एक समय था जब पत्रकारिता लंगड़े की लाठी और गूंगों की आवाज़ हुआ करती थी। समाज निश्चिंत रहता था कि अखबार और पत्रकारों के रहते कुछ गलत नहीं हो सकता;और यदि कुछ गलत होगा तो पत्रकार अपनी कलम की ताकत का उपयोग करते हुए उसके खिलाफ़ आवाज उठाएंगे।
अखबारों की विश्वसनीयता ऐसी थी कि उसमें छपे प्रत्येक वाक्य को प्रमाण माना जाता था। यही कारण था कि जिम्मेदार संस्थाएं छपे हुए समाचारों का न केवल संज्ञान लेती थीं, बल्कि उस पर त्वरित कार्यवाही भी होती थी।
बाजारबाद के चलते अखबारों में धीरे-धीरे संपादक की सत्ता कमजोर होती गई,और व्यवसायिक हित हावी होते गए। समाचार गौण होते गए,और मुख्यपृष्ठ पर रंग-बिरंगे विज्ञापनों ने कब्जा कर लिया।

हित साधक समाचारों का दौर चला और फिर ‘पेड न्यूज’ के चलन ने समाचार माध्यमों की विश्वसनीयता और शाख को अच्छा-खासा नुकसान पहुंचाया। परिणाम यह हुआ कि पाठक वर्ग ने भी समाचार पत्रों को तवज्जो देना कम कर दिया।
दरअसल समाज के प्रत्येक हिस्से का नैतिक पतन हुआ है और अखबारनवीस भी समाज का ही हिस्सा हैं। स्वाभाविक है कि मीडिया जगत भी इससे प्रभावित हुआ। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब आम जनता तो मीडिया,खासतौर से अखबारों की ओर आशा भरी निगाहों से देखती है और अखबारों में कुछ अलग ही खेल चल रहा होता है।
ऐसा भी नहीं है कि सब कुछ समाप्त हो गया है। गाहे-बगाहे मीडिया जगत में कुछ ऐसा घट जाता है, जिससे आशा की किरणें फिर से झिलमिलाने लगती हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी इन दिनों ऐसी ही पहल कर रहे हैं, जो आशा जगाती है।
भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में देशभर के विद्यार्थी पत्रकारिता का हुनर सीखने आते हैं। वैसे तो आजकल के युवा अखबार में लिखने की बजाय टीवी एंकर बनना अधिक पसंद करते हैं, लेकिन इस तथ्य से भी भली भांति वाक़िफ हैं कि अखबार में लिखने का अपना महत्व है।
इसी को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय अपने पाठ्यक्रम में नवाचार कर रहा है।
अभी ज्यादा समय नहीं गुजरा है जब विश्वविद्यालय ने विद्यार्थियों की कक्षाओं में उपस्थित को लेकर कड़ाई बरतना शुरू किया था,और यह सामान्य सी बात अखबारों की सुर्खियां बन गई थी।
अब विश्वविद्यालय का एक और नवाचार चर्चा का विषय बना है। समाचार संकलन से लगाकर,
संपादन,कंपोजिंग और प्रिंटिंग तक प्रत्येक चरण का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए विद्यार्थी अपना समाचार पत्र तैयार करते हैं। पत्रकारिता विश्वविद्यालय के लिए यह एक सामान्य अभ्यास है। लेकिन अपने कुलगुरु की प्रेरणा से विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने इसे एक उल्लेखनीय घटना बना दिया।

