ऐसे दौर में,जब जिम्मेदार लोग अरावली पर्वत श्रंखला को पुनरपरिभाषित कर उसके अस्तित्व को ही संकट में डालने के आत्मघाती आदेश पर हस्ताक्षर कर रहे हों; विकास के नाम पर जंगलों के सफाए के षड़यंत्रों में भागीदार बन रहे हों; गंभीर पर्यावरणीय क्षति के लिए जिम्मेदार लोगों को क्लीन चिट दिलवाने की सपड़दलाली में सहभागी हों; तब यदि कोई उच्च पद पर आसीन अधिकारी पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में गंभीर और परिणामदायी पहल के लिए विश्वस्तर पर पहचाना जाकर सम्मानित किया जा रहा हो,तो इसे केवल सम्मान नहीं,अपितु आशा की एक किरण के रूप में देखा जाना चाहिए।
देश में भारतीय प्रशासनिक सेवा के ऐसे हजारों अधिकारी होते हैं जिनके हाथों में लगभग असीमित अधिकार होते हैं। यह भी सर्वविदित है कि भारतीय शासन व्यवस्था में इन अधिकारियों
को लगभग सर्वज्ञ के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। यह वर्ग कानून व्यवस्था,कृषि, शिक्षा,संस्कृति,
इंजीनियरिंग,चिकित्सा, वित्तीय मामले, न्याय व्यवस्था, मानवाधिकार, विदेश नीति आदि सब कुछ संचालित और नियंत्रित करने के काबिल माना जाता है।
जिला कलेक्टरों को तो ‘ऑन स्पॉट गवर्नमेंट’ ही कहा जाता है।
लेकिन ऐसे कितने अधिकारी हैं जो उन्हें प्राप्त अधिकारों का सार्थक उपयोग कर पाते हैं ; अथवा कुछ ऐसे काम कर पाते हैं जिनसे उनका अधिकार संपन्न होना सार्थक हो सके।
वास्तविकता तो यह है कि उच्च अधिकारियों की छवि आंकड़ों को आवश्यकतानुसार अनुकूल या प्रतिकूल गढ़ने वाले विशेषज्ञ और फाइलों की जलेबी बना देने वाले चतुर सुजान व्यक्ति की जरूर बन गई है।
कभी-कभी लगता है जैसे यह वर्ग अपनी इस छवि के साथ आत्ममुग्धता की इतनी गहरी खाई में उतर चुका है,कि वह इसे ही अपनी उपलब्धि मान बैठा है।
रही बात राजनीतिक नेतृत्व की, तो उनके लिए तो वह सारे काम निरर्थक हैं,जो वोट नहीं दिला सकते,और ऐसे किसी काम में वह अड़ंगा ना लगाएं, इसे ही उनका ऐतिहासिक योगदान मान लिया जाना चाहिए।
ऐसे माहौल में जब सुप्रिया साहू जैसे अधिकारियों की उपलब्धियां विश्व स्तर पर सराही जाती हैं,तो एक आश्वस्ति होती है कि उम्मीद की किरण मद्धम जरूर हुई है,मगर अभी भी जुगजुगा रही है। कुछ ऐसे अधिकारी अभी भी हैं,जो अपने होने को सार्थक करने की चेष्टा कर रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने सुप्रिया साहू को वर्ष 2025 का ‘चैंपियंस ऑफ द अर्थ’ सम्मान प्रदान किया है। भारतीय प्रशासनिक सेवा की 1991 संवर्ग की अधिकारी सुप्रिया साहू को यह सम्मान,पर्यावरण के क्षेत्र में परिणाममूलक नवाचारों के लिए प्रदान किया गया है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा पर्यावरण के क्षेत्र में दिया जाने वाला यह सर्वोच्च सम्मान है।
