकल सकता है। भारतीय भाषाओं के बीच परस्पर सम्मान और सौहार्द्र से यह गुत्थी सुलझ सकती है। टालमटोल की रीति-नीति से गुत्थी और अधिक उलझ रही है। ‘स्किल’ के रूप में अंग्रेजी और अन्य प्रमुख विश्व भाषाओं के पठन-पाठन से कोई असहमति नहीं है। परंतु राजभाषा के रूप में अंग्रेजी कतई स्वीकार्य नहीं हो सकती। अपनी राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा होता है। विदेशी राजभाषा का होना गुलामी का कारक होता है। शिक्षा के माध्यम, प्रशासनिक काम-काज, संसदीय कार्य व्यवहार और न्यायालयों की भाषा के रूप में अंग्रेजी का प्रयोग समाप्त किया जाना भारत की स्वतंत्रता को संपूर्ण बनाएगा। भारतीय मातृभाषा अनुष्ठान के सूत्र इस प्रकार हो सकते हैं-
- भाषा राष्ट्र की अस्मिता, संस्कृति की संवाहक और समाज का स्वाभिमान होती है। वस्तुतः भाषा समाज की सामूहिक थाती होती है। अतः समाज का ही दायित्व है कि वह अपनी भाषा के गौरव पर आँच न आने दे।
- हर भारतीय अपनी भाषा पर अभिमान रखे। अन्य भारतीय भाषाओं का सम्मान करे।
- राजभाषा का प्रावधान निम्नलिखित अनुसार कार्यान्वित होना चाहिए-
3.1 भारत की राजभाषा संविधान में मूलरूप से किए गए प्रावधान के अनुसार हिन्दी हो।
3.2 अंग्रेजी का राजभाषा के रूप में स्थान न हो।
3.3 सभी हिन्दी प्रदेशों की राजभाषा हिन्दी हो।
3.4 आठवीं अनुसूची में सम्मिलित अन्य समुन्नत भारतीय भाषाएँ अपने-अपने प्रदेशों की राजभाषा हों। ऐसे राज्यों में द्वितीय भाषा के रूप में हिन्दी का प्रावधान हो।
3.5 भारत सरकार के राजभाषा विभाग में सभी भारतीय भाषाओं के अनुवाद की दक्ष व्यवस्था हो। हिन्दीतर प्रदेशों से उनकी राजभाषा (मातृभाषा) में आने वाले पत्रों और सभी पत्रकों, प्रस्तावों, प्रतिवेदनों आदि के त्वरित और प्रामाणिक अनुवाद की प्रभावी प्रणाली विकसित की जाए। भारतीय भाषाओं के बीच संपर्क और संवाद के लिए यही माध्यम रहे।
3.6 सभी राज्यों में राजभाषा विभाग की स्थापना हो। उनमें हिन्दी और प्रमुख हिन्दीतर भारतीय भाषाओं के त्वरित और प्रामाणिक अनुवाद की दक्ष प्रणाली विकसित की जाए।
3.7 अनुवाद की भाषा बनावटी न हो। सहज सामान्य भाषा का प्रयोग किया जाए।
3.8 बिन्दु क्रमांक 3.5 और 3.6 के क्रियान्वयन के लिए वित्तीय संसाधन का व्यवधान नहीं आए, इसके लिए यथा आवश्यकता बजट प्रावधान किए जाएँ।
3.9 प्रतिवर्ष 14 सितंबर को राजभाषा दिवस मनाया जाए। - नागरिक दैनन्दिन जीवन के प्रत्येक क्रियाकलाप में अपनी मातृभाषा का प्रयोग करें। शुद्ध वर्तनी और सही उच्चारण पर ध्यान दें। अपनी भाषा के अंकों को व्यवहार में लाएँ।
- जिनकी मातृभाषा कोई जनपदीय लोकभाषा हो, वे घर-परिवार और विवाह आदि सामाजिक कार्यों में उसी का प्रयोग करें।
