यूरिया संकट : तंत्र की असफलता का खामियाजा भुगतने के लिए अभिशप्त है किसान

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दावा किया गया था कि भारत शीघ्र ही उर्वरक,खास तौर पर यूरिया के मामले में आत्मनिर्भर हो जाएगा,लेकिन ऐसा होता दिखता नहीं है। तमाम दावों के बावजूद यूरिया की किल्लत अब भारतीय कृषि का स्थाई भाव बन चुकी है। बल्कि यूं कहा जाना चाहिए कि सीजन चाहे रवी का हो अथवा खरीफ का,किसान जानता है कि खाद की किल्लत होना ही है।
अब तक कृषि कार्यों के अंतर्गत खेत तैयार करने से लगाकर फसल की कटाई जैसी गतिविधियां ही गिनाई जातीं थीं।अब समय पर पर्याप्त मात्रा में खाद प्राप्त करने की जद्दोजहद भी किसान के नियमित कार्यों में शुमार है।
यूरिया का संकट और खाद वितरण के दौरान मचने वाला बवाल अब एक परंपरा है।

यूरिया का उत्पादन पूर्णतः केंद्र सरकार के नियंत्रण में है। उत्पादन से लगाकर आयात तक सब कुछ केंद्र नियंत्रित उर्वरक कंपनियों के हाथों में है। राज्य सरकारें अपनी आवश्यकता के अनुसार यूरिया की मांग करती हैं। केंद्रीय एजेंसियां तदनुसार राज्यों को खाद का कोटा आबंटित करती हैं।

केंद्र सरकार प्रतिवर्ष दावा करती है कि राज्यों को यूरिया का पर्याप्त कोटा आवंटित किया जाता है। इधर राज्य सरकारें भी यूरिया की पर्याप्त उपलब्धता का दावा करती हैं। लेकिन जमीनी सच्चाई इसके बिलकुल उलट होती है।

यदि खाद का पर्याप्त स्टाक है,तो किसानों को सहजता से उपलब्ध क्यों नहीं है? क्यों किसान रात-रात भर लाइनों में बैठने के लिए विवश हैं? क्यों उन्हें आवश्यकता से कम मात्रा में खाद दिया जा रहा है? खाद वितरण को लेकर जगह-जगह बवाल क्यों मचा हुआ है? खाद वितरण केंद्रों पर पुलिस लाठियां क्यों भांज रही हैं? किसान ब्लैक में खाद खरीदने के लिए क्यों मजबूर है?

समस्याएं सिर्फ दावों और आंकड़ों से हल नहीं होतीं। अगर हो रही होतीं तो किसान दर-दर की ठोकरें नहीं खा रहे होते। यदि सरकारी तंत्र सजग होता तो खाद वितरण की समस्या विकराल स्वरूप धारण नहीं करती।

व्यवस्थागत खामियां केवल खाद के वितरण संजाल पर ही हावी नहीं है,तंत्र नकली खाद बीज माफिया पर नियंत्रण स्थापित करने में भी पूर्णतः असफल रहा है,जिसका खामियाजा भुगतने के लिए किसान अभिशप्त हैं।

जानकार बताते हैं कि यूरिया संकट के पीछे मुख्य वजह है उर्वरक कंपनियों द्वारा अपनी पूरी उत्पादन क्षमता का दोहन न करना ; जिसके फलस्वरूप मांग और आपूर्ति में निरंतर अंतराल बना रहता है।
यह भी देखने में आया है कि विगत कुछ वर्षों से यूरिया की मांग में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है,जिसका अनुमान लगाने में जिम्मेदार प्रशासनिक अमला असफल साबित हुआ है।

जिनके ऊपर किसानों को खाद बीज उर्वरक समय पर उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है,वह इन दिनों एक नया ही राग अलाप रहे हैं ‌। उनका कहना है कि खाद तो पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है,लेकिन समस्या ‘पैनिक बाइंग’ के कारण हो रही है।
इसका सीधा सा मतलब है,कि समस्या किसानों के उतावलेपन की वजह से है।
अब इन जिम्मेदारों को कौन समझाए कि किसानों के लिए समय पर खाद बीज की उपलब्धता क्या मायने रखती है? रात-रात भर भूखे प्यासे रहकर लाइनों में लगे रहना और व्यवस्था के नाम पर पुलिस के डंडे खाना किसानों का शौक नहीं,मजबूरी है।

यदि थोड़ी देर के लिए पेनिक बाइंग को ही यूरिया संकट की बड़ी वजह मान लिया जाए तो भी इतना तो मानना पड़ेगा कि जिम्मेदार तंत्र विगत कई वर्षों से समय पर खाद उपलब्ध कराने में असफल रहा है, जिसकी वजह से किसानों का भरोसा टूटा है।

दरअसल पैनिक बाइंग के नाम पर यूरिया संकट का ठीकरा किसानों के सर पर फोड़ने का प्रयास अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने जैसा है। जबकि जरूरत है एक ऐसी निर्दोष वितरण प्रणाली विकसित करने की जो किसानों में तंत्र के प्रति विश्वास पैदा करे।

जब तक वितरण प्रणाली दोषमुक्त नहीं होगी,तब तक यूरिया डीएपी का संकट बना रहेगा और तंत्र के प्रति किसानों का अविश्वास भी कायम रहेगा।

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