राष्ट्र के महत्वपूर्ण घटकों में भाषा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. देश की संस्कृति भाषा के माध्यम से ही स्पंदित होती है. इस मामले में भारत अत्यंत समृद्ध है.विविधताएं हमारे समृद्धशाली होने की प्रतीक हैं. विविधता जीवन के प्रायः प्रत्येक क्षेत्र में है. इसे रीति-रिवाजों,खान-पान,पहनावा, त्यौहार, सामाजिक ताना-बाना हर जगह महसूस किया जा सकता है. अनेकानेक भाषाओं और बोलियों का अत्यंत समृद्ध संसार हमारे देश को और भी विशिष्ट बनाता है.इस विविधता और बहुलता को एक सूत्र में बांधने का काम करती है यहां के निवासियों की नैसर्गिक आध्यात्मिक प्रवृत्ति,जिसके कारण तमाम विविधताएं एक बिंदु पर आकर एकाकर हो जाती है.
भाषा इसमें प्रमुख भूमिका निभाती है.
जब-जब भी समाज को आवश्यकता पड़ी,तत्कालीन महापुरुषों ने सर्वाधिक प्रचलित और समादृत भाषा के माध्यम से पुनर्जागरण और पुनरुत्थान की अलख जगाई.
पहले संस्कृत सांस्कृतिक पुनर्जागरण की वाहक बनी,फिर वही काम संस्कृत की स्वाभाविक उत्तराधिकारी हिंदी के माध्यम से किया गया.
आद्य शंकराचार्य,रामानुज, मध्व और वल्लभाचार्य इनमें से किसी की मातृभाषा संस्कृत नहीं थी, फिर भी उन्होंने संस्कृत की व्यापकता को देखते हुए न केवल उसे अपनाया अपितु उसके माध्यम से सांस्कृतिक पुनर्जागरण और पुनरुत्थान की अलख जगाई.
जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था और स्वतंत्र होने के लिए कसमशा रहा था,तब एक बार पुनः देशवासियों में अपने अतीत के प्रति गौरव भाव भरने और उन्हें एकता के सूत्र में बांधने की आवश्यकता महसूस हुई.
हमारे पूर्वजों ने यह महसूस किया कि पुनर्जागरण और पुनरुत्थान के लिए ऐसी भाषा उपयोगी सिद्ध होगी जिसे देश के अधिसंख्य लोग समझते हों. हिंदी में वह क्षमता थी कि वह स्वतंत्रता आंदोलन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की आवाज बन सके.
स्वातंत्र्य समर और पुनर्जागरण काल के तमाम स्वनामधन्य पुरोधा, जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं थी, वह आगे आए और उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की पुरजोर वकालत की.
इन महापुरुषों में बाल गंगाधर तिलक, चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य,राजा राममोहन राय, रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस आदि का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है.
महात्मा गांधी तो हिंदी के प्रबल हिमायती रहे हैं. गुजरात शिक्षा सम्मेलन (1917) के अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा था – “किसी देश की राष्ट्रभाषा वही भाषा हो सकती है जो वहां की अधिकांश जनता बोलती हो. वह सांस्कृतिक ,राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में माध्यम भाषा बनने की शक्ति रखती हो.वह सरकारी कर्मचारियों एवं सरकारी कामकाज के लिए सुगम तथा सरल हो. जिसे सुगमता और सहजता से सीखा जा सकता हो. जिसे चुनते समय क्षणिक,अस्थाई और तात्कालिक हितों की उपेक्षा की जाए और जो संपूर्ण राष्ट्र की वाणी बनने की क्षमता रखती हो. बहुभाषी भारत में केवल हिंदी ही एक भाषा है जिसमें यह सभी गुण पाए जाते हैं.”
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और स्वतंत्रता के पश्चात संपर्क भाषा के रूप में हिंदी ने अपनी उपयोगिता बार-बार सिद्ध की है. राजनीतिक मंचों पर कभी-कभार हिंदी के प्रति कुछ प्रतिगामी विचार सुनने को मिलते हैं, लेकिन उपयोगिता की दृष्टि से ही सही,लोक में हिंदी की स्वीकार्यता दिनों-दिन बढ़ी है.
हिंदी की स्वीकार्यता में हिंदी प्रेमी विद्वानों और जननायकों का योगदान तो है ही,हिंदी ने अपनी उपयोगिता की बदौलत भी स्वयं का विस्तार किया है. भूमंडलीकरण के दौर में भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था में पैर जमाने के लिए यह जरूरी है कि देश में सर्वाधिक प्रचलित भाषा में संवाद किया जाए. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रतिनिधियों में हिंदी के प्रति रुझान इसीलिए बढ़ा है.
हिंदी के प्रति आग्रह देश की स्वाभाविक आवश्यकता है. देश का ऐसा कोई हिस्सा नहीं है जहां के लोगों को हिंदी का कार्य साधक ज्ञान ना हो और जहां की स्थानीय भाषा के प्रचलित शब्दों को हिंदी ने ना अपनाया हो.
हिंदी स्वभाव से ही सर्वग्राही है. अपने मूल आधार संस्कृत से तो वह समृद्ध होती ही है, विभिन्न अंचलों में प्रचलित बोलियां भी उसे समृद्ध करती हैं. उर्दू,फारसी और अंग्रेजी से आए शब्द हिन्दी में आकर ऐसे घुल-मिल गए हैं कि वह बाहरी लगते ही नहीं है.
इतना ही नहीं,खड़ी हिंदी की लिपि में भले ही एकरूपता दिखती हो, बोलचाल की हिंदी ने स्थानीयता के आधार पर भी अपने आप को विकसित किया है. हैदराबादी हिंदी अथवा मुंबईया हिंदी इसके उदाहरण हैं.
हिंदी आज भारत की ही नहीं,अपितु समूचे विश्व की आवश्यकता है. विश्व पटल पर भारत के बढ़ते महत्व और विशाल भारतीय बाजार ने हिंदी को और भी महत्वपूर्ण बना दिया है. वर्तमान में शताधिक देशों में हिंदी की न्यूनाधिक उपस्थिति है. लगभग 50 देशों के 165 विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है. एक अध्ययन के अनुसार विश्व के लगभग 1450 मिलियन लोग हिंदी जानते हैं, जबकि अंग्रेजी जानने वाले 1268 मिलियन तथा मंदारिन जानने वालों की संख्या 1120 मिलियन हैं.
हिंदी विकास,बाजार और मीडिया की भाषा बन रही है.यह राष्ट्रीय सीमाओं को लांघते हुए विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित होने की ओर अग्रसर है.
बाजार की ज़रूरतों को देखते हुए ही सही, एक ओर तो हिंदी का दायरा दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है, दूसरी ओर देश में एक तथाकथित श्रेष्ठि वर्ग ऐसा भी है जो अंग्रेजी के व्यामोह में उलझा हुआ है. दरअसल यह प्रवृत्ति आत्मोन्नति की राह में स्वयं अवरोध पैदा करने जैसी है.
जरूरत इस बात की है कि हम सम्मान तो सभी भाषाओं का करें, ज्ञानार्जन की दृष्टि से अधिक से अधिक भाषाएं सीखें, लेकिन गर्व उस हिंदी भाषा पर करें जो राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है और समूचा विश्व जिसे अपनाने के लिए उत्सुक है.

*अरविन्द श्रीधर


हिन्दी एक समृद्ध भाषा है,इसका महत्व कभी कम नहीं हो सकता।
शानदार आलेख