विद्यार्थियों द्वारा तैयार किया गया न्यूज़ बुलेटिन ‘विकल्प’ हाल ही में जारी किया गया है। इसे देखकर लगता है कि पत्रकारिता के मूलभूत सिद्धांत घुट्टी में घोलकर विद्यार्थियों को पिलाए जा रहे हैं। विश्वविद्यालय से निकलकर जब यह विद्यार्थी अपने कार्यक्षेत्र में जाएंगे और वास्तविकता के कठोर धरातल पर उनके पैर पड़ेंगे, तब दुनियादारी के वसीभूत होकर उनका व्यवहार जैसा भी रहे, लेकिन यह तो उन्हें हमेशा याद रहेगा कि पत्रकार के रूप में उनका मूल काम गूंगे की आवाज़ और बेसहारों का सहारा बनना है।
वरिष्ठ पत्रकार अलीम बजमी ने विद्यार्थियों की इस पहल की खुलकर सराहना की है। वह लिखते हैं-
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के पत्रकारिता विभाग के विद्यार्थियों ने यह साबित कर दिया है कि पत्रकारिता केवल खबरों का माध्यम नहीं, बल्कि दृष्टि, संवेदना और साहस का संगम है। विद्यार्थियों द्वारा तैयार विश्वविद्यालय का समाचार पत्र ‘विकल्प’ इस बात का सशक्त प्रमाण है कि कल की पत्रकारिता आज की लैब में आकार ले रही है।
‘विकल्प’ का हर पन्ना पाठक से बात करता है, सवाल करता है और जवाब भी तलाशता है। यह अख़बार किसी सत्ता की मृदंग पर थिरकता नहीं, न ही राग जयजयवंती का आलाप करता है। इसमें न तो चापलूसी की चमक है, न ही विचारों की चिपचिपाहट—बस एक शुद्ध और सधी हुई पत्रकारिता की धड़कन सुनाई देती है।
अखबार की कवर स्टोरी ‘शर्म करो शहर के स्वामी’ शीर्षक ही इतना सशक्त है कि पाठक का ध्यान तुरंत खींच लेता है। इसके ठीक नीचे महापौर, मंत्री, सांसद, विधायक और पार्षदों की संख्या का उल्लेख, राजधानी के सिस्टम की सच्ची तस्वीर दिखाने का प्रयास करता है। यह खबर न केवल प्रश्न उठाती है बल्कि पाठक को विषय के केंद्र तक पहुंचा देती है—यही इसकी पत्रकारिता की सफलता है।
पेज नंबर 2 पर प्रकाशित लेख “मध्य प्रदेश की यह कैसी राजधानी?” में 20 राज्यों के 1800 विद्यार्थियों के नजरिए से भोपाल के पब्लिक ट्रांसपोर्ट की पड़ताल की गई है। लेख शोधपरक है और व्यवस्था को आईना दिखाता है। इससे यह स्पष्ट झलकता है कि विद्यार्थियों में न केवल खबर लिखने की कला है, बल्कि समाज की नब्ज़ पहचानने की परिपक्व समझ भी विकसित हुई है।

विकल्प के अंतिम पन्ने पर प्रकाशित “पग-पग संकट, डग-डग पीर” शीर्षक ग्राउंड रिपोर्ट और “बेबस स्टॉप” शीर्षक सामग्री पाठक को हकीकत के सबसे करीब ले जाती है। यह वह पत्रकारिता है जो दर्द को महसूस करती है और उसे शब्दों में जीने का साहस रखती है।
इस शानदार प्रयास के लिए विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी को विशेष साधुवाद देना होगा। अपने अनुभव और दृष्टि से उन्होंने विद्यार्थियों में पत्रकारिता की सच्ची चेतना जगाई है। अखबार के हर पन्ने में वही तेज, वही नयापन और वही जिम्मेदारी की झलक दिखती है जो सशक्त पत्रकारिता की पहचान होती है।
‘विकल्प’ के पेज नंबर 4 और 5 पर तिवारीजी का लेख “गुमटी-ठेला जिंदाबाद, झुग्गी-झोपड़ी जिंदाबाद” सिस्टम पर तीखा मगर सटीक कटाक्ष करता है। यह केवल आलोचना नहीं, बल्कि सुधार का संकेत भी है। उनकी लेखनी का तीखापन पाठक को अंत तक बांधे रखता है। वैसे, तिवारीजी की रचनात्मकता किसी परिचय की मोहताज नहीं—‘हरसूद 30 जून’ की मार्मिक रिपोर्ताज हो या ‘आधी रात का सच’ जैसी अमर कृति, दोनों उनकी संवेदनशील पत्रकारिता की मिसाल हैं।

पत्रकारिता विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. राखी तिवारी, प्रोफेसर शिव कुमार विवेक, अनूप दत्ता, रंजन सिंह और राजेश गाबा का योगदान भी प्रशंसा के योग्य है। इन सभी ने विद्यार्थियों को प्रेरित कर न केवल दिशा दी, बल्कि मंगलवार की रात विश्वविद्यालय की लैब को न्यूज़रूम में बदलकर पत्रकारिता की असली बुनावट से छात्रों को जोड़ा।
‘विकल्प’ अपने नाम की तरह ही एक सशक्त विकल्प बनकर सामने आया है—चापलूसी से दूर, सच्चाई के करीब और पेशेवर पत्रकारिता के मानकों पर पूरी तरह खरा। इसमें संवेदना की नमी है, सवालों की धार है और जिम्मेदारी की गर्माहट भी। अगर यही रफ्तार बरकरार रही, तो यह कहना गलत न होगा कि भविष्य का मीडिया इन्हीं विद्यार्थियों की कलम से सुरक्षित और संजीदा रहेगा।
“अलीम बजमी
(वरिष्ठ पत्रकार)

