श्री प्रेमनारायण नागर का संस्मरण
जन्म 1-10-1926, चाचैड़ा, जिला-गुना (मध्यप्रदेश)। स्वतंत्रता सेनानी एवं गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता। सन 1947 से पत्रकारिता में सक्रिय। ‘नईदुनिया’ के शिवपुरी संवाददाता। आदर्श आंचलिक पत्रकारिता के प्रतिमान, बहु प्रशंसित एवं पुरस्कृत। ‘माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता पुरस्कार’ एवं सजग पत्रकारिता हेतु राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित। सप्रे संग्रहालय के संस्थापक सदस्य। पत्रकारिता के साथ ही रचनात्मक और सार्वजनिक क्षेत्रों का मेरा कार्यकाल पांच दशक से भी अधिक होने से संभवतः अनेक स्मृतियाँ लिपिबद्ध नहीं कर पा रहा हूँ। फिर भी कुछ ऐसी घटनाएँ हैं जो आज भी स्मृति पटल पर कौंध जाती हैं। उनमें से आंचलिक पत्रकारिता के संदर्भ में उल्लेखनीय घटनाएँ लिख रहा हूँ। पचास वर्षों में इतना लिखा कि यदि उन लिखी कतरनों को संगृहीत करूँ तो वह पुस्तक का आकार ले ले। पत्रकारिता को कभी व्यवसाय नहीं, मिशन ही माना। मैंने पत्रकारिता मिशन के रूप में स्वीकार की थी, व्यवसाय के रूप में नहीं, क्योंकि आजादी के आंदोलन में भाग लेते रहने से जन जागृति पर ही कलम चलती रही। आजादी के पश्चात विकास, निर्माण, समाज सुधार, नैतिकता, पर्यावरण आदि जीवन के सभी पक्षों पर विगत पाँच दशकों तक कलम खूब चली। क्रूर हत्याएँ, बलात्कार, महिलाओं, दलितों, मजदूरों, किसानों पर होने वाले अन्याय, अत्याचारों आदि घटनाओं को कभी अतिरंजित बनाकर लिखने का प्रयास नहीं किया। परंतु आज सत्ता सम्पत्ति की अंधी और अनैतिक दौड़ में धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार के समाचार लिखते-लिखते आत्मा ही नहीं लेखनी भी रोती है। आजादी के आन्दोलन के समय देश, समाज को दिशा देने के लिए नेताओं ने क्या सोचा था? हो क्या रहा है? वर्ष 1946 में जयपुर के जौहरी बाजार के खादी भंडार में कार्यरत रहते समय पूज्य गांधी जी ने खादी ग्रामोद्योग क्षेत्र में लगे चन्द कार्यकर्ताओं को दिल्ली बुलाया। 8 अक्टूबर, 1946 को कार्यकर्ताओं से बापू ने कहा- ‘शहरों में नहीं- ग्रामों में जाओ’। ग्रामीण क्षेत्रों के उद्योग धन्धों को बचाना ही नहीं, उनमें सुधार लाकर ग्रामीणजन को कामधंधा देना होगा। इसी परिप्रेक्ष्य में मुझे भी ग्रामीण क्षेत्र में ग्वालियर की तहसील जाना पड़ा- भाण्डेर से पन्द्रह कि.मी. दूर ग्राम उडीना में, जहाँ न सड़कें थीं, न आवागमन का साधन। वर्षां में दो-दो नदियों को तैर कर पार करना पड़ता था। मैं इस क्षेत्र में एक वर्ष रहा। इसी समय निकट के ग्राम भिटारी भरका में घटना घटी- खेत की भूमि को लेकर दो पक्षों के झगड़ें में एक हरिजन मजदूर की मृत्यु हो गई। निकट के थाना पड़ोखर से पुलिस आई और भाण्डेर से तहसीलदार, उनके साथ मृतक परिवार की झोपड़ी तक गया। तहसीलदार ने मृतक की पत्नी को दाह संस्कार आदि कार्यों के लिए आर्थिक मदद देनी चाही। झोपड़ी के दरवाजे पर एक बालिका उदास बैठी थी। ग्राम के चैकीदार ने बच्ची से कहा- ‘‘माँ को बाहर बुला ला, साहब रुपए देंगे।’’ बालिका ने बड़े भोलेपन से कहा- ‘‘अम्मा बाहर नहीं आएगी।’’ बालिका पर बहुत दबाव डालने पर अपने घुटनों के मध्य सिर छुपाते आँखों में आँसू लिए निराशा भरे स्वर में बालिका ने कहा था- ‘‘अम्मा बाहर नहीं आएगी- वो नंगी बैठी हैं घर में एक ही धोती थी वो दद्दा (पिता) पर डार दई।’’ गरीबी की चरम सीमा की मार्मिक अभिव्यक्ति के यह शब्द सुनकर हम सभी के सिर शर्म से झुक गए। किसी प्रकार पड़ोसी को बुलाकर तहसीलदार ने जाप्ता पूरा किया। इस कारुणिक घटना को मैंने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के अनुज श्री सियारामशरण गुप्त को लिख भेजा। उडीना ग्राम में जाने के लिए चिरगांव होकर ही जाना पड़ता था। झांसी के एक साप्ताहिक में यह समाचार प्रकाशित हुआ। जो काफी चर्चित होने पर कानपुर के समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुआ था। कुछ समय पश्चात किन्हीं कथाकार बंधु ने इस घटना को कहानी रूप देकर पत्रिका में प्रकाशित भी कराया था। आजादी के आन्दोलन के समय पत्रकारिता क्या होती है? इसका कोई ज्ञान नहीं था। यह आजादी के संघर्ष का एक मार्ग था। आंदोलन के समय पुलिस प्रशासन के दबावों के मध्य समाचार-संप्रेषण निकालने के लिए हाथ से ही कंपोज करना और फुलस्केप साइन कागज पर जन चेतना के लिए बुलेटिन छापकर वितरित करना भी आंदोलन का अंग मानते रहे थे । परंतु इस हृदय विदारक घटना के पश्चात् ही मैं सही अर्थों में पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना प्रवेश मानता हूँ। मैं वर्ष 1948 में खादी-ग्रामोद्योग के उत्पादन एवं उनके प्रचार-प्रसार का कार्य प्रारंभ करने हेतु शिवपुरी आया। देश में आजादी का सूर्योदय हुआ। अनेक समाचारपत्र, पत्रिकाओं का जन्म भी आजादी के पश्चात हुआ। जो भी समाचार पत्र प्रकाशित होता मुझसे संपर्क करते। उस समय से आज तक लेखनी मेरी दूसरी संगिनी बन गई। अपने अन्य सेवा कार्यों के साथ पचास वर्षों तक निरंतर लिखता रहा। सामाजिक परिवेश में सत्य की नग्न प्रस्तुति, कटु विवरण करना मेरे स्वभाव में नहीं रहने से निष्पक्षता बनाए रखने के प्रयास में रहता हूँ। पाँच दशकों से पत्रकारिता क्षेत्र में सक्रिय रहने से राष्ट्रपति, राज्यपाल, मंत्रीगण से लेकर पत्रकारिता के संगठनों से मान-सम्मान भी बहुत मिले। परंतु जब कोई खोजपूर्ण समाचार प्रकाशित हुआ है, जिससे किसी दुखी व्यक्ति का दुख दूर हो और समाज को उससे लाभ मिला है, तो इसी को सच्चा मान-सम्मान समझ कर आतमसंतोष महसूस करता रहा हूँ। घटना 1983 की है। शिवपुरी नगर के एक चालाक व्यापारी ने पुलिस से मिलकर किसानों को जेल भिजवाया। उस समय गेहूँ का भाव 150 रु. क्विंटल होने पर उस व्यापारी ने गाँव-गाँव जाकर 200 रुपए क्विंटल के भाव से कृषकों से कुछ समय पश्चात भुगतान करने की शर्त पर लाखों रुपए का गेहूँ खरीद लिया। समय पर भुगतान न होने पर कृषकों ने व्यापारी के घर बहुत चक्कर लगाये, पर भुगतान का नाम नहीं। एक दिन कृषकों की सभा में गया। वहाँ उसने दो दिन की मोहलत माँगी। जमानत के रूप में अपने पुत्र को उनके पास छोड़ दिया। कृषक संतुष्ट हुए। परंतु चालाक व्यापारी ने शिवपुरी नगर में आकर पुलिस से साँठ-गाँठ कर कोतवाली में अपने पुत्र के अज्ञात व्यक्तियों द्वारा अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने हरकत में आने का नाटक किया और व्यापारी पुत्र को कृषकों के निवास से बरामद कर दो दर्जन कृषकों को दस्यु विरोधी धाराओं के अंतर्गत जेल में डाल दिया। इन धाराओं में 6 माह तक जमानत नहीं हो सकती थी। सब कार्य इतने गोपनीय ढंग से हुआ कि 15 दिनों तक किसी को कानों काम खबर नहीं हुई। एक दिन मुझे भनक लगी। जेल गया, वहाँ सत्यता प्रगट हुई। दूसरे दिन ‘नईदुनिया’ में समाचार छपते ही भोपाल में हलचल मची और पचास दिनों तक जेल में बंद रहने के पश्चात कृषक जेल से छूट सके। तब तक व्यापारी अपनी संपत्ति समेट कर फरार हो चुका था। समाचार की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप जेल से रिहा होकर आए कृषकों का भीगी आँखों से प्रगट किया गया अभिवादन मेरे मन मस्तिष्क पर अमिट है। उनका यह मौन सम्मान ही मेरी लेखनी की निरंतर ऊर्जा का स्रोत है। एक घटना सन 1952 की है। तब क्षेत्र में दस्यु अमृतलाल का आतंक छाया हुआ था। शिवपुरी पदस्थ होकर आये युवा पुलिस अधीक्षक श्री चैन सिंह कदम। विद्यार्थी काल से ही मेरा शौक खेलों के प्रति रहा है-हॉकी, वालीवाल, फुटबाल मेरे प्रिय खेल थे। श्री कदम भी हॉकी के अच्छे खिलाड़ी थे। सो मित्रता हो गई। 8 जून 1952 को प्रातः 4 बजे पुलिस जीप आती है जो शीघ्र पोहरी की ओर पवा के जंगल में चलने की सूचना देती है। मार्ग में श्री कदम ने बताया कि पवा जंगल में दस्यु अमृतलाल तथा पुलिस के मध्य रात्रि 9 बजे से गोली चल रही है। पवा की ओर कच्चे मार्ग पर जाने से पूर्व जीप इसलिए रोकनी पड़ी कि गोलीबारी की आवाजें आ रही थीं। पौ फटने के साथ गोलीबारी की आवाज बंद हुई। आगे बढ़े। गोली चलने के स्थान पर जाकर देखा हरगोविंद नामक डाकू मृत पड़ा था, जिसे पुलिस की गोली से मरना बताया। डाकुओं से मुकाबला करने वाले रात्रि की गोलाबारी की घटनाएँ बताते रहे। पुलिस वालों में प्रसन्नता का आलम था। परंतु घटनाचक्र का जो वर्णन किया जा रहा था तथा मृत दस्यु की पीठ में लगी गोली से मुझे कुछ संदेह हुआ। पत्रकारिता में छिद्रान्वेषी होना भी एक स्वभाव होता है। सूत्रों से ज्ञात हुआ कि अमृतलाल का किसी महिला को लेकर अपने ही गिरोह के हरगोविन्द से मनमुटाव था। पवा के जंगल में चलते चलते पीछे से हरगोविंद को गोली मार कर इसकी सूचना उन पुलिस अधिकारियों के पास भेज दी जो दस्यु अमृतलाल से मिले थे। अपनी पदोन्नति के लिए यह पुलिस दल रात भर स्थान बदल बदल कर गोलियां चलाता रहा और गोलीबारी चलते रहने की सूचना शिवपुरी जिला मुख्यालय पर भेज दी। पवा जंगल से लौट कर मैंने पुलिस प्रशंसा में ग्वालियर समाचार भेजा। परन्तु समाचार के अंत में चार लाइनों में संदेह भी प्रकट करने पर श्री कदम ने अपने सूत्रों से जाँच कराई तब राज प्रकट हुआ। पुलिस अधिकारी निलंबित हुए। यह थी छिद्रान्वेषी पत्रकारिता की दृष्टि, जिससे चार लाइन के समाचार से धोखाधड़ी प्रकट हुई। ऐसा भी नहीं है कि शासन के विरुद्ध समाचारों, आलोचनाओं से शासन की बदनामी या हानि होती है। अनेक बार जो लाभ शासन को होता रहा है उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। बात है 1989 की। 28 अगस्त को ‘नईदुनिया’ इंदौर के प्रथम पृष्ठ पर चार पंक्ति के मेरे समाचार ने प्रदेश भर के व्यापार क्षेत्र में तहलका मचा दिया था। विक्रय कर अधिनियम 1958 के अंतर्गत प्रदेश से अनाज बाहर भेजने पर व्यापारियों से 25 (ए) का फार्म भराकर अनाज बाहर निकलता था। म.प्र. की सीमा पर बने बैरियर पर व्यापारी यह फार्म देकर माल प्रदेश के बाहर ले जाता था। विक्रय कर विभाग में व्यापारियों के पत्रों की जाँच होने पर निकाले गए माल पर कर-अदायगी होती थी। 