सनातन परंपरा में परिक्रमा का विशिष्ट महत्व है। धर्मशास्त्रों में देव,गुरू,तीर्थ,पवित्र नदियों आदि की परिक्रमा का विस्तार से उल्लेख मिलता है।
साधारण श्रद्धालुओं के लिए परिक्रमा पुण्यार्जन के लिए की जाने वाली एक धार्मिक विधि है।
मान्यता है कि-
यानि कानि च पापानि ,जन्मान्तर-कृतानि च।
तानि-तानि विनष्यन्ति, प्रदक्षिणा पदे-पदे।।
(जो कोई इस जन्म के और जन्मान्तर के किए हुए पाप हों, वे सब प्रदक्षिणा के द्वारा पद-पद पर विनष्ट होते हैं।)
लेकिन व्यापक अर्थों में परिक्रमा केवल पुण्य अर्जित करने के लिए किया जाने वाला धार्मिक कर्मकांड भर नहीं है,अपितु इसके निहितार्थ कहीं अधिक गहरे हैं।
पृथ्वी अथवा सौरमंडल के अन्य ग्रह सूर्य की परिक्रमा पुण्य अर्जित करने के भाव से नहीं,अपितु सौरमंडल की एक व्यवस्था के तहत करते हैं।
पृथ्वी पर सूर्योदय एवं सूर्यास्त का होना,मौसम का परिवर्तित होना, प्रकृति का ना-ना रूप धारण करना,फलस्वरुप जीवन का प्रस्फुटन-पल्लवन होना,सब कुछ परिक्रमा के फलितार्थ ही तो हैं।
परिक्रमा जीवन के मूल में है और उसका स्थूल स्वरूप हैं वह धार्मिक परिक्रमाएं जो अनादिकाल से लोक में प्रचलित हैं।
विघ्नहर्ता श्रीगणेश देवताओं में प्रथम पूज्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए,इसके मूल में भी परिक्रमा ही तो थी।
गोवर्धन परिक्रमा, ब्रज चौरासी परिक्रमा,कामदगिरि परिक्रमा,विभिन्न तीर्थों में होने वाली पंचकोशी यात्राओं सहित मंदिर में दर्शन के उपरांत की जाने वाली परिक्रमा धार्मिक श्रद्धालुओं में सामान्य रूप से प्रचलित हैं।
इन सबसे इतर एक परिक्रमा ऐसी है,जिसकी संपूर्ण विश्व में कोई और मिसाल नहीं मिलती;और यह परिक्रमा है मेकल सुता मां नर्मदा की परिक्रमा।
नर्मदा एकमात्र ऐसी पवित्र नदी है, जिसकी परिक्रमा की जाती है। मान्यता है कि जब गंगा जी का पृथ्वी पर अवतरण नहीं हुआ था,पुण्य सलिला नर्मदा की जलधारा तब भी पृथ्वी पर कल-कल बह रही थी।
समुद्रा: स्थित: सर्वा: कल्पे-कल्पे क्षयं गता:।
सप्त कल्पक्षये क्षीणे न मृता तेन नर्मदा।।
प्रलय काल में समस्त सागर एवं सरिताएं स्वरूप से क्षीण होकर नष्ट हो जाती हैं,किंतु सात कल्पपर्यंत यह रेवा नष्ट नहीं हुई,अतः इसका नाम नर्मदा(ना मरने वाली) प्रसिद्ध हुआ।
नर्मदा एकमात्र पवित्र नदी है जिसकी महिमागान के लिए पुराण की रचना की गई। स्कंद पुराण का ‘रेवा खंड’,’नर्मदा पुराण’ के नाम से श्रद्धालुओं में समादृत है।
नर्मदा जी की महिमा प्रतिपादित करते हुए स्कंद पुराण में कहा गया है-
त्रिभि: सारस्वतं तोयं सप्ताहेन तुयामुनम्।
सद्य: पुनाति गाङ्गेयं दर्शनादेव नार्मदम्।।
भावार्थ है -सरस्वती में तीन बार स्नान करने से,यमुना में सात बार स्नान करने से और गंगा में एक बार स्नान करने से जो पवित्रता-निर्मलता प्राप्त होती है, वह नर्मदाजी के दर्शन मात्र से ही प्राप्त हो जाती है।
नर्मदा को शिवतनया भी कहा जाता है,और यह भी मान्यता है कि नर्मदा क्षेत्र का कंकर-कंकर,
साक्षात शंकर का स्वरूप होता है। नर्मदा तट पर पाए जाने वाले शिवलिंग शैव परंपरा में अति विशिष्ट माने गए हैं।
युगों-युगों से नर्मदा के तट साधुओं-तपस्वियों की क्रीड़ा भूमि रहे हैं।यही कारण है कि नर्मदा सहज ही आस्थावानों को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है।
वैसे तो नर्मदा पुराण से लेकर लोकाख्यानों तक में मां नर्मदा की महिमा पर केंद्रित विपुल साहित्य उपलब्ध है, लेकिन अनवरत परकम्मावासी,मां शारदा के वरदपुत्र श्रद्धेय अमृतलाल बेगड़ की कलम से नर्मदा का जो सौंदर्य निर्झरित हुआ है,वह अद्भुत है। नर्मदा परिक्रमा पर लिखे गए उनके यात्रा वृतांत पढ़ते हुए पाठक अपने आपको परकम्मावासी अनुभव करने लगता है। नर्मदा का नैसर्गिक देवीय सौंदर्य, नर्मदा के तटों का लोकजीवन और संस्कृति तथा परिक्रमा के दौरान नर्मदा के तटों पर मिलने वाले साधु-संत और साधारण-असाधारण परकम्मावासी बेगड़ जी के यात्रा वृतांतों का प्रमुख प्रतिपाद्य विषय रहे हैं।
यह उनकी सरस लेखन शैली का करिश्मा है कि उनके यात्रा वृतांत नर्मदा की जलधार जैसे ही कल-कल बहते से प्रतीत होते हैं।
उनके यात्रा वृतांत पढ़कर हजारों लोग नर्मदा की पैदल परिक्रमा करने के लिए प्रेरित हुए हैं।
यह तो हुई नर्मदा के सौंदर्य और दैवीय आकर्षण की बात। अब जरा इसके दूसरे पक्ष पर दृष्टिपात करते हैं।
संतों-मनीषियों ने नर्मदा को बैरागी नदी कहा है और नर्मदा क्षेत्र को सिद्ध भूमि। भगवद्पाद आद्य शंकराचार्य विरचित नर्मदाष्टक में भी मां नर्मदा के सिद्धिदात्री स्वरूप का गुणगान किया गया है।

नर्मदा के तट तपस्वियों एवं साधकों के लिए क्यों अनुकूल हैं? यह इन श्लोकों से स्पष्ट हो जाता है-
सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वयज्ञेषु यत्फलम्।
सर्ववेदेषु यज्ज्ञानं तत्सर्वं नर्मदातटे।।
संपूर्ण तीर्थों में स्नानादि से होने वाला पुण्य तथा समस्त यज्ञों के हो चुकने पर जो फल,एवं समग्र वेदाध्ययन करने पर जो ज्ञान मिलता है,वह सब नर्मदा जी के तट पर विद्यमान है।
इसे और भी स्पष्ट करते हुए कहा गया है-
गंगा कनखले पुण्या ,कुरुक्षेत्रे सरस्वती।
ग्रामे वा यदि वाऽरण्ये, पुण्या सर्वत्र नर्मदा।।
गंगा कनखल (हरिद्वार) में और सरस्वती कुरुक्षेत्र में पुण्यरूप है,पर नर्मदा ग्राम,वन में जहां कहीं भी बहे, वह सर्वत्र पुण्यमयी मानी गई है।
यह नर्मदा क्षेत्र का प्रताप है कि इसके प्रभाव क्षेत्र में आकर साधारण साधकों पर भी विचलन जैसा विकार हावी नहीं हो पाता। यही कारण है कि नर्मदा के तट हमेशा से साधकों और तपस्वियों का आश्रय स्थल बनते रहे हैं।
नर्मदा परिक्रमा अपने-अपने भाव, संकल्प और सामर्थ्य के अनुसार अलग-अलग तरीकों से की जाती है। एक तरीका है अनादिकाल से प्रचलित परंपरा के अनुसार पैदल परिक्रमा। कुछ श्रद्धालु दंडवत प्रणाम करते हुए परिक्रमा करते हैं। आजकल वाहनों से भी नर्मदा परिक्रमा की जा रही है।
परिक्रमा का एक स्वरूप ऐसा भी है, जिसमें साधक
शास्त्रसम्मत मर्यादाओं का पालन करते हुए स्थूल परिक्रमा के साथ-साथ मानसिक-आध्यात्मिक चिंतन-मनन करते हुए परिक्रमा करते है। यह परिक्रमा ऐसे साधक करते हैं,जो परिक्रमा के तात्विक स्वरूप से परिचित होते हैं, और अपनी आध्यात्मिक अनुभूतियों को नर्मदा सिद्धभूमि के प्रभाव क्षेत्र में रहकर परिपक्व कर लेना चाहते हैं।
ऐसे साधकों-तपस्वियों के लिए अपनी आध्यात्मिक अनुभूतियों में स्थिर होने का अवसर है नर्मदा परिक्रमा।
