अपने उपहास पर उतारू है लोकतंत्र

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इस हरक़त का कौन समर्थन करेगा ? एक धर्मांध पेशेवर वक़ील ने सत्तर साल की उमर में जो शर्मनाक़ दृश्य इस देश की सर्वोच्च पंचायत में उपस्थित किया,वह चौंकाता भी है। कम से कम चालीस बरस उसने पीड़ितों को न्याय दिलाने का काम किया। क्या कोई भी यह अनुमान लगा सकता है कि इन चार दशकों में उसने कितने मामलों में अपने मुवक़्क़िलों का चुनाव मज़हब या जाति के आधार पर किया होगा ? यह भी कि क्या उसे संसार के सर्वश्रेष्ठ संविधान की बुनियादी समझ है ? संविधान किसी भी आधार पर धर्म,जाति और उपजाति में भेदभाव नहीं करता। लेकिन इस सिरफ़िरे बुजुर्ग ने सर्वोच्च न्यायालय में यह साबित कर दिया कि वह आज़ादी से पूर्व की किसी मानसिक गुत्थी में उलझा हुआ है।खेद है कि हमारे विधि पाठ्यक्रमों में भारतीय संविधान का इतिहास तो पढ़ाया जाता है।मगर नए वक़ील का संविधान बोध कैसा है – इसे जाँचने,परखने का कोई पैमाना मौजूदा तंत्र में नहीं है। यही वजह है कि समय समय पर न्यायपालिका से संबद्ध अनेक जानकारों की राय अथवा तर्क संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध व्यवहार करती नज़र आती है। इसके उलट एक दृश्य यह भी है कि सर्वोच्च न्यायालय के कुछ निर्णय तमाम मंत्रालयों में फाइलों के अंदर दफ़न होकर रह गए हैं। जब अवाम की मानसिकता ही अदालत की उपेक्षा करने की हो जाए तो फिर लोकतंत्र के भविष्य पर प्रश्न क्यों नहीं उठाए जाने चाहिए ? इस मानसिकता को कैसे बदल सकते हैं ।यह गंभीर सवाल है।
यह बेहद अप्रिय और शर्मनाक स्थिति है।यह घटना सवाल उठाती है कि संविधान के अमृत महोत्सव वर्ष में हम ऐसे निरक्षर नमूने क्यों देख रहे हैं ?सन्दर्भ के तौर पर बताना चाहता हूँ कि मैंने क़रीब अड़तालीस साल पहले विधि महाविद्यालय के प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया था।यानी यह वही कालखंड था,जब सर्वोच्च न्यायालय में अश्लील और अमर्यादित आचरण करने वाले अधिवक्ता क़ानून और संविधान पढ़ रहे होंगे।उन दिनों अधिकतर विधि महाविद्यालय शाम को अपनी कक्षाएँ लगाते थे।मक़सद यह था कि अपनी नौकरी और कारोबार के बाद जो लोग भारतीय संविधान और विधि का अध्ययन करना चाहें,वे उन पाठ्यक्रमों में प्रवेश ले लें।चूँकि उन दिनों साक्षरता का प्रतिशत कम था इसलिए संभवतया सरकार चाहती रही होगी कि विधि की पढ़ाई करने वाला प्रत्येक लॉ-ग्रेजुएट अपने मुल्क़ के क़ानून और आईन को जानें।अच्छी तैयारी के बाद जिस दिन मैं परीक्षा देने गया तो पाया कि मुझे छोड़कर सारे छात्र टेबल पर किताब धरे नक़ल कर रहे हैं। कक्ष में जिन शिक्षकों की ड्यूटी थी,वे शहर के वकील थे।वे सब इसे नज़र अंदाज़ कर रहे थे।शायद इसलिए कि वे भी इसी तरह लॉ की परीक्षा पास करके वक़ील बने होंगे। इसके बाद अगले दस पंद्रह साल में मैंने कई ज़िलों के विधि महाविद्यालयों में यही व्यवस्था देखी।