लोहिया,सिंह और नरोन्हा के यक्ष प्रश्न
नया मध्यप्रदेश छह अंचलों के मिलन से बना। मध्यप्रांत के महाकोशल और छत्तीसगढ़, विंध्यप्रदेश के बघेलखंड और बुंदेलखंड, मध्यभारत के चंबल, मालवा और निमाड़ और भोपाल। सभी अंचलों में विशाल आदिवासी क्षेत्र। सबकी अपनी लोक संस्कृतियाँ, परंपराएँ, मान्यताएँ, मेले और त्योहार, रीति-रिवाज और लोकभाषाएँ। सामंजस्य और समरसता इसकी शोभा बढ़ाएँगें। मध्यप्रदेश के सामने कुछ यक्ष प्रश्न उठते रहे हैं। पहला सवाल खड़ा किया समाजवादी चिंतक डा. राममनोहर लोहिया ने, यह सन 1965 की बात है। विधायक विश्रामगृह खंड दो के खुले बरामदे में समाजवादी पार्टी की प्रान्तीय बैठक हो रही थी। अचानक डा. लोहिया ने पूछा- भोपाल की संरचना क्या है? एक उत्साही नेता ने विशाल जलराशि वाले तालाबों और हरी-भरी पहाड़ियों का जिक्र करते हुए प्राकृतिक सौन्दर्य और खुशनुमा मौसम का बखान किया। जवाब से असंतुष्ट डा. लोहिया ने भोपाल की संरचना की अद्भुत व्याख्या की- पहले पायदान पर नौकरशाह। तब वल्लभ भवन सचिवालय कहा जाता था, मंत्रालय नहीं। दूसरे पायदान पर थैलीशाह अर्थात बिड़ला मंदिर। तीसरे पायदान पर लोकशाह अर्थात विधायक विश्रामगृह, जहाँ जनता के चुने हुए प्रतिनिधि विश्राम करते हैं। चैथे पायदान पर विधानसभा जहाँ बैठकर जनप्रतिनिधियों को जनता की समस्याएँ हल करने और अपेक्षाएँ पूरी करने का दायित्व निभाना होता है। डा. लोहिया ने चारों पायदानों से निराशा के अनुभवों का हवाला देते हुए पाँचवें पायदान पर छोटे तालाब का उल्लेख किया। उनका कहना था कि हे अभागी जनता! ऊपर के चारों पायदानों पर तेरी सुनवाई नहीं। सो पाँचवां पायदान हाजिर है। दूसरा प्रसंग विद्वान राजनेता ठाकुर गोविंद नारायण सिंह का है। वे संयुक्त विधायक दल की सरकार के मुख्यमंत्री थे। एम.पी. श्रीवास्तव मुख्य सचिव थे। राजस्व विभाग के उपसचिव सिंह सेवानिवृत्त होने वाले थे। मुख्य सचिव ने उनकी तीन वर्ष की सेवावृद्धि का प्रस्ताव मुख्यमंत्री के सामने रखा। नोटशीट में योग्यता का विवरण और विभाग को उनकी आवश्यकता पर जोर था। मुख्यमंत्री ने नोटशीट पढ़ी। फिर लाल स्याही वाली कलम उठाई और लिखा- यदि ये मर गए तो? मुख्य सचिव ने इसे मुख्यमंत्री की नाराजगी समझा और नस्ती उठाकर चले गए। तीन दिन तक वे मुख्यमंत्री से नहीं मिले। चैथे दिन मुख्यमंत्री ने मुख्य सचिव को बुला भेजा। उन्हें अपने लिखे का मर्म समझाया-निस्संदेह उपसचिव बहुत काबिल हैं। परंतु उनकी पारी समाप्त हो गई। उन्हें इस भरोसे के साथ विदा होना चाहिए कि उनके बाद जो अधिकारी काम संभालेगा, वह उनसे ज्यादा और अच्छा काम करेगा। तीसरा प्रसंग मध्यप्रदेश में सक्षमता का प्रतिमान माने जाने वाले मुख्य सचिव आर.सी.व्ही.पी. नरोन्हा का है। मंत्रिमंडल ने उन्हें विदाई दी। चाय की चुस्कियों के बीच वरिष्ठ मंत्री वसंत राव उइके ने नरोन्हा से एक वर्ष की सेवा वृद्धि स्वीकार करने का आग्रह किया। नरोन्हा को यह पेशकश अच्छी नहीं लगी। उनका जवाब था- 35 वर्ष से जो अधिकारी मेरे साथ काम कर रहे हैं, सबकी इच्छा रहती है कि वे राज्य प्रशासन के इस सर्वोच्च पद पर पहुँचें। उनका हक मारकर मैं अन्याय हर्गिज नहीं कर सकता। इन यक्ष प्रश्नों के सकारात्मक और सिद्धांतनिष्ठ जवाब मिलें, तो निश्चित ही मध्यप्रदेश में तरक्की की नई राह खुलेगी।
