इस बार ‘मरना कैंसल’ नहीं किया वीरू ने…

6 Min Read

फिल्म शोले का पानी की टंकी वाला दृश्य याद है आपको?
यह भी कोई सवाल हुआ? वह दृश्य भला किसे याद नहीं होगा – “बसंती भी तैयार है…मौसी भी तैयार है…अब मरना कैंसल…”

खैर,यह तो फिल्मी संवाद था,लेकिन पिछले दिनों जब धर्मेंद्र की सेहत बिगड़ी और किसी अनहोनी को लेकर तरह-तरह की खबरें उनके प्रशंसकों में फैलने लगीं,तब धर्मेंद्र ने इस फिल्मी संवाद को अपने वास्तविक जीवन में जैसे चरितार्थ कर दिया। मानो कह रहे हों- हजारों-लाखों प्रशंसक उनसे मोहब्बत करने के लिए तैयार हैं, इसलिए मरना कैंसल…
और वह सकुशल अपने घर वापस आ गए।

लेकिन इस बार जब वह अस्पताल में भर्ती हुए तो नियति द्वारा निर्धारित पटकथा के साथ उन्होंने कोई छेड़छाड़ नहीं की,और निकल पड़े अनंत की उस यात्रा पर,जहां से कोई वापस नहीं आता।

धर्मेंद्र सिर्फ अभिनेता होने अथवा अपने सुदर्शन व्यक्तित्व के चलते ही लोकप्रिय नहीं थे,बल्कि एक अच्छे इंसान के रूप में भी उनकी पहचान थी। वह हर दृष्टि से सफल थे,लेकिन सफलता उनके मूल स्वभाव पर कभी हावी नहीं हो सकी।
मुंबई जैसे चमक-दमक वाले शहर में,रूपहले पर्दे पर छह दशक से अधिक समय बिताने और 300 से अधिक फिल्मों में काम करने के बाद भी अपने अंदर मौजूद गांव के भोले-भाले इंसान को उन्होंने मरने नहीं दिया था। तमाम चमक-दमक के बावजूद ठेठ देसी अंदाज़ ने उन्हें कभी अपनी जड़ों से दूर नहीं होने दिया।

उनका व्यक्तित्व विशिष्टताओं का अद्भुत संगम था।अभिनय कुशलता, सहजता, सरलता,ज़िंदादिली,
नेकदिली,इंसानियत,मजबूत कदकाठी के साथ-साथ
सुंदर सौम्य भावप्रवण चेहरा,बेपनाह मोहब्बत का खज़ाना,शायराना मिज़ाज,बेतकल्लुफ़ी और चुंबकीय आकर्षण;यह सब कुछ समाहित था धर्मेंद्र के व्यक्तित्व में। जिंदगी के हर पल को भरपूर जी लेने की उनकी ललक,इन सदगुणों के लिए जैसे उत्प्रेरक का काम करती थी।

यदि आज की पीढ़ी को इसमें कुछ अतिशयोक्ति लग रही हो तो नेट पर उपलब्ध इंडियन आईडल अथवा कपिल शर्मा शो के वह एपिसोड जरूर देखें जिनमें धर्मेंद्र मेहमान के रूप में आए थे।उन्हें धर्मेंद्र के व्यक्तित्व और उनकी लोकप्रियता की वजहों की एक झलक तो मिल ही जाएगी।

दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार ने एक बार कहा था- ‘जब मैंने पहली बार धरम को देखा था,तो देखते ही मेरे दिल में उमंग पैदा हुई,अल्लाह ने मुझे ऐसा ही बनाया होता तो क्या जाता।’

धर्मेंद्र फिल्मी दुनिया के एक ऐसे हरफनमौला कलाकार थे जिनकी मांग हमेशा बनी रही,चाहे उस दौर का सुपरस्टार कोई भी रहा हो।उनको सदाबहार अभिनेता यूं ही नहीं कहा गया।

धर्मेंद्र 1958 में फिल्म फेयर पत्रिका की टेलेंट हंट प्रतियोगिता जीतकर अभिनय जगत में आए थे, लेकिन उन्हें हमेशा यह अफसोस रहा कि दर्जनों हिट फिल्में देने के बाद भी उन्हें कभी अवॉर्ड नहीं दिया गया। 1997 में जब ‘फिल्म फेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरुस्कार’ से उन्हें सम्मानित किया गया,तब उन्होंने अपने इस दर्द को साझा किया था।

भले की उन्हें फिल्म फेयर पुरस्कार ना मिला हो, लेकिन देश विदेश के अनेक सन्मान उन्हें समय- समय पर मिलते रहे हैं।

सिनेमा में उल्लेखनीय योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा उन्हें वर्ष 2012 में ‘पद्मभूषण’ सम्मान से अलंकृत किया गया था।

1970 के दशक में अमेरिका की प्रसिद्ध पत्रिका ‘टाइम’ ने धर्मेंद्र को विश्व के दस सबसे खूबसूरत पुरुषों की सूची में शामिल किया था।

वर्ष 2004 में वह राजस्थान के बीकानेर संसदीय क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुने गए थे,लेकिन राजनीति उन्हें रास नहीं आई। धर्मेंद्र जैसे व्यक्ति को राजनीति रास आ भी नहीं सकती थी।

ऐसे हरदिल अज़ीज़ इंसान ने जब 24 नवंबर 2025 को आखिरी सांस ली,तो लगा जैसे एक युग का अंत हो गया हो।
फिल्मी दुनिया में वैसे तो एक से बढ़कर एक दिग्गज कलाकार हुए हैं, लेकिन धर्मेंद्र सिर्फ एक ही हो सकता है।

कहा जाता है कि व्यक्ति का अंतिम समय यह बताता है कि उसने अपना जीवन कैसे जिया!
यह सामान्य बात नहीं है कि कोई व्यक्ति उम्र के 9 वें दशक में भी न केवल पूर्ण चैतन्य रहे,बल्कि सक्रिय भी बना रहे। धर्मेंद्र अपनी अंतिम सांस तक चैतन्य भी रहे और सक्रिय भी। यह प्रदर्शित करता है कि धर्मेंद्र केवल वाह्य रूप से ही सुदर्शन नहीं थे,अपितु उनका आंतरिक सौंदर्य भी उतना ही समृद्ध था।

एक अच्छे इंसान का चले जाना आम से लगाकर खास तक सभी को द्रवित करता है। धर्मेंद्र के निधन से सिने प्रेमी तो दुखी हैं ही,वह लोग भी दुखी हैं जो सामान्यतः सिनेमा नहीं देखते।
सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर भारत के राष्ट्रपति से लगाकर आम जनता तक धर्मेंद्र को श्रद्धा सुमन अर्पित कर रही हैं।

हे सौम्य ‘ही मैन’ तुम हमेशा हमारी यादों में बने रहोगे।

*अरविन्द श्रीधर

इस पोस्ट को साझा करें:

WhatsApp
Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *