‘शुभ’ शब्द में समाहित है लोगमंगल का भाव

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भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, संस्कृति की प्राणवायु है, और जब सांसों पर पराई छाया पड़ने लगे, तो अस्मिता दम तोड़ने लगती है।

त्योहारों की रोशनी और भाषा का उजाला
भारत के सबसे बड़े त्यौहार दीपावली का समय है। पवन में मिठास घुली है, घरों में साज-सज्जा का उल्लास है, लोग दूर दराज से अपने घर परिवार की गोद में लौट रहे हैं। हर आंगन में दीपों की कतारें जगमगा रही हैं, मानो अंधकार पर प्रकाश की विजय का उत्सव एक बार फिर साकार हो रहा है।

लेकिन इस जगमगाहट के बीच एक मौन प्रश्न टिमटिमाता है।क्या हम अपने ही त्योहार को अपनी ही भाषा में मनाना भूल गए हैं?

हैप्पी दीवाली’ बनाम शुभ दीपावली—फर्क केवल शब्दों का नहीं, संस्कारों का है

सोशल मीडिया, विज्ञापन, बैनर, ग्रीटिंग कार्ड, हर ओर अंग्रेजी दासता के प्रतीक “हैप्पी” और भारतीयता की अमिट पहचान “दिवाली” की बेमेल गूंज है। इस शोर में “शुभ दीपावली” की वह आत्मीय पुकार कहीं खो सी गई है।

“हैप्पी” व्यक्तिगत सुख का शब्द है, जबकि “शुभ” लोकमंगल का। दीपावली निजी आनंद नहीं, समष्टिगत कल्याण का पर्व है। यह वह क्षण है जब हम प्रभु श्रीराम को याद कर अंधकार पर प्रकाश की विजय पाकर संपूर्ण समाज के मंगल की कामना करते हैं। तो फिर हमने “शुभ” को “हैप्पी” से क्यों बदल दिया।

2025 का भारत — जहां हिंदी अब झुकती नहीं, सिर उठाकर चलती है
आज दुनिया बदल रही है। चीन, अमेरिका, जापान और यूरोप के विश्वविद्यालयों में हिंदी का पाठ्यक्रम लोकप्रिय हो रहा है।

संयुक्त राष्ट्र और जी20 जैसे मंचों पर भारतीय प्रतिनिधि हिंदी में वक्तव्य देकर विश्व का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं।
हिंदी अब दासता की नहीं, आत्मगौरव की भाषा है। फिर अपने ही देश में हम इसे ‘लोकल’ समझकर अंग्रेज़ी को प्रतिष्ठा का प्रतीक क्यों बना बैठे हैं। यह प्रश्न केवल भाषा का नहीं, आत्मविश्वास का है।

“जब बच्चा अपने दादा-दादी के चरण छूकर कहता है ‘शुभ दीपावली’, तो यह केवल अभिवादन नहीं, एक परंपरा का निर्वाह है।”

भाषा : संस्कृति की जननी और समाज की आत्मा
हमारे त्योहारों में हर शब्द में दर्शन छिपा है। “दीपावली” केवल रोशनी नहीं, अंधकार के विरुद्ध आशा की स्थापना है। जब हम “शुभ दीपावली” कहते हैं, तो उसमें मंगल, करुणा और समरसता का भाव है। “हैप्पी दीवाली” कहने से उत्सव तो मनता है, पर उसकी आत्मा कहीं पीछे छूट जाती है।

अब समय है अपनी भाषा से फिर से जुड़ने का। क्योंकि वैश्विक होना अपनी जड़ों को भूलना नहीं होता, बल्कि उन्हें लेकर आगे बढ़ना होता है।

एक नया संकल्प लेकर शुभ की ओर लौटें
दीपावली केवल दीये जलाने का नहीं, अपनी अस्मिता जगाने का भी पर्व है। यह बात अंग्रेज़ी के विरोध की नहीं, हिंदी के सम्मान की है। यह शब्दों की नहीं, भावों की पहचान का विषय है। तो इस बार, न भेजें “हैप्पी दीवाली” का औपचारिक संदेश, बल्कि कहें दिल से, “शुभ दीपावली!” क्योंकि जब “शुभ” होगा, तो “हैप्पी” तो अपने आप हो जाएगा

अपना त्योहार, अपनी भाषा, अपना देश , यही है सच्ची आज़ादी का उजास।

राजकुमार जैन (स्वतंत्र विचारक)

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