साधारण सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले रतन नवल टाटा असाधारण शख्सियत के मालिक थे। वह जितने बड़े और सफल उद्योगपति थे उससे कहीं अधिक बड़े इंसान थे। उनकी सादगी का एक अलग ही आभामंडल था,जो उन्हें आम उद्योगपतियों से अलग खड़ा करता था। एक सफल उद्योगपति अपने सामाजिक सरोकारों को लेकर कितना सजग हो सकता है? रतन टाटा का व्यक्तित्व और कृतित्व इसका साक्षात उदाहरण है। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है करोड़ों लोगों का भरोसा जीतना। ऐसे दौर में जब उद्योगपतियों और व्यापारियों की छवि ऐन केन प्रकारेण मुनाफा कमाने वाली जमात की बन गई हो, तब टाटा ग्रुप की कंपनियों ने अपने साम्राज्य का विस्तार उच्च नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए किया।
कोई भी व्यापारी या उद्योगपति लाभ अर्जित करने के लिए ही पूंजी निवेश करता है,लेकिन टाटा ने अपने साम्राज्य का विस्तार करते समय जो भरोसा और इज्ज़त कमाई, वह अभूतपूर्व है।
आज टाटा के उत्पाद भारत के घर-घर में तो मौजूद हैं ही,दुनिया के 100 से अधिक देशों में टाटा के परंपरागत भरोसे के साथ मौजूद हैं।
देश-दुनिया में अनेक कामयाब औद्योगिक समूह हैं, लेकिन टाटा समूह की कामयाबी अपने आप में बेमिसाल है। बीते 156 वर्षों में यह समूह अनेक बदलावों का प्रत्यक्षदर्शी बना। फिर चाहे वह भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के उत्थान और पतन की गाथा हो अथवा तकनीकी क्षेत्र में आ रहे क्रांतिकारी बदलावों की बात हो। अर्थव्यवस्था की मंदी का दौर हो अथवा विश्व युद्धों से चरमराती अर्थव्यवस्था का दौर। समाजवादी विचारों से प्रभावित राष्ट्रीयकरण की व्यवस्था हो अथवा वैश्विक अर्थव्यवस्था से कदमताल करती हुई खुली अर्थव्यवस्था। टाटा समूह अपने उच्च नैतिक व्यावसायिक आदर्शों के साथ हर बदलाव का सहभागी भी बना और सहगामी भी।
अपने पूर्ववर्तियों जमशेदजी टाटा, दोराबजी टाटा और जेआरडी टाटा द्वारा स्थापित समूह की विभिन्न कंपनियों को रतन टाटा ने आसमान की बुलंदियों तक पहुंचाया। उनके समक्ष चुनौतियां कुछ कम नहीं थीं, लेकिन रतन टाटा तो जैसे चुनौतियां से जूझने और सफलता के नए प्रतिमान स्थापित करने के लिए ही बने थे।
1937 में जन्मे रतन टाटा बचपन से ही चुनौतियों से दो-चार होने लगे थे। 10 साल की उम्र में उनके माता-पिता का अलगाव हो गया था,और उनकी दादी ने उनका पालन-पोषण किया।
कार्नेल यूनिवर्सिटी और हार्वर्ड जैसे संस्थानों से आर्किटेक्चर और मैनेजमेंट की शिक्षा प्राप्त रतन टाटा का टाटा समूह से पहले पहल जुड़ाव एक अप्रेंटिस के रूप में हुआ जब उन्होंने 1962 में टेल्को के साथ काम करना प्रारंभ किया। समूह की विभिन्न कंपनियों के साथ काम करते हुए 1971 में नेलको के डायरेक्टर बने। उन्होंने कड़ी मेहनत से कभी गुरेज नहीं किया। उन्हें जो भी जिम्मेदारी मिली,पूरी प्रतिबद्धता के साथ उसका निर्वहन किया।