25 ‘ए’ फार्म की बैरियर नाकों पर एण्ट्री न होकर सेल्स टैक्स कार्यालयों में उन व्यापारियों की फाइलों में लगने आते। परंतु होता यह था कि जो फार्म भरकर माल निकाला गया उसके बैरियर से आने पर उसे लेकर विभाग के अधिकारी या बाबू उन व्यापारियों के पास जाते और 25 ‘ए‘ फार्म व्यापारी को वापस कर अच्छी रकम वसूल करते रहे। मध्यप्रदेश भर में इस जालसाजी से करोड़ों की हानि विभाग को हो रही थी। हेराफेरी और भ्रष्ट आचरण का पूरा विवरण जब प्रकाशित हुआ- शासन चैंका- अधिकारी, कर्मचारी निलंबित हुए। शासन को करोड़ों की होने वाली हानि बची। इस समाचार के प्रकाशित होने पर जहाँ संपादकजी की मुबारक आई, वहीं ईमानदार व्यापारियों को राहत भी मिली। 9 जुलाई 1992 को प्रथम पृष्ठ पर ‘नईदुनिया’ में मेरा समाचार था- ‘‘शिवपुरी के उद्योग विभाग के अधिकारियों और बिलासपुर के व्यापारी ने षड्यंत्र रच करोड़ों की हेराफेरी की।’’ जिले के कुम्हारों के नाम एक सहकारी समिति बनाकर ईंट भट्टों के नाम पर कोयले का परमिट प्राप्त करते रहे। कोलारस जाकर देखता हूँ- न ईंट, न भट्टों का नाम। समिति के सदस्यों को कुछ रुपये देकर अँगूठे लगवाते रहे। जब समाचार प्रकाशित हुआ, भांडा फूटा, दौड़ धूप हुई, कर्मचारी जेल गए, कुछ निलंबित हुए। इतना ही नहीं, बिलासपुर का व्यापारी इस मामले में सुप्रीम कोर्ट तक गया। कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक को मानहानि के नोटिस तक आए- परंतु सुप्रीम कोर्ट में ‘नईदुनिया’ समाचार पत्र को पेश करने पर कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक को मानहानि से मुक्ति मिली। कृषि प्रधान देश भारत में यह कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि मध्यप्रदेश में गौमाताएँ बिना चारा-पानी के तड़पा-तड़पा कर इसलिए मारी गईं कि उनके मरने पर चमड़े, हड्डी, खुर, आँतों आदि का विक्रय कर धन कमाया जाए। घटनाक्रम है मार्च 1985 का। शिवपुरी के निकट ग्राम लुधावली में गौसदन है जहाँ बूढ़ी, कृषकाय गायें और गौवंश को रखा जाता है। उनके चारे-पानी का प्रबंध है। जब तक जीवित रहें खाएँ-पिएँ, मृत्यु के पश्चात चमड़े हड्डी आदि विक्रय की व्यवस्था है। 29 मार्च 1985 को ‘नईदुनिया’ तथा अन्य समाचारपत्रों में मैंने लिखा था- गौसदन जहाँ गाएँ पाली नहीं, मारी जाती हैं। संपूर्ण विवरण मय हड्डियों तथा दुबली गायों के चित्र सहित प्रकाशित हुआ कि किस प्रकार इन मूक पशुओं को बिना चारा-पानी के भूखा मारा जाता है। जीवित अवस्था में ही इतनी शक्तिहीन कर दी जाती हैं कि गिद्ध चील उनकी आँखें नोंच नोंचकर खाते हैं। पशुपालन विभाग के अंतर्गत प्रभावशाली व्यक्ति के मैनेजर होने से दिन में चित्र ले नहीं सकते थे। रात्रि को किसी प्रकार चित्र लिए। समाचार प्रकाशित होने के साथ ही विधानसभा में इतना हल्ला हुआ कि तत्कालीन पशुपालन मंत्री शिवप्रताप सिंह ने तुरंत इसकी जाँच के आदेश ही नहीं दिए, व्यवस्थापक भी बदला। साथ ही प्रदेश के समस्त गौसदनों की उचित व्यवस्था के लिए आदेश प्रसारित किए। तब कहीं ये गौमाताएँ चारा-पानी के बिना तड़प-तड़प कर मरने से बचीं। आंचलिक पत्रकार घटनाओं और खबरों का लेखक मात्र नहीं होता। तथ्यों से सीधा साक्षात्कार उसकी लेखनी को मार्गदर्शक के रूप में स्थापित कर देता है। प्रशंसकों के सहयोग के साथ ही उनकी कमियों और उपलब्धियों के प्रकाशन में भी आंचलिक पत्रकारिता अग्रणी होती है। इस तारतम्य में दो खबरों का उल्लेख करना आवश्यक है। ‘‘आई.