भोपाल में लघु भारत की संरचना
वास्तुशास्त्री और वास्तुशिल्पी बहुत सोच-विचार कर जैसी संरचनाएँ खड़ी नहीं कर पाते। योजनाकारों की दृष्टि जहाँ तक पहुँच नहीं पाती। अनायास कुछ परिघटनाएँ नए भाव-बोध की सृष्टि कर जाती है। वे प्रतीक और प्रतिमान बन जाती हैं। समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत, अनुकरण का सबब, समरसता का दृष्टांत और इतिहास का अध्याय हो जाती हैं। साठ के दशक में भोपाल में स्थापित होने वाले वृहद उद्योग (भारत) हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड की मध्यप्रदेश के लिए ऐसी ही महत्ता है। बिजली संयंत्रों के लिए आवश्यक उपकरणों का निर्माण इस उद्योग का लक्ष्य था। आत्मनिर्भरता इसकी कसौटी थी। दिलचस्प होगा यह जानना कि आखिर एच.ई.एल. भोपाल क्यों और कैसे आया। एच.ई.एल. की स्थापना के लिए मध्यभारत के विदिशा का चयन हुआ था। मध्यभारत सरकार जमीन की कीमत माँग रही थी। भोपाल के मुख्यमंत्री डा. शंकरदयाल शर्मा को यह जानकारी मिली। उन्होंने आनन-फानन भारत सरकार के उद्योगमंत्री और मंत्रालय से संपर्क किया। डा. शर्मा ने प्रस्ताव रखा कि एच.ई.एल. के लिए जितनी जमीन चाहिए, मंत्रालय के अधिकारी आकर चिन्हित कर दें। बिना कोई मोल लिए उतनी जमीन सौंप दी जाएगी। इस तरह एच.ई.एल. का भोपाल आना पक्का हुआ। अब सवाल आया कि एच.ई.एल. में काम करने के लिए तकनीकी कार्यबल कैसे जुटाया जाए। कहावत मशहूर है कि प्यासा कुएँ के पास जाता है। एच.ई.एल. की भर्तियों में यह कहावत उलट दी गई। होनहार प्रशिक्षुओं की तलाश में चयनकर्ताओं के दल देशभर में घूमे। कह सकते हैं कि कुएँ जगह-जगह प्यासों की खोज में घूमने लगे। चुने गए प्रशिक्षु भोपाल आए। छात्रावासों में रहने की व्यवस्था हुई। एक-एक कमरे में चार-चार प्रशिक्षु। कोई दक्षिण भारत, तो कोई पूर्व भारत, कोई उत्तर भारत, तो कोई पश्चिम भारत से आए थे। अलग-अलग भाषाएँ, रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज, मान्यताएँ और परंपराएँ। विभिन्नताओं के बीच एकता का सूत्र और उनका संकल्प- हमें नए भारत का निर्माण करना है। प्रायः सभी प्रशिक्षु युवावस्था में प्रवेश कर रहे थे। अविवाहित थे। उनके घर परिवार में जब शादियाँ होतीं तब वे आग्रहपूर्वक मित्रों को साथ ले जाते। इस तरह भोपाल के एच.ई.एल. परिवार के सदस्यों ने विशाल भारत के कोने-कोने को जाना, समझा और आत्मसात किया। इसका प्रतिसाद भोपाल में लघु भारत की संरचना के रूप में फलित हुआ। भोपाल की धरती से समूचे भारत को यह संदेश मिला कि विविधता हमारी कमजोरी नहीं शक्ति है। यही समरसता अनेकता में एकता का मंत्र सिद्ध करती है। भोपाल की रचना भी विविधता लिए हुए है। चाहे बघेलखंड हो या बुंदेलखंड, चाहे चंबल हो या मालवा, चाहे निमाड़ हो या महाकोशल अथवा बहुवर्णी आदिवासी क्षेत्र, सबकी अपनी विशेषताएँ हैं। तीज त्योहार के अवसरों पर उनकी झलक मिलती है। परंतु बहुत सारे अवसर ऐसे भी आते हैं जब सब एक रंग में रंगे होते हैं। सिर्फ मध्यप्रदेश वासी और उससे बृहत्तर परिप्रेक्ष्य में भारतवासी।