- भारतीय भाषाओं के बीच शब्दों का आदान-प्रदान बढ़ाएँ। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाएँ परस्पर शब्दों की ग्राह्यता बढ़ाएँ। सबसे पहले ऐसे शब्द संकलित किए जाएँ जो समान रूप से भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त हो रहे हैं।
- भाषाओं में शब्दों की आवाजाही सामान्य प्रक्रिया है। हिन्दी में सैकड़ों ऐसे शब्द प्रचलित हैं जो अन्य भारतीय भाषाओं और विदेशी भाषाओं से आए हैं। वे हिन्दी भाषा में रच बस गए हैं। अन्य भाषाओं में भी ऐसा हुआ है।
- हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच श्रेष्ठ साहित्य का आदान-प्रदान बढ़े। अनुवाद के माध्यम से सभी भारतीय भाषाओं की उत्तम पुस्तकों का रसास्वादन हिन्दी पाठकों को सुलभ हुआ है। प्रादेशिक भाषाओं के साहित्य को विशाल हिन्दी पाठक समाज मिला है। अखिल भारतीय पहचान मिली है।
- शिक्षा का उद्देश्य और लक्ष्य ज्ञानार्जन होता है। शिक्षा मनुष्य को अच्छा मनुष्य, नागरिक को विवेक संपन्न उत्तरदायी नागरिक और सुसभ्य एवं सुसंस्कृत मानव बनाने का आधार रचती है। यह भाषा नीति व्यावहारिक और राष्ट्रीय हितों की पोषक हो सकती है-
9.1 प्राथमिक शिक्षा का माध्यम केवल मातृभाषा हो।
9.2 माध्यमिक विद्यालयों से विश्वविद्यालयों तक राष्ट्रभाषा हिन्दी का पठन-पाठन पूरे देश में हो। 9.3 जिन प्रदेशों की अपनी समुन्नत भाषाएँ हैं, वहाँ वही भाषाएँ शिक्षण का माध्यम हों। त्रिभाषा सिद्धांत के अनुरूप दूसरी भाषा के रूप में हिन्दी पढ़ाई जाए।
9.4 हिन्दी क्षेत्रों में विशेष भाषा के रूप में विश्वविद्यालयों में किसी न किसी हिन्दीतर भारतीय भाषा का पठन-पाठन आवश्यक हो। प्रदेश शासन के अधीन आने वाले विश्वविद्यालय विशेष भाषा के रूप में किसी एक या अधिक भारतीय भाषा को चुनें। यथा- तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड, बांग्ला, ओडिया, मराठी, गुजराती, पंजाबी, असमिया आदि। इस तरह हिन्दी क्षेत्रों में अन्य भारतीय भाषाओं को सम्मान दिया जाएगा, अपनाया जाएगा, तब उन भाषा क्षेत्रों में हिन्दी के प्रति रुझान बढ़ेगा।
9.5 हिन्दी प्रदेशों के अंतर्गत आने वाली लोकभाषाओं, यथा, भोजपुरी, अवधी, ब्रज, बुंदेली, बघेली, मालवी, निमाड़ी, राजस्थानी, कुमाँउनी, गढ़वाली, हिमाचली, कौरवी, मध्यदेशी आदि; संबंधित लोकभाषा के क्षेत्र में आने वाले विश्वविद्यालयों में हिन्दी के एक विशेष प्रश्नपत्र के रूप में उनका अध्ययन आवश्यक हो। उनमें शोध का प्रावधान भी रहे।
9.6 ज्ञान-विज्ञान के वैश्विक संपर्क के लिए अँगरेजी भाषा का अध्ययन कराया जाता है। इसके साथ-साथ फ्रेंच, जर्मन, जापानी, रूसी, मंदारिन, अरबी आदि भाषाओं के शिक्षण की व्यवस्था रहे। परंतु विदेशी भाषाओं को केवल ‘स्किल’ के रूप में अपनाया जाए। - हिन्दी और भारतीय भाषाओं को रोजगार परक स्वरूप दिया जाए। विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भाषा के रूप में ढाला जाए।
