राष्ट्र-मंत्र वंदे मातरम् की प्रेरक जागरण यात्रा के 150 साल आज पूरे हो गए। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में इस प्रयाण गीत की अनन्य भूमिका है। चाहे उग्र क्रान्तिकारी हों अथवा गांधी मार्ग के अनुयायी आंदोलनकारी, सभी के लिए बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय का 7 नवंबर, 1875 को रचित वंदे मातरम् मातृभूमि के लिए बलिदान की अजस्र प्रेरणा रहा है। जन-जन में गहरी पैठ रखने वाले ऐसे समर-गीत की दूसरी मिसाल नहीं मिलती। इसमें अंतर्निहित तेज और ओज ही इसकी कालजयिता का आधार है। इसीलिए ब्रिटिश शासन काल में प्रतिबंध लगाने के बावजूद वंदे मातरम् गाया जाता रहा और इसके लिए आंदोलनकारी पुलिस के डंडे खाने से लेकर जेल जाने तक के लिए तत्पर रहते थे।
यशस्वी बांग्ला उपन्यासकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय का बहुचर्चित उपन्यास ‘आनंदमठ’ सन 1882 में प्रकाशित हुआ। आनंदमठ उपन्यास में वंदे मातरम् गीत का समावेश है। इसका कथानक बंगाल के सन्यासी विद्रोह पर बुना गया है। बंगाल का भीषण दुर्भिक्ष और उसके परिणामों की कथा आनंदमठ का प्रतिपाद है। उपन्यास का एक पात्र है भवानंद जो महेन्द्र के साथ निर्जन वन में चला जा रहा था। अचानक मौन भंग करने के लिए भवानंद गीत गाने लगे-
वन्दे मातरम्
सुजलाम् सुफलाम् मलयज शीतलाम्
शस्य श्यामलाम् मातरम् ।
महेन्द्र का मौन टूटा- माता कौन ?
भवानंद ने कोई उत्तर नहीं दिया, गाते रहे-
शुभ्र ज्योत्सनाम् पुलकित यामिनीम्
फुल्ल कुसमित द्रुमदल शोभिनीम्
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्
सुखदाम् वरदाम् मातरम्।
महेन्द्र बोले- यह तो देश है, माँ नहीं।
भवानंद कहते हैं- हम लोग दूसरी किसी माँ को नहीं मानते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। हम कहते हैं जन्मभूमि ही माता है। हमारी दूसरी न कोई माँ है, न बाप, न भाई, न बंधु, न पत्नी, न पुत्र, न घर, न द्वार………………।
बात महेन्द्र की समझ में आई, बोला- तो फिर गाओ।
वंदे मातरम् गीत मातृभूमि के प्रति समर्पण का उद्घोष है। मातृभूमि के लिए सब कुछ बलिदान कर देने का जीवट उपजाने वाला उद्घोष। इसका किसी धर्म अथवा देवी-देवता से कोई नाता नहीं। मातृभूमि से बड़ा कोई होता भी नहीं। इसीलिए तो यह आजादी का तराना बन गया। बंग-भंग आंदोलन के समय यही गीत सबसे बड़ी हुंकार बना था।
सन 1885 में रवीन्द्रनाथ टैगोर के परिवार की पत्रिका ‘बालक’ में वंदे मातरम् का प्रकाशन हुआ। सन 1896 में कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में पहली बार रवीन्द्रनाथ टैगोर ने वंदे मातरम् गाया था। उसके बाद के हर एक अधिवेशन की शुरुआत वंदे मातरम् गायन के साथ होने लगी। देखते ही देखते बंग भूमि में जन्मा वंदे मातरम् पूरे भारत का तराना बन गया। कांग्रेस के उग्रपंथी नेता विपिनचन्द्र पाल ने ‘वंदे मातरम्’ नाम का समाचारपत्र प्रकाशित किया। अरविंद घोष भी इससे जुड़े थे। इसी नाम का उर्दू अखबार लाहौर से प्रकाशित हुआ।
भाव-बोध की अधिष्ठात्री भारतमाता
स्वतंत्रता संग्राम के बीज मंत्र वंदे मातरम् से ही प्रेरणा मिली कि इस राष्ट्रगीत से भारत माता का जो शब्दचित्र उभरता है, उसे कैनवास पर उतारा जाए। उसमें रंग भरे जाएं। सन 1905 में अवनीन्द्रनाथ टैगोर ने भारतमाता की तस्वीर पहले-पहल उकेरी। अवनीन्द्रनाथ ने भगवा वस्त्र धारणी साधवी के रूप में भारतमाता को चित्रित किया। चार हाथों वाली माता जिनके एक हाथ में पुस्तक, दूसरे हाथ में धान की बाली, तीसरे हाथ में सफेद वस्त्र और चौथे हाथ में रूद्राक्ष की माला है। देवी स्वरूप में भारतमाता का यह चित्रण स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया। तभी तो कवि ने गाया है- ‘’हे मातृभूमि तेरी जय हो ! सदा विजय हो !

*विजयदत्त श्रीधर