चवालीस साल बाद बिछोह का दंश
सन 1956 में जब नया मध्यप्रदेश अस्तित्व में आया तब यह भारत का सबसे बड़ा राज्य था। सर्वतोमुखी विकास की संभावनाएँ पूरी तरह फलीभूत तो नहीं हो पाई थीं, परंतु सब कुछ सामान्य चल रहा था। बीसवीं सदी के आखिरी साल नई उथल-पुथल लेकर आए। बड़े राज्यों का विभाजन कर छोटे राज्य बनाने की माँग परवान चढ़ रही थी। प्रशासनिक कसावट और विकास की तेज रफ्तार तो इसके आधार बने ही, राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की भरपाई के मौके भी बढ़ रहे थे। चवालीस साल पहले जो छत्तीसगढ़ , महाकोशल के साथ मध्यप्रांत को ताकत दे रहा था, अब वह अलगाव के रास्ते पर बढ़ चला था। एक नवंबर 2000 को नया छत्तीसगढ़ राज्य भारत के नक्शे पर उभर आया। मध्यप्रदेश का 30.4 प्रतिशत क्षेत्रफल, 26.62 प्रतिशत जनसंख्या और 27.26 प्रतिशत राजस्व छत्तीसगढ़ में चला गया। सबसे करारी चोट बिजली के मामले में हुई। कहानी इतनी ही नहीं है कि 31 अक्टूबर 1956 की मध्यरात्रि को महासम्मिलन के दृश्य का आनंद लेने वाले मध्यप्रदेश ने एक नवंबर, 2000 को बिछोह का दंश भी झेला। टीस एक झटके में अपनों के पराये हो जाने की साल रही है। तीजन बाई की पंडवानी अब हमारी नहीं रही। मुकुटधर पाण्डेय, लोचनप्रसाद पाण्डेय हमारे नहीं रहे। कथक का रायगढ़ घराना अब हमारे भूगोल से बाहर है। बेलाडीला के लोहे के पहाड़, कुटुमसर की गुफाएँ, इंद्रावती का चित्रकोट जलप्रपात, रायगढ़ का कोसा, बस्तर की काष्ठ कला, दंडकारण्य के सघन वन, इस्पात नगरी भिलाई, खैरागढ़ का संगीत कला विश्वविद्यालय, और पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पराये हो गए हैं। अब हम रामगढ़ की उस पहाड़ी को अपना नहीं कह सकते, जहाँ कालिदास ने मेघदूत की रचना की थी। अब वह रतनपुर भी बेगाना है जहाँ त्रिपुरी के कलचुरियों की एक शाखा ने वैभव संपन्न कलचुरी साम्राज्य की नींव रखी थी। सिरपुर का लक्ष्मणेश्वर मंदिर, राजिम का राजीवलोचन मंदिर, छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहा जाने भोरमदेव का मंदिर, मल्हार की पुरातात्विक संपदा, डोगरगढ़ की बम्लेश्वरी देवी और शिवरीनारायण जहाँ वनवासी श्रीराम ने माता शबरी के जूठे बेर खाए थे, अब हमारी गर्वोक्ति के विषय नहीं रहे। भगवान राम की ननिहाल का कौशल्या माता मंदिर भी अब हमारे हिस्से में नहीं रहा। अब हम यह दावा भी तो नहीं कर सकते कि रामगढ़ की जिस पहाड़ी में 2200 साल पहले भरतमूनि के नाट्यशास्त्र के अनुरूप नाट्यशाला बनाई गई थी, वह सीता बंगरा गुफा, जोगी मारा और लक्ष्मण बंगरा हमारे हैं। सोच नकारात्मक हो तो हम बिछोह की पीड़ा को ही ढोते रह जाएँ। सोच सकारात्मक हो तो मध्यप्रदेश में अब भी इतनी अधिक संभावनाएँ विद्यमान हैं कि हर विषय में, हर क्षेत्र में, सर्जना और विकास की अनूठी इबारत रची जा सकती है। इस दिशा में कदम बढ़े भी हैं।

(विजयदत्त श्रीधर)
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अफसरों को सेवा वृद्धि नहीं मिलना चाहिए, इससे दूसरे अफसरों को अपनी कार्य कुशलता दिखाने का मौका नहीं मिलता।अब नरोन्हा सर जैसे अफसर कहां।