रतन टाटा ने 1991 में टाटा संस और टाटा ट्रस्ट के अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभाला। यह जिम्मेदारी उन्हें जेआरडी टाटा से मिली थी। उन्होंने ऐसे समय में टाटा समूह का नेतृत्व किया जब देश में आर्थिक उदारीकरण का दौर चल रहा था। उनके नेतृत्व में टाटा समूह ने नए-नए प्रतिमान स्थापित किए।
रतन टाटा का दृष्टिकोण केवल मुनाफा कमाने पर ही केंद्रित नहीं रहा। उनकी सोच हमेशा आम आदमी पर केंद्रित रही। उन्होंने न केवल आम आदमी की दैनिक जरूरतों को समझा अपितु उनके सपने पूरे हो सकें, इस दिशा में प्रयास भी किए। नैनो कार का निर्माण उनका ऐसा ही एक प्रयास था।
उनके नेतृत्व में टेटली, कोरस, जगुआर,लैंड रोवर, ब्रूनर मोंड,जनरल केमिकल इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स और देवू जैसी कंपनियों के अधिग्रहण ने टाटा समूह की धाक पूरी दुनिया में जमा दी।
1932 में स्थापित एयर इंडिया की मिल्कियत टाटा समूह द्वारा पुनः हासिल करना उनकी एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। यह जानते हुए भी कि एयर इंडिया की आर्थिक हालत ठीक नहीं है, उन्होंने यह साहसपूर्ण कदम उठाया। टाटा समूह के लिए यह फैसला लाभ-हानि के सामान्य आर्थिक फैसलों की बजाय एक भावनात्मक कदम था। जिस संस्थान के साथ पूर्वजों का नाम और प्रतिष्ठा जुड़ी हो,रतन टाटा जैसा व्यक्ति उसे डगमगाते हुए कैसे देख सकता था?
रतन टाटा अपने सहकर्मियों और कर्मचारियों के प्रति सदैव संवेदनशील रहे। यही कारण है कि टाटा समूह में कार्यरत प्रत्येक कर्मचारी अपने आपको गौरवान्वित महसूस करता है।
ताज होटल पर आतंकवादियों के हमले (26/11) के बाद व्यवस्था और कर्मचारियों में विश्वास की बहाली के लिए उनके द्वारा की गई पहल,नेतृत्व क्षमता और संवेदनशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने हमले से प्रभावित कर्मचारियों और उनके परिजनों की तो जिम्मेदारी उठाई ही, आतंकवादियों की गोलीबारी में हताहत हुए राहगीरों के परिवारों की भी मदद की।
बात चाहे उद्योग जगत में नवाचार की हो अथवा औद्योगिक घरानों द्वारा समाज के प्रति कर्तव्यों के निर्वहन की, रतन टाटा ने हमेशा उच्च मापदंड स्थापित किए हैं। उन्होंने दिखाया है कि नैतिक मूल्यों के साथ भी औद्योगिक साम्राज्य स्थापित किया जा सकता है।
आज रतन टाटा की पहली पुण्यतिथि है। उनके अवसान को अभी एक वर्ष ही हुआ है और देश परिदृश्य से उनकी अनुपस्थिति को महसूस करने लगा है। टाटा समूह के वर्तमान कर्णधारों के अंदरूनी विवादों की खबरें बाहर आ रही हैं, जिससे औद्योगिक जगत ही नहीं,समूचा देश असहज महसूस कर रहा है।
टाटा समूह के वर्तमान कर्ताधर्ताओं को यह समझना होगा, कि टाटा सिर्फ औद्योगिक घराना नहीं है, भारतीय उद्योग जगत की पहचान है…अस्मिता है।
रतन नवल टाटा और उनके पूर्ववर्तियों द्वारा स्थापित आदर्श वैसे तो समूचे उद्योग जगत के लिए अनुकरणीय हैं, लेकिन टाटा समूह की जिम्मेदारी कहीं अधिक है। समूह के वारिस यह जिम्मेदारी उठाने से मुकर नहीं सकते।
अरविन्द श्रीधर