उनके पर्यावरण योद्धा बनने के पीछे एक ऐसी घटना है,जिसे भारत में सामान्यतः नजरअंदाज कर दिया जाता है। 2002 में जब सुप्रिया की पदस्थापना नीलगिरी जिले में कलेक्टर के पद पर थी,तब उन्होंने जंगली जानवरों को प्लास्टिक कचरा खाते हुए देखा। हम सभी यह दृश्य देखने के आदी हैं।गांव-शहर की गलियों से लगाकर जंगलों तक में, जानवर प्लास्टिक कचरा खाने के लिए अभिशप्त हैं। सुप्रिया साहू भी अगर चाहतीं तो इस दृश्य को नजरअंदाज कर सकती थीं;लेकिन इस एक सामान्य सी घटना ने उन्हें ‘ऑपरेशन ब्लू माउंटेन’ जैसा नवाचार आजमाने की प्रेरणा दी।
इस अभियान के माध्यम से नीलगिरी जिला सिंगल यूज प्लास्टिक से पूरी तरह मुक्त हो सका।
इतना ही नहीं,उन्होंने हजारों लोगों को अपने साथ जोड़कर सघन वृक्षारोपण अभियान भी चलाया। 24 घंटे में सबसे अधिक पेड़ लगाने का देश का पहला विश्व रिकॉर्ड,उनके नेतृत्व में ही कायम हुआ था।
‘मीडम मंजपाई’ उनका दूसरा ऐसा नवाचार था जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हुआ। इस अभियान के तहत लोगों को प्लास्टिक के स्थान पर पीले कपड़े से बने थैलों का इस्तेमाल करने के लिए जागरूक किया गया। इससे एक तरफ तो हानिकारक प्लास्टिक के उपयोग में कमी आई,दूसरी ओर हजारों लोगों को रोजगार भी प्राप्त हुआ।
उनकी एक और सराहनीय पहल रही तमिलनाडु में स्कूल की छतों की पुताई सौर परावर्तक रंगों से करवाना। इसका परिणाम यह हुआ कि भीषण गर्मी के दिनों में कक्षाओं के तापमान में 5 से 8 डिग्री की कमी दर्ज की गई, जो एक बड़ी राहत थी।
ग्रीन तमिलनाडु मिशन तथा मैंग्रोव वनों के विस्तार जैसी तमिलनाडु सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
मैंग्रोव वनों के विस्तार से जैव विविधता भी समृद्ध हुई,और तटीय कटावों तथा चक्रवातों से भी राज्य को सुरक्षा प्राप्त हुई।
जीवन और जलवायु को सीधे-सीधे प्रभावित करने वाली इन योजनाओं का विशेष उल्लेखनीय पक्ष है, उनका समुदाय केंद्रित होना।
इससे एक तो लोगों में जिम्मेदारी का भाव दृढ़ हुआ और दूसरे उन्हें रोजगार के अवसर भी उपलब्ध हुए।
सुप्रिया साहू अपने कैरियर में यह सब उपलब्धियां इसलिए हासिल करती चली गईं,क्योंकि उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा में अपने चयन को सिर्फ एक पढाकू विद्यार्थी द्वारा प्रतियोगी परीक्षा में हासिल की गई सफलता के रूप में नहीं लिया। उन्होंने इसे एक ऐसे अवसर के रूप में लिया,जिसके माध्यम से वह अपने होने की सार्थकता साबित कर सकती थीं।
अगर वह अपनी अधिकार संपन्नता का सार्थक प्रयोग नहीं करतीं, तो वह भी उन हजारों अधिकारियों की सूची में शामिल हो जातीं,जो चयनित होते हैं, रूटीन कामकाज करते हैं और 60 साल की उम्र में रिटायर हो जाते हैं।
यू.एन.ई.पी. ने सुप्रिया साहू को सम्मानित करते हुए ठीक ही कहा है – ‘उन्होंने पर्यावरण और जलवायु का एक ऐसा प्रादर्श खड़ा किया है,जो समूचे विश्व के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है।’
आपका आत्मीय अभिनंदन सुप्रिया साहू। यदि आप भारतीय प्रशासनिक सेवा के अन्य अधिकारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकीं,तो ऐसे बहुत से नवाचार आकार ले सकते हैं।
*अरविन्द श्रीधर