नर्मदा के अनन्य भक्त प्रहलाद सिंह पटेल इसी श्रेणी के परकम्मावासी हैं। ज्ञानार्जन के लिए प्रबल जिज्ञासा उनके स्वभाव में है।उनके गुरु सिद्धसंत श्रीश्री बाबाश्री ने एक दिन उद्घोष किया – “परिक्रमा क्या देगी? पूर्णता,परिपूर्णता और संपूर्णता.. यही परिक्रमा का अर्थ और यही सामर्थ्य है..” और इसी सामर्थ्य का साक्षात्कार करने प्रहलाद जी निकल पड़े नर्मदा परिक्रमा पर। सोने पर सुहागा यह कि इस परिक्रमा में श्रीश्री बाबाश्री स्वयं भी परकम्मावासी के रूप में शामिल थे। 1994 से 1996 लगभग 2 वर्षों तक परिक्रमा और सत्संग का ऐसा दौर चला,जो सहयात्रियों के जीवन की अमूल्य निधि बन गया।
सिद्ध संतों की वाणी गूढ़ अर्थ लिए हुए होती है। यह शिष्य की क्षमता,पात्रता और योग्यता पर निर्भर करता है कि वह गुरु प्रसाद को कितना और किस रूप में ग्रहण कर पाता है। प्रहलाद पटेल इस मामले में सजग हैं। इतने सजग कि परिक्रमा के दौरान गुरु मुख से निसृत लगभग प्रत्येक वचन उन्होंने तिथि, समय और स्थान सहित अपने मानस पटल पर अंकित कर रखा है। उन्होंने गुरुमुख से निकली हुई वाणी को न केवल स्वयं हृदयंगम किया,अपितु उसका अनुशीलन कर अन्य जिज्ञासुओं को भी लाभान्वित किया।
‘परिक्रमा कृपा सार’ उनके ऐसे ही प्रयासों का सुफल है। ग्रंथ का नामकरण ही स्पष्ट कर देता है कि इसमें पुण्य सलिला नर्मदा माई की कृपा प्रसादी तो है ही, गुरु कृपा का अक्षय कोष भी इसमें समाहित है।
ग्रंथ का प्रत्येक अध्याय आध्यात्मिक अनुभूतियों का जीवंत दस्तावेज है। खुद प्रहलाद जी कहते हैं-
‘परिक्रमा कृपा सार’ में श्रीश्री बाबाश्री के मुखारविंद से निकले ऐसे वचन संकलित हैं,जो दरअसल समस्त भ्रांतियां को नष्ट करने के महामंत्र हैं।
ग्रंथ में जिस परिमार्जित भाषा-शैली का प्रयोग हुआ है,सहसा विश्वास नहीं होता कि यह सब एक पूर्णकालिक राजनेता की कलम से लिखा गया है। भले ही मूल विचार श्रीश्री बाबाश्री के हैं, लेकिन उन्हें व्यवस्थित स्वरूप तो प्रहलाद जी ने ही प्रदान किया है।
डॉ मुरली मनोहर जोशी ने ‘परिक्रमा कृपा सार’ पर सटीक टिप्पणी की है-‘परिक्रमा’ पुस्तक पढ़ने पर मुझे यह अनुभव हुआ कि प्रहलाद संभवतः इसे स्वयं नहीं लिख रहे हैं,अपितु कोई अदृश्य शक्ति उनसे लिखवा रही है। संभवतः उनके गुरु श्रीश्री बाबाश्री जी ही उनको प्रेरित कर रहे हैं,और प्रहलाद बस लिखे जा रहे हैं।’
डॉ जोशी से असहमत होने का कोई कारण नहीं है, लेकिन प्रहलाद जी को इस बात का श्रेय तो दिया ही जाना चाहिए कि उन्होंने गुरु के सानिध्य में प्राप्त हुए आध्यात्मिक अनुभवों को अपने तक सीमित रखने की कृपणता नहीं दिखाई;बल्कि ‘सर्वजन हिताय- सर्वजन सुखाय’ का उदात्त भाव रखते हुए उसे जन-जन तक पहुंचाने का अध्यावसाय किया।
प्रहलाद पटेल अपनी विचार अभिव्यक्ति में जिस सूत्र शैली का प्रयोग करते हैं, वह उन्हें श्रीश्री बाबाश्री से प्राप्त हुई है। अपने स्वभावगत खरेपन की वजह से, यह शैली और भी परिमार्जित एवं प्रभावी हो गई है।
खरी बात कितनी भी कड़वी क्यों ना हो, प्रहलाद जी कहने से नहीं चूकते।
‘परिक्रमा’ में ऐसे अनेक प्रसंगों का उल्लेख हुआ है, जो उनके जैसा खरा और बेबाक व्यक्ति ही कर सकता है।
उदाहरण देखिए-
▪️”सतयुग आएगा…भारत विश्व गुरु बनेगा, पर कैसे? यह पूछने वालों का कोई मंच नहीं है…
आशावाद से अच्छा है कर्म का संकल्प। आशावाद का भाव प्रबल हो, यह अच्छा है, पर कर्म साथ ना हो तो? तब उपहास की स्थिति बनती है… आशावाद से अच्छा है,कर्म का संकल्प; सत्संग का संकल्प।”
▪️ रामराज्य की स्थापना कर्म करने से होगी। खाली कल्पना करने से, कहने मात्र से क्या राम राज्य की स्थापना हो सकती है?
