ओशो का जन्मदिन 11 दिसंबर हमें ओशो और उनकी विचारधारा को लेकर चिंतन , मनन और ध्यान के जरिए तर्क वितर्क, संवाद और साधना का अवसर प्रदान करता है। आचार्य रजनीश यानी ओशो ने आध्यात्मिक चेतना, जीवन मे प्रेम ,स्वतंत्रता और ज्ञान की पुनर्व्याख्या की। वह पारंपरिक आध्यात्मिक ढांचे को चुनौती देते हैं तथा मनुष्य की मानसिक और अस्तित्वगत जटिलताओं का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं। आमतौर पर लोग विचारों से ज्यादा व्यक्ति पर दिलचस्पी रखते हैं,शायद इसलिए आचार्य रजनीश को लेकर कई तरह की विचारधाराएं हैं।
ओशो की विचारधारा परंपरागत विश्वास और सिद्धांतों के हमेशा विपरीत रही है ।
वह कहते थे कि किसी तरह का कोई विश्वास सिद्धांत नहीं होता।आप जितनी गहराई में जाएंगे आप पाएंगे कि सब शून्य है। बुद्ध ने इसे ही निर्वाण यानी शून्यता कहा है। व्यक्ति शून्य से शिखर तक का सफर करता है। लेकिन ओशो ने शिखर से शून्य तक का सफर कर जीवन की महत्ता प्रतिपादित की है।
ओशो कहते हैं कि अहंकार, हीनता को छुपाने का उपाय है। हीनता की भीतरी गांठ अहंकार है।
वह कहते हैं कि पशु पक्षियों में अहंकार नहीं होता, जबकि मनुष्य का अहंकार हमेशा उसे और बड़ा बनाना चाहता है।उनका मानना है कि तुलना करना ही अहंकार बनाए रखने का रास्ता है। ओशो कहते हैं कि व्यक्ति में कभी कोई संपूर्णता नहीं होती।अगर उसके पास धन संपत्ति है तो शांति या सुकून नहीं होगा। पैसा होगा तो सुंदरता नहीं होगी। सुंदरता या कोई और अच्छाई होगी तो कुछ और नहीं होगा। दुनिया में कोई ना कोई, किसी न किसी चीज में उससे आगे होगा।
ओशो यही कहते हैं कि जब तुलना होती है तो अहंकार सबके लिए मुश्किल पैदा करता है। वह कहते हैं कि अहंकार को समझो अपने शून्य को स्वीकार करो।
शून्य में राजी हो जाओगे तो सब कुछ पा जाओगे। ओशो एक ऐसी मानवता की कल्पना करते हैं जो धार्मिक , जाति और विचार के स्तरों से मुक्त होकर चेतना पर आधारित है। प्रेम को स्वतंत्रता और समाज का प्राकृतिक विस्तार मानते हैं।
वह यौन ऊर्जा को जीवन की मूल ऊर्जा कहते हैं। जिसका रूपांतरण केवल जागरूकता से ही संभव है। शायद इसी वजह से उनकी है विचारधारा कुछ लोगों को नापसंद है।
ओशो ने इस बात पर जोर दिया की मन को खाली करने का अर्थ दबाना नहीं बल्कि जी कर पार करना है। उन्होंने व्यक्ति की दबी हुई भावनाओं व तनाव को देखते हुए कई ध्यान विधियों का विकास किया।
ओशो की लोकप्रियता और विवादों का मूल कारण उनका विद्रोही स्वर है। वे धर्म , राजनीति , नैतिकता और शिक्षा पर निर्भीक टिप्पणी करते हैं। मनुष्य को सजग और स्वतंत्र रहने का संदेश देते हैं । आज ओशो का दर्शनशास्त्र परंपरा और आधुनिकता के मध्य एक सेतु का काम कर रहा है। वह किसी संप्रदाय तक सीमित नहीं है,बल्कि बौद्ध,जैन , सूफी, वेदांत और आधुनिक मनोविज्ञान को लेकर संवाद करते हैं । उनका जोर रहा है कि सत्य उधार में नहीं मिलता बल्कि उसे स्वयं के भीतर खोजा जाना चाहिए ।
ओशो एक ऐसे चिंतक रहे हैं जो निरंतर संवाद ,बहस और आत्म मंथन के लिए सदैव अकाट्य तर्क प्रस्तुत करते रहे।
ओशो और गाडरवारा