- जिस तरह कम्प्यूटर में अंग्रेजी के ‘स्पेल चैक’ की व्यवस्था है, उसी तरह हिन्दी और भारतीय भाषाओं के लिए भी सही शब्द/वर्तनी की जाँच की प्रणाली सूचना प्रौद्योगिकी में विकसित की जाए।
- सभी प्रदेशों में व्यापारिक और अन्य प्रतिष्ठानों पर लगाए जाने वाले नामपट पर सबसे ऊपर और प्रमुखता से उसी प्रदेश की राजभाषा में नाम अंकित किया जाना चाहिए। ओडिशा राज्य में ओडिया के प्रयोग के लिए दण्डात्मक अधिनियम लागू किया गया है। इसके उल्लंघन पर जुर्माना और सजा का प्रावधान है।

भारत की ग्यारह शास्त्रीय भाषाएँ
भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय ऐसी भाषाओं को शास्त्रीय भाषा की मान्यता देता है, जो- 1. 1500-2000 वर्ष या उससे अधिक प्राचीन लेख अथवा इतिहास इस भाषा में उपलब्ध होना चाहिए।
- भाषा को पढ़ने-लिखने-बोलने वाले लोग इस भाषा के प्राचीन साहित्य और प्रलेखन को अमूल्य साहित्यिक धरोहर मानते हों।
- भाषा की साहित्यिक परंपरा अनूठी और मौलिक होनी चाहिए। तदनुसार संस्कृति मंत्रालय ने इन ग्यारह भारतीय भाषाओं को शास्त्रीय भाषा की मान्यता प्रदान की है-तमिल (2004), संस्कृत (2005), कन्नड (2008), तेलुगु (2008), मलयालम (2013), ओडिया (2014), बांग्ला (2024), असमिया (2024), मराठी (2024), पालि (2024) और प्राकृत (2024)। शास्त्रीय भाषाओं के विद्वानों के लिए दो अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किए जाएँगे। शास्त्रीय भाषाओं में अध्ययन के लिए एक उत्कृष्टता केन्द्र स्थापित किया जाएगा। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अनुरोध किया जाएगा कि वह कम से कम केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में शास्त्रीय भाषाओं को लिए पीठ की स्थापना करे। इनमें प्रतिष्ठित विद्वानों के लिए कार्य करने की सुविधा उपलब्ध कराए। मातृभाषा-साहित्य से लगाव का अनन्य उदाहरण यह घटना 14 जुलाई, 2024 की है। पद्मश्री से सम्मानित मराठी के लोकप्रिय कवि नारायण सुर्वे की बेटी के रायगड स्थित घर में चोरी हुई। चोर उनके घर से कीमती सामान चुरा ले गया। जब कोई हलचल नहीं हुई तब वह दूसरे दिन भी चोरी करने पहुँचा। सामान की उठा-धरी में उसकी दृष्टि दीवार पर लगे सुर्वे जी के पद्मश्री प्रशस्ति पत्र तथा सम्मानों और पुरस्कारों पर पड़ी। उसे ग्लानि हुई। उसने चोरी किया सामान वापस घर में रखा। क्षमा याचना का पत्र भी लिखा- यदि पता होता कि कवि का घर है तो कभी चोरी नहीं करता। काश! सभी मातृभाषाओं में अनुराग की यही भावना पनपे। (मुद्दा चोर और चोरी का नहीं, भाषा से अपनत्व और जुड़ाव का है।) क्या हिन्दी समाज में अपनी भाषा-साहित्य के प्रति ऐसे अनुराग की कल्पना की जा सकती है?

विजयदत्त श्रीधर
संस्थापक-संयोजक
सप्रे संग्रहालय, भोपाल
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