उत्सव जीवन को सरस बनाते हैं।उत्सवों के बहाने व्यक्ति जीवन की आपाधापी को भूल कर आनंद में सराबोर हो जाना चाहता है। सांसारिक परिस्थितियां कुछ भी हों,अंतर्मन आनंदित रहे। सनातन परंपरा के मनीषी यही शिक्षा देते हैं,और इसी सोच की परिणिति है सनातन परंपरा के विविध उत्सव।
अनादि नगरी उज्जयिनी अपने स्वभाव से ही उत्सव प्रिय है।इस तीर्थ नगरी ने उत्सवों के लिए ऐसे-ऐसे अवसर खोजे हैं,जो ना केवल अनोखे हैं अपितु दुर्लभ भी हैं. “हरि-हर मिलन” ऐसा ही एक अनूठा उत्सव है।
सनातन परंपरा में पूज्य त्रिदेव ब्रह्मा,विष्णु एवं महेश को इस जगत का नियंता माना जाता है। समस्त चर-अचर सृष्टि की उत्पत्ति,पालन एवं लय इन त्रिदेवों का ही लीला विलास है।लेकिन वह स्वयं निर्गुण हैं और निर्लिप्त भी.
ईश्वर के निर्गुण स्वरूप के साथ मनीषी गण तो तादात्म्य स्थापित कर सकते हैं, लेकिन आमजनों में तो सगुण एवं मानवीय स्वरूप ही श्रद्धास्पद है। इसीलिए हमारे मनीषियों ने अलौकिक ईश्वरीय सत्ता में भी लौकिकता की कल्पना की और तदनुरूप सनातन परंपरा की विभिन्न धाराओं-उपधाराओं के विधानों का नियमन किया।
मनीषियों ने देवताओं के शयन,जागरण,ऋतु अनुसार दैनिक पूजा-पाठ,भोग,वस्त्र,ठंडे एवं गर्म जल का प्रयोग, पूजन सामग्री आदि का नियमन किया,साथ ही प्रत्येक अवसर के साथ एक उत्सव एवं पूजा का विधान भी जोड़ दिया।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तक जगत के पालनहार भगवान विष्णु का विश्राम काल होता है और इस दौरान वह छीरसागर में शयन करते हैं। ऐसी मान्यता है कि योग निद्रा में जाने के पूर्व भगवान विष्णु सृष्टि संचालन का भार भगवान शिव को सोंप देते हैं।
कार्तिक शुक्ल एकादशी को, जिसे देव प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है, भगवान विष्णु योग निद्रा से जागते हैं और शिव जी सृष्टि के संचालन का भार पुनः भगवान विष्णु को सौंप देते हैं। दैवीय जिम्मेदारियों के इस दिव्य आदान-प्रदान को तीर्थ नगरी उज्जयिनी ने “हरि-हर मिलन” के एक अनोखे उत्सव का स्वरूप दिया है।
कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की वैकुंठ चतुर्दशी को भूतभावन भगवान महाकाल (हर) की सवारी, हरि से मिलने के लिए प्राचीन उज्जयिनी नगर के हृदय स्थल में स्थित द्वारकाधीश मंदिर (गोपाल मंदिर) आती है,और मंदिर परिसर दिव्य हरि-हर मिलन का साक्षी बनता है।

इस दौरान एक और अनूठी परंपरा का निर्वहन किया जाता है। सामान्यतः शिव पूजन में तुलसी दल का प्रयोग नहीं किया जाता एवं वैष्णव परंपरा में बिल्व पत्र निषिद्ध है,लेकिन हरि और हर के इस दिव्य मिलन के दौरान इन निषेधों को नहीं माना जाता।भूतभावन भगवान महाकाल की ओर से द्वारकाधीश भगवान को विल्ब पत्र अर्पित किए जाते हैं,जबकि द्वारकाधीश जी की ओर से भगवान महाकाल को तुलसीदल की माला अर्पित की जाती है।
यह परंपरा एक तरह से संदेश है उन लोगों के लिए जो अपने-अपने संप्रदाय की पूजा पद्धतियों को लेकर न केवल असहिष्णुता रखते हैं,बल्कि छोटी-छोटी सी बातों को लेकर समाज में अनावश्यक बितंडावाद फैलाते रहते हैं।

हरि- हर मिलन की यह अनूठी परंपरा इस बात की भी द्योतक है कि मानवीय रुचि एवं सुविधा की दृष्टि से भले ही पूजा पद्धतियां और पूजन सामग्री भिन्न-भिन्न हों,लेकिन उन्हें प्रकृति में उत्पन्न करने वाला जगत नियंता एक ही है।और जब सब कुछ उसी से उत्पन्न है और उसी में लय होना है,तो भेद किस बात का?
हमारे पूर्वज इस बात को बखूबी जानते थे कि विभिन्न संप्रदायों में प्रचलित परंपराएं,धार्मिक जगत में मतभेद का कारण बन सकती हैं। कदाचित इसीलिए हरिहर मिलन जैसे समन्वयकारी उत्सव प्रारंभ किए गए।
और समन्वय का यह संदेश देने के लिए तीर्थ नगरी ‘अनादि अवंतिका’ से उत्कृष्ट और कौन सी जगह हो सकती थी,जहां सनातन परंपरा की तमाम धाराएं और उपधाराएं अपने पूरे वैभव के साथ उपस्थित हैं।

अरविन्द श्रीधर

