डिएला : आभासी सहायक से प्रतीकात्मक एआई मंत्री तक

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अल्बानिया की सरकार ने हाल ही में कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली ‘डिएला’ को सार्वजनिक खरीद (Public Procurement) के क्षेत्र में कैबिनेट-स्तरीय जिम्मेदारी सौंपने की घोषणा की—यह निर्णय वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व, संवैधानिक वैधता और नैतिकता के प्रश्नों को नया आयाम देता है।

डिएला, जो पहले e-Albania पोर्टल पर नागरिक सेवाओं की वर्चुअल सहायक थी, अब सरकारी निविदाओं की निगरानी और निर्णय-सिफारिशें देगी। सरकार का तर्क है कि एल्गोरिद्म-आधारित निर्णय मानवीय स्वार्थों और भ्रष्टाचार से मुक्त होंगे, पर विशेषज्ञ चेताते हैं कि किसी एआई की निष्पक्षता उसके डेटा, डिज़ाइन और निगरानी-तंत्र पर निर्भर करती है—अर्थात वह भी ऐतिहासिक पूर्वाग्रह दोहरा सकती है।

लोकतांत्रिक दृष्टि से यह प्रश्न जटिल है कि क्या किसी ऐसी इकाई को मंत्री माना जा सकता है जो शपथ नहीं लेती, संसद के प्रति जवाबदेह नहीं है और जिसे दंडित नहीं किया जा सकता। आलोचकों के अनुसार यह “असंवैधानिक प्रयोग” है जो राजनीतिक जिम्मेदारी को कमजोर करता है।

तकनीकी रूप से डिएला में प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण, मशीन लर्निंग और नियम-आधारित मॉड्यूल का सम्मिश्रण है, जो निविदाओं में अनियमितताओं को पहचानने का प्रयास करते हैं। सरकार ने ब्लॉकचेन-आधारित अभिलेख और पारदर्शिता का वादा किया है, पर ‘‘ब्लैक बॉक्स’’ जैसे एल्गोरिद्म में निर्णय के तर्क समझ पाना कठिन रहता है—नागरिक यह न जान सकें कि ठेका क्यों दिया गया, तो पारदर्शिता अधूरी रह जाएगी।

अल्बानिया में दशकों से भ्रष्टाचार और पक्षपातपूर्ण ठेकों के आरोप रहे हैं; इसलिए सरकार इसे सुधार और अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता दोनों के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर रही है। पर आलोचकों का कहना है कि तकनीक केवल “सतही सफाई” करती है—यदि सत्ता-संरचनाएँ वही रहें तो एल्गोरिद्म भी उन्हीं हितों की सेवा कर सकता है।

सामाजिक दृष्टि से युवा वर्ग इसे पारदर्शिता का अवसर मान रहा है, जबकि ग्रामीण समुदायों में यह भय है कि मशीनें स्थानीय संवेदनशीलता नहीं समझेंगी और रोज़गार व निर्णय-प्रक्रियाएँ अमूर्त हो जाएँगी। नागरिक समाज चाहता है कि ऐसे प्रयोगों से पहले जन-परामर्श और कानूनी रूपरेखा तय की जाए।

नैतिक रूप से यह “मोरल डेलिगेशन” का प्रश्न उठाता है—यदि एआई-निर्णय से नुकसान होता है तो उत्तरदायित्व किसका होगा? इंजीनियर, डेटा प्रदाता या वह मंत्री जो हस्ताक्षर करता है? यही दुविधा संवैधानिक बहस का केंद्र है।

साथ ही, साइबर सुरक्षा एक गंभीर चुनौती है—डेटा से छेड़छाड़ या मॉडल-हैकिंग से सार्वजनिक धन का दुरुपयोग संभव है। इसलिए स्वतंत्र ऑडिट, खतरा-निगरानी और मानव-हस्तक्षेप तंत्र आवश्यक हैं।

वैश्विक स्तर पर, अधिकांश देशों में एआई केवल मानव-निर्णय का सहायक है; अल्बानिया ने इस सीमा को पार किया है, इसलिए यूरोपीय संघ सतर्क है। विशेषज्ञों का मत है कि ऐसे प्रयोगों से पहले पाँच शर्तें जरूरी हैं:
1. निर्णयों की व्याख्या-योग्यता और समझने योग्य पारदर्शिता,
2. डेटा-ऑडिट द्वारा पक्षपात की रोकथाम,
3. स्पष्ट विधिक-संरचना जो अंतिम जिम्मेदारी तय करे,
4. मजबूत साइबर सुरक्षा और मानवीय बैक-अप,
5. और जन-संवाद व लोकतांत्रिक सहमति।

संभावित परिणाम तीन हैं—सफलता में भ्रष्टाचार घटेगा और साख बढ़ेगी; आंशिक सफलता में तकनीक केवल औपचारिक उपकरण बन जाएगी; असफलता में सुरक्षा या पक्षपात के कारण सरकार की विश्वसनीयता डगमगा सकती है।

भारत के सन्दर्भ में यह प्रयोग सीखने योग्य है—यहाँ किसी “एआई-स्टेट” की बजाय मानव निरीक्षण, भाषाई-सांस्कृतिक अनुकूलन और नागरिक सशक्तिकरण को प्राथमिकता देनी होगी।

अंततः, डिएला हमें यह सोचने पर विवश करती है कि क्या हम उस युग की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ निर्णय मशीनें लेंगी, या हम तकनीक और लोकतंत्र के संतुलन से नया मानवीय-नैतिक आदर्श गढ़ेंगे। अल्बानिया ने प्रयोग आरम्भ किया है; अब मानवता को तय करना है कि तकनीक उसका औज़ार बनेगी या भागीदार।

सोमी वसीम ज़ैदी
(लेखिका मूलतः शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत हैं एवं सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर निरंतर लिखती रहती हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत हैं।)

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