दुःख इस बात का है, बुद्धिजीवियो! तुमने सिर्फ नारेबाजी की है। संकल्प पूर्ण करके नहीं दिखाया। नर को नारे की जरूरत नहीं होती, शुद्ध कर्म की जरूरत होती है,विधि के माध्यम से।
▪️ प्रहलाद जी की यह स्वीकारोक्ति भी प्रभावित करती है- ‘मेरी प्रथम पदयात्रा,अर्थात नर्मदा परिक्रमा 1986 में प्रारंभ हुई, जिसका कारण तो राजनीतिक था,पर सौगंध/संकल्प लिया था चुनावों में धनबल के विरुद्ध दृढ़ता से खड़े होने का…लड़ने का।’
ऐसे अनेक प्रसंग ग्रंथ में भरे पड़े हैं।
पुस्तक में कुल 54 अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय जिज्ञासा भी है और समाधान भी। श्रीश्री बाबाश्री के श्रीमुख से निसृत सूत्र वाक्य तो इतने भावपूर्ण और प्रभावी हैं,जैसे गागर में सागर समाहित हो गया हो।
कतिपय उदाहरण देखिए-
▪️बुद्धि भटकाती है,ज्ञान तटस्थ करता है।
▪️ज्ञान से मोक्ष अवश्यंभावी है, शर्त है, भेद न रखें। ज्ञान भेद नहीं करता; बुद्धि भेद करती है।
▪️ सत्य प्रस्तुति के लिए है,स्तुति के लिए नहीं।
▪️ सत्य को प्रमाण की नहीं,प्रणाम की आवश्यकता है।
▪️ संकल्प यदि विकल्प खोजने लगे तो उद्देश्य पूर्ति नहीं होती।
▪️ धर्म धारण का भाव है, उदाहरण का नहीं।
▪️निर्विकारता और निर्विचारता दोनों अलग-अलग पहलू या भाव है। निर्विकारता जहां समस्त आत्मिक- मानसिक विकारों अथवा कलुषित विचारों से विरक्त होने का भाव है;वहीं निर्विचारता बौद्धिक सक्रियता को शून्य भाव में लाने की प्रक्रिया है। लेकिन याद रहे,निर्विचार होकर निर्विकार नहीं हुआ जा सकता।चिंतन- मनन आवश्यक है।
पुनः प्रशंसा करनी पड़ेगी लेखक की सजगता की,जो उन्होंने इन सूत्र वाक्याशों को लिपिबद्ध किया,क्योंकि श्रीश्री बाबाश्री अपने वचनों को प्रायः दोहराते नहीं थे।थोड़ा सा भी प्रमाद और असावधानी गुरुकृपा प्रसाद से वंचित होने का कारण बन सकती थी।
ग्रंथ के प्रतिपाद्य विषयों पर इससे अधिक प्रकाश डालना कदाचित उचित नहीं होगा। पाठकों को चाहिए कि वह स्वयं ग्रंथ के एक-एक पृष्ठ पर दृष्टिपात करते हुए उस परिक्रमा के सहयात्री बनें, जिसे लेखक ने आपके लिए बड़े मनोयोग से संजोया है।
“परिक्रमा कृपा सार” ग्रंथ प्रभात प्रकाशन,नई दिल्ली ने प्रस्तुत किया है। साज-सज्जा प्रतिपाद्य विषय के अनुकूल है, जिसे प्रतिज्ञा सिंह पटेल के चित्रांकन ने और भी प्रभावोत्पादक बना दिया है।

*अरविन्द श्रीधर