जी. ने लकड़ियाँ कटवाई’’ नामक समाचार ने जहाँ प्रदेश के सर्वोच्च पुलिस अधिकारी के कार्यों को कटघरे में ला दिया, वहीं डाकुओं के साथ संघर्ष में शहीद पुलिस अधिकारी के बारे में ‘एक युवा पुलिस अफसर की शौर्य गाथा’ शीर्षक खबरें प्रकाशित हुईं, जिन्होंने पुलिस की कमियों और उपलब्धियों को रेखांकित किया। आंचलिक पत्रकारिता खबरों से सीधे साक्षात्कार की होती है। क्या कुछ हुआ, उसी पर आधारित होने के कारण घटना को देखने का कोण और उसकी अभिव्यक्ति काफी महत्वपूर्ण रहती है। संपादकीय डेस्क से दूरी भी एक विशेष तत्व होता है। लेखन इस प्रकार का होना आवश्यक होता है कि संपादकीय विभाग में बैठे व्यक्ति के साथ सीधा संवाद, शब्द ही स्थापित कर ले। इसीलिए घटना का विवरण मात्र ही समाचार पत्र की नियमित खुराक नहीं बन पाता है। इसके लिए अभिव्यक्ति की शैली अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दृष्टि से मैं दो खबरों का उल्लेख करने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। पहली खबर स्थानीय राष्ट्रीय उद्यान में संरक्षित तीन नर, एक मादा तेंदुए में से उद्यान में तीन नर की मुठभेड़ में एक तेंदुए की मौत की है। मृत तेंदुए का नाम ‘राजा’, मादा का ‘रानी’ होना, पिंजरे को सुल्तान होटल नाम से संबोधित किए जाने संबंधी जानकारी ने एक खबरी रूपक का निर्माण कर दिया जो कि ‘‘रानी के मामले मेंु राजा की हत्या’’ के शीर्षक से प्रकाशित हुआ और अत्यंत चर्चित हुआ। आंचलिक पत्रकार की खबरों का दायरा, विषयों का चयन कुछ लोग सीमित मानते हैं, किन्तु वास्तविकता ऐसी नहीं है। तथ्यों की गंभीर समझ और शालीन अभिव्यक्ति बड़े से बड़े विषयों और विवादों को समेट सकती है। ‘नईदुनिया’ में 30 अप्रैल 1982 को प्रकाशित ‘माँ-बेटे का अश्रु्रपूर्ण संवाद’ शीर्षक समाचार में अंचल के राज परिवार के पारिवारिक विवाद पर लिखा। इस पर संपादक राजेन्द्र माथुर और अनेक पाठकों से प्रशंसा पत्र मिले। संक्षेप में कहने का आशय है कि आंचलिक पत्रकारिता की सीमाएँ अपार हैं। आवश्यकता गंभीर लेखन और स्थानीय व्यवस्थाओं से एक गरिमापूर्ण तटस्थता की है। स्थानीय तटस्थता की बात इसलिए भी जरूरी है कि आंचलिक पत्रकार घटनाओं और विवरणों से सीधा जुड़ा होता है। उसका जुड़ाव उसकी निष्पक्षता को प्रभावित नहीं करे, इसलिए तटस्थता आवश्यक है। इसके अतिरिक्त मीडिया की बढ़ती शक्ति के दृष्टिगत स्थानीय स्तर पर प्रच्छन्न रूप से अनैतिक कार्यों में लिप्त शासकीय सेवकों, व्यवसायियों, राजनीतिकों आदि द्वारा पत्रकारों से निकटता बढ़ाकर दुरुपयोग की आशंका भी मँडराती रहती है। सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहने और सूत्रों से मित्रता के खुले व्यवहार वाले पत्रकारों से निकटता स्थापित करना कोई दुष्कर कार्य नहीं है। अंत में एक बात, गरीबी से मृत पति के शव पर अपनी साड़ी का कफन डालकर निकट बैठी निर्वस्त्र महिला की 1947 की घटना से चली मेरी कलम देखना है- कितने दिनों तक और चलेगी? परंतु पत्रकारिता क्षेत्र में संलग्न भावी पीढ़ी के लिए प्रश्न विचारणीय है कि किसी भी प्रकार सत्ता-सम्पत्ति हस्तगत करने की अंधी दौड़ में चंद समूह देश की राष्ट्रीयता, नैतिकता को निर्वस्त्र करने में लगे हुए हैं- उनसे अपनी लेखनी को कैसे बचाया जाए? (यह संस्मरण सन 2000 में सप्रे संग्रहालय द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘स्मृति बिम्ब’ के लिए लिखा गया था।)


