नरसिंहपुर जिले के सैनानियों ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया था भारत छोड़ो आंदोलन में….
भारत छोड़ो आंदोलन, जिसे इतिहास में अगस्त क्रांति के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का निर्णायक पड़ाव है. अनेक बड़े विचारक एवं लेखक तो यहां तक मानते हैं कि भारत को राजनीतिक आजादी भले ही 15 अगस्त 1947 को मिली लेकिन भारतीय जनमानस 8 अगस्त 1942 को ही देश को आजाद मानने लगा था. इसी दिन गांधी जी ने “अंग्रेजो भारत छोड़ो” का नारा देते हुए यह घोषणा की थी कि – “आज से प्रत्येक भारतीय अपने आप को स्वतंत्र समझे” .
आंदोलन की घोषणा के साथ ही अंग्रेज सरकार का दमन चक्र भी चल पड़ा और रातों-रात तमाम बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए. देश भर में “अंग्रेजो भारत छोड़ो” का नारा गूंजने लगा.
राजनैतिक दृष्टि से अत्यंत जागरूक महाकौशल अंचल का नरसिंहपुर जिला कहां पीछे रहने वाला था. पूज्य पिताश्री तपोनिष्ठ पं.सुंदरलाल श्रीधर अपनी कृति “नरसिंहपुर जिले में स्वतंत्रता संग्राम” में लिखते हैं –
“द्वितीय विश्व युद्ध पूरे जोर पर था.सहायता बटोरने हेतु मध्यप्रांत के गवर्नर ट्वाइनम का कार्यक्रम नरसिंहपुर में रखा गया. कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन निश्चित किया. बुलेटिन “स्वाधीनता संग्राम” के अंक प्रतिदिन निकाले जाने लगे.
(“स्वाधीनता संग्राम” शीर्षक साइक्लोस्टाइल बुलेटिन पं. सुंदरलाल श्रीधर द्वारा करेली से निकाला जाता था, जो उस दौरान महाकौशल अंचल में स्वतंत्रता आंदोलन की प्रमुख आवाज़ था)
जिले के सभी रेलवे स्टेशनों विक्रमपुर से बनखेड़ी तक तथा नरसिंहपुर नगर में विभिन्न स्थानों पर विरोध प्रदर्शन की व्यवस्था की गई. प्रदर्शनकारी नारे लगाते हुए घूमने लगे,जिन्हें गवर्नर के आगमन के पूर्व गिरफ्तार करके पुलिस अधिकारी निश्चित हो गए. उन्होंने रिज़र्व फोर्स की कल्पना नहीं की थी. हर स्थान और मौके पर गवर्नर को काले झंडे दिखाए गए और युद्ध विरोधी नारे लगाए गए. मरका निवासी श्री बाबूलाल ने मीटिंग हॉल में प्रवेश कर गवर्नर के सामने काला झंडा फहरा दिया तथा युद्ध विरोधी नारा लगाया. सभी आश्चर्यचकित रह गए. इस आंदोलन में लगभग 200 गिरफ्तारियां की गई थीं.
1942 का अगस्त माह आया. ठाकुर निरंजन सिंह कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच की कड़ी थे. मुंबई कांग्रेस अधिवेशन में क्या होगा इसका आभास तो था,पुष्टि की पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र ने.उन्होंने मुंबई जाते हुए कहा – “कह नहीं सकते हम लोग वापस आएंगे. इस बात का ध्यान रहे, यह जबलपुर का पड़ोसी और निरंजन बाबू का जिला है.”
मिश्र जी की उक्ति रातों-रात साइक्लोस्टाइल पर उतार दी गई और सारे जिले में वितरित भी कर दी गई.
अब प्रतीक्षा थी निर्णय की. वह 9 अगस्त के ब्रह्म मुहूर्त में “करो या मरो” के पैगाम के साथ सर्वविदित हो गया. जिले के सभी नगरों और केंद्रस्थ गांवों में जुलूस और सभाएं करके “करो या मरो” का पैगाम सुनाया जाने लगा.दमन चक्र चल पड़ा. धड़ाधड़ गिरफ्तारियां होने लगीं. अनेक लोग भूमिगत रहकर आंदोलन संचालित करते रहे. सालीचौका और बोहानी स्टेशनों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया. गाडरवारा से करेली के बीच तमाम तार काट दिए गए. गोटेगांव रेलवे पुलिया में डायनामाइट लगाया गया.विस्फोट नहीं हो पाया और पकड़ा गया. सालीचौका,बाबई खेरुआ, कौड़िया, बोहानी,सिहोरा,हर्रई आदि ग्रामों पर सामूहिक जुर्माने बलात बसूले गए.
23 अगस्त के दिन चीचली ग्राम में आयोजित जुलूस और आम सभा पर लाठीचार्ज किया गया. जनता टस से मस नहीं हुई . तब पहले छर्रे और फिर गोलियां चलाई गईं. श्री मंसाराम घटनास्थल पर ही शहीद हो गए और गौराबाई भी. दूसरे दिन प्रातः पुलिस फौज के सौ- डेढ़ सौ जवानों के साथ चीचली पहुंची. राह चलते जो जहां मिला उसे पकड़ा और मारा. पिटाई इतनी बेरहमी से की गई कि एक महीने के भीतर ही दो-तीन लोगों की मौत हो गई. लगभग 50 लोगों को बंदी बनाकर गांव में घुमाया गया तथा चौराहों पर हवाई फायर किए गए.”
भारत छोड़ो आंदोलन कितना व्यापक और निर्णायक था, उक्त विवरण इसकी एक हल्की सी झलक भर देता है. पूरा देश उद्वेलित था भारत माता के पैरों से गुलामी की जंजीरें काटने के लिए. हजारों लाखों लोगों ने कष्ट सहे हैं भारत की आजादी के लिए. उनमें से अधिकांश लोग ऐसे थे जो बेहद साधारण परिवारों से थे….और जिनमें से अधिकांश के तो हम नाम भी नहीं जानते.
भारत छोड़ो आंदोलन दिवस पर ऐसे तमाम ज्ञात- अज्ञात स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को शत शत नमन…