यह सुखद संयोग है कि नरसिंहपुर, जबलपुर जिले का संबंध आचार्य रजनीश से रहा है। आचार्य रजनीश की कर्म भूमि नरसिंहपुर जिले का गाडरवारा है,जहां उनका बचपन बीता। प्राथमिक से लेकर हायर सेकेंडरी तक उन्होंने वहां शिक्षा कीप्राप्त की। म्युनिसिपल हाई स्कूल जो अब शासकीय आदर्श उत्तर माध्यमिक विद्यालय है ,में उन्होंने पांचवी से दसवीं तक की पढ़ाई की। इसके बाद वह जबलपुर के महाकौशल कॉलेज जिसे पहले रॉबर्टसन कॉलेज कहा जाता था, वहां उन्होंने दर्शनशास्त्र की पढ़ाई की। 1960 से 1967 तक वह प्रोफेसर रहे । इसके पहले डीएन जैन कॉलेज जबलपुर में उन्होंने पढ़ाई की ।
11 दिसंबर 1931 में अपने ननिहाल कुचवाड़ा में जन्मे रजनीश चंद्र मोहन जैन 1939 में माता-पिता के पास गाडरवारा में आकर रहने लगे। उसके बाद 1970 से 74 तक मुंबई में रहे। 1981 में पुणे पहुंचे फिर वहां से 1985 में अमेरिका के लिए प्रस्थान कर गए। अमेरिका में कम्यून की स्थापना और यहां व्यक्त विचारों को लेकर वह पूरी दुनिया में चर्चित हुए। 1987 में पुनः पुणे आ गए, जहां 19 जनवरी 1990 को दुनिया से महाप्रयाण कर गए ।
रजनीश चंद्रमोहन जैन कैसे आचार्य रजनीश और फिर कैसे आचार्य रजनीश से ओशो बन गए, इस पूरी यात्रा के अनेक प्रत्यक्षदर्शी गाडरवारा में हैं।
उनके बाल सखा बताते हैं कि उनकी पढ़ने लिखने की बेहद ललक और अद्वितीय मेधा के दर्शन बचपन में ही हो गए थे।
वह रोजाना गाडरवारा के वाचनालय से कभी तीन तो कभी पांच पुस्तक लेते और पढ़कर दूसरे दिन जमा करके नई पुस्तक में निकलवाते। घर के सभी परिजनों को उन्होंने वाचनालय का सदस्य बना रखा था ताकि पुस्तक लेने में कोई समस्या ना रहे ।
आचार्य रजनीश के बाल सखा बताते हैं कि उन्हें प्रकृति से काफी लगाव था।वह शक्कर नदी, फूल पहाड़ इनके बीच ज्यादा समय गुजारते थे। गाडरवारा में तांगे वाले से लेकर आम आदमी तक का जिक्र उनकी पुस्तकों में है । मित्रता और स्नेह में कभी आयु और जाति बंधन नहीं रखा ।इसका प्रमाण यह है कि जब रजनीश मोहन चंद्र छात्र थे तो 1945 से 1950 के आसपास झांसी की रानी फिल्म की पटकथा लिखने वाले साहित्यकार 58 वर्षीय शंभू रतन दुबे से उनकी मित्रता हो गई थी, जबकि उनकी उम्र उस समय 13 वर्ष ही थी।
लोगों को याद है जब 1968 में उनका अंतिम बार गाडरवारा आगमन हुआ था। अवसर था नर्मदा महाविद्यालय के लिए आर्थिक सहायता जुटाना। इसके लिए उन्होंने संगीतकार कल्याण जी आनंद जी नाइट का आयोजन किया था।
गाडरवारा इसलिए भी चर्चित है कि यहां उन्हें मृत्यु का बोध हुआ।बताते हैं कि एक बार ध्यान के वक्त एक नाग उनके सामने फन फैलाकर बैठ गया था, और दोनों एक दूसरे को देखते रहे थे।
वाचनालय में उनके हस्ताक्षरयुक्त पुस्तकें आज भी रखी हैं
करीब 100 वर्षों से निरंतर संचालित इस पुस्तकालय के उपाध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार अनिल गुप्ता कहते हैं कि इस वाचनालय में उनके द्वारा पढ़ी गई , लिखी गई और उनके हस्ताक्षर युक्त पुस्तकें अभी भी रखी हुई हैं।इस धरोहर से रुबरु होने यहां हर साल उनके अनेक अनुयाई आते हैं । इस पुस्तक सदन में वह रजिस्टर आज भी सुरक्षित रखा है पुस्तकें प्राप्त करते वक्त वह दस्तखत किया करते थे ।

डा. बृजेश शर्मा
(लेखक एक विश्वविद्यालय में अतिथि विद्वान हैं। यहां व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत हैं।)