मेरे उस कॉलेज से लॉ -ग्रेजुएट हुए कुछ छात्र बाद में उच्च न्यायालय में न्यायाधीश पद तक पहुँचे और सेवानिवृत भी हो गए। तो हमारा शैक्षणिक तंत्र भी ऐसे अधकचरे पेशेवरों की फसल उगाता रहा,जिसे बहत्तर साल की आयु में भी अपने अपराध पर कोई अफ़सोस नहीं है।लेकिन यह केवल विधि शिक्षा की बात नहीं है। बल्कि उससे भी अधिक गंभीर है।इसकी पड़ताल होना चाहिए कि भेदभाव के जो बीज हमारे समाज में बोये गए थे,वे यक ब यक अंकुरित क्यों होने लगे हैं ? हम किस नज़रिए से परिपक्व प्रजातंत्र की अपेक्षा करें,जब सर्वोच्च न्यायालय का सबसे बड़ा न्यायाधीश अपने न्याय सिंहासन पर जूता फेंकने का दृश्य देखता है।भारत के लिए यह सामूहिक शर्म का विषय है,जिसका कोई प्रायश्चित नहीं है।मुख्य न्यायाधीश यक़ीनन हमारे गौरव पुरुष हैं।उन्होंने गांधीवादी अंदाज़ में इस आक्रमण को लिया और संयमपूर्वक काम करते रहे।
यहाँ मैं निश्चित रूप से महात्मा गांधी को याद करना चाहूँगा। वे स्वयं भी अच्छे वक़ील थे।उनके जिन सिद्धांतों को भारतीय संविधान में स्वीकार किया गया,उनमें भेदभाव का समापन भी है।अमेरिका जैसे तथाकथित सभ्य लोकतंत्र में अश्वेतों को अस्सी बरस मताधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ा था।लेकिन भारतीय संविधान में पहले दिन से ऐसे किसी भी आधार पर मताधिकार से वंचित करने का कोई प्रावधान नहीं है। यह काम तो संविधान सभा के पुरखों ने कर दिया है। लेकिन 2025 में उसी कुरीति का ज़हर न्याय कारोबार से जुड़े लोगों को दूषित कर रहा है।इससे क्या यह माना जाए कि हमने आज़ादी के बाद एक ज़हरीला और दूषित समाज रचा है। यह समाज सदियों से चली आ रही बुराइयों को नहीं छोड़ना चाहता। ईस्ट इंडिया कंपनी के वारिसों ने हिन्दुस्तान की इसी कमज़ोरी को भाँप लिया था।उन्होंने भारतीयों को मज़हब,जाति और उपजातियों में बाँटने और उनके बीच फूट डालने का काम करके राज किया था।कमोबेश मौजूदा दौर भी यही कर रहा है। चौदह साल पहले न्यायमूर्ति चंद्रशेखर धर्माधिकारी ने एक किताब लिखी थी। शीर्षक था ,’ गांधी मेरी नज़र में ‘। इस पुस्तक में लिखा है कि ” हमने आज़ादी के बाद राष्ट्रध्वज बदल दिया,राष्ट्रगीत बदल दिया,परन्तु न्यायपालिका नहीं बदली। वह किसी भी अर्थ में भारतीय अथवा स्वदेशी नहीं बन पाई। गंगा में स्नान करके और काशी विश्वनाथ का दर्शन करने से ही कोई भारतीय नहीं बन जाता।क्या ऑमलेट पर गंगाजल छिड़ककर खाने से वह थेपला बन जाएगा ?वर्तमान न्याय व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव करना पड़ेगा।यह तीन तरह के दोषों से पीड़ित है -कास्ट,कॉस्ट और करप्शन ( जातिवाद,ख़र्चीलापन और भ्रष्टाचार ) दरअसल भेदभाव और जातिवाद का ज़हर हमारे दिमाग़ों में इतने गहरे चला गया है कि अस्सी फ़ीसदी कथित साक्षरता के बाद भी यह विकराल रूप में सामने है। लोकतंत्र का तीसरा विकलांग स्तंभ मुल्क़ की गाड़ी को खींचने में क्या सहायता कर पाएगा ?

राजेश बादल
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यहां व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत हैं।)

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