धरा पर प्रकृति और परमात्मा का साक्षात्कार करना हो, तो गंगेश्वर महादेव मंदिर,दीव की यात्रा कीजिए। यह वह अलौकिक स्थल है, जहाँ अरब सागर का असीम विस्तार देवों के देव महादेव के चरणों में नतमस्तक होता है। यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं,अपितु श्रद्धा, सौंदर्य और समुद्र द्वारा अर्चना का एक अनूठा संगम है।
शहरी कोलाहल से दूर, लगभग तीन किलोमीटर की यात्रा के पश्चात फ़ुदम गाँव का पथ शुरू होता है। यहाँ का वातावरण सहसा मंत्रमुग्ध करने लगता है। संकरी पगडंडियाँ नारियल के वृक्षों की हरी-भरी छाँव से लिपटी हैं, और दूर क्षितिज से आती समुद्र की अठखेलियों का संगीत कानों में मधुर सरगोशी करता है। गाँव के अंतिम छोर पर पहुँचते ही, एक चट्टानी तट भक्त और प्रकृति-प्रेमियों को अपनी ओर खींच लेता है।
लहरों का नृत्य और पांडवों की विरासत
इस मंदिर का सर्वोच्च आकर्षण पाँच शिवलिंग हैं, जो किसी गर्भगृह के भीतर नहीं, बल्कि सागर की गोद में, एक चट्टानी पट्ट पर प्रतिष्ठित हैं। इन शिवलिंगों पर सागर की लहरें अनवरत, बिना थके, जलाभिषेक करती रहती हैं। ऐसा लगता है, जैसे ज्वार के समय समुद्र देव स्वयं अपने श्वेत फ़ेनिल हाथों से शिवलिंगों को श्रद्धा से ढँक लेते हैं, उनकी आराधना में लीन हो जाते हैं। यह दृश्य इतना मनोहारी होता है कि दर्शक सहज ही प्रकृति की भक्ति के सम्मोहन में बँध जाता है।
दंतकथाओं के अनुसार, इन पाँच शिवलिंगों की स्थापना महाभारत काल में पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान की थी। कहा जाता है कि प्रत्येक भाई ने अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार शिवलिंग का निर्माण किया था, जिनमें से सबसे महाकाय और विशाल शिवलिंग गदाधारी भीम की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इस दिव्य स्थल पर, शिवलिंगों के निकट ही एक छोटा-सा पांडव तालाब भी है,जो युगों पुरानी कथाओं की मौन गवाही देता है। स्थानीय किंवदंतियों में इसका उल्लेख है कि पांडव यहाँ स्नान-ध्यान कर आत्मिक शांति प्राप्त करते थे।
प्रकृति की भक्ति और आध्यात्मिकता के संगीत के बीच गंगेश्वर महादेव मंदिर का वातावरण अत्यंत शांत, पवित्र और आध्यात्मिक है। यहाँ न तो कोलाहल है, न ही भीड़ का अनावश्यक दबाव। यहाँ का आर्केस्ट्रा तो केवल तीन वाद्यों के बजने से बनता है—सागर की लहरों की ताल, हवा की सरगोशी,और आस्था की धुन।
इस मंदिर का महत्व केवल प्रचलित कथाओं तक सीमित नहीं है। समुद्री लहरों द्वारा किया जाने वाला यह निरंतर जलाभिषेक इस बात का जीवंत प्रतीक है कि ईश्वरीय आराधना पर केवल मनुष्य का ही एकाधिकार नहीं है, बल्कि प्रकृति भी परात्पर सत्ता की पूजा में सहभागी है। श्रद्धालु मानते हैं कि यहाँ के अलौकिक दर्शन से शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और मन को एक अद्वितीय शांति का अनुभव होता है।
दीव आने वाले पर्यटक, ऐतिहासिक पुर्तगाली धरोहर और रेतीले समुद्र तटों की सैर करने के बाद यदि इस मंदिर की आध्यात्मिक तरंगों का स्पर्श नहीं करते, तो उनकी यात्रा अधूरी ही कहीं जाएगी।


यदि इस दिव्य धाम को और अधिक संवारा जाए—जैसे साफ़-सुथरे मार्ग, ज्वार-भाटा की जानकारी देने वाले सूचना बोर्ड और विश्राम-स्थलों का प्रबंध,तो यह स्थल पर्यटन के मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण स्थल के रूप में पहचान बना सकता है। विशेष रूप से महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर होने वाले सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजन, देश-विदेश के यात्रियों को दीव की ओर खींच सकते हैं।
गंगेश्वर महादेव मंदिर का अनुभव वास्तव में अलौकिक है। यह केवल एक दर्शन नहीं, बल्कि प्रकृति के नर्तन और अखंड आस्था का मिलन देखने का सुअवसर है। यहाँ लहरों की गूँज और शिवलिंगों पर होता अभिषेक यह संदेश देता है कि भक्ति का प्रवाह निरंतर होना चाहिए, ठीक वैसे ही, जैसे समुद्र की लहरें—बिना रुके, बिना थमे गंगेश्वर महादेव का जलाभिषेक करती हैं।
जब समुद्र स्वयं शिव का जलाभिषेक करता है, तब मनुष्य को केवल दर्शक बनकर उस दैवीय क्षण का आनंद लेना होता है। यही इस मंदिर की सबसे बड़ी पहचान और आकर्षण है।

- राजकुमार जैन (स्वतंत्र लेखक)

