मनुष्यता की मौलिकता अंतःचेतना में है

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स्वामी विवेकानन्द युवाओं के प्रेरणा स्त्रोत हैं। वे ऐसे मौलिक विचारक हैं, जिन्होंने मनुष्य को उसकी क्षमताओं का बोध कराया। वे कहते थे कि मनुष्य के भीतर अपार शक्ति है और स्वयं को कमजोर मान लेना सबसे बड़ी कमजोरी है। उन्होंने उस युवा की कल्पना की, जो अपने सामर्थ्य से परिचित हो, अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहे और अपने समाज के प्रति उत्तरदायी हो। आज जब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस जीवन, शिक्षा और रोजगार की संरचना को तीव्र गति से बदल रहा है, तब यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या विवेकानन्द का विचार आज भी युवा के लिए उतना ही प्रभावी है। 

जब संसार कृत्रिम बुद्धिमत्ता की चकाचौंध में चेतना के मूल प्रश्न को विस्मृत करता जा रहा है, तब स्वामी विवेकानन्द का दर्शन एक दीप्त दिशासूचक की भांति उभरता है। आज जब मशीनें मनुष्य के मस्तिष्क की मीमांसा करने लगी हैं, तब यह पूछना अनिवार्य हो जाता है कि क्या एल्गोरिथ्म आत्मा का अनुकरण कर सकता है? क्या डेटा,धर्म का विकल्प बन सकता है? विवेकानन्द की जयंती पर यह विमर्श केवल स्मरण का संस्कार नहीं, बल्कि समकालीनता का संवाद है; जो तकनीक और तत्त्व के बीच, प्रोग्रामिंग और प्रज्ञा के बीच सेतु निर्मित करता है।

वर्तमान में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस मानवीय निर्णयों, उत्पादन प्रणालियों और ज्ञान-संरचना में निर्णायक भूमिका निभा रहा है, तब विवेकानन्द के विचार और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। वे मानते थे कि शिक्षा का अर्थ सिर्फ जानकारी इकट्ठा करना नहीं,बल्कि चरित्रवान नागरिक तैयार करना है। असली ज्ञान वही है जो इंसान को संवेदनशील,साहसी और नैतिक बनाता है। नई शिक्षा नीति (NEP 2020) में कौशल, चरित्र और समग्र विकास पर जो बल दिया गया है, वह विवेकानन्द की शिक्षा-दृष्टि से प्रतिध्वनित होता है। AI आधारित लर्निंग प्लेटफॉर्म आज लाखों छात्रों तक पहुँचे हैं, पर यह भी देखा गया है कि केवल ऑनलाइन दक्षता सामाजिक संवेदनशीलता नहीं सिखा सकती। कोविड काल में डिजिटल शिक्षा की व्यापकता के साथ यह तथ्य सामने आया कि जिन छात्रों में आत्म-अनुशासन और उद्देश्यबोध था,वही तकनीक का सही लाभ उठा सके। यह प्रत्यक्ष प्रमाण है कि विवेकानन्द का चरित्र-आधारित शिक्षा मॉडल आज भी व्यवहारिक सत्य है।

आज का युवा तकनीक में बहुत आगे है, लेकिन कई बार निर्णय लेने में भ्रमित रहता है। AI उसे कई विकल्प देता है, पर विवेकानन्द का दर्शन उसे सही विकल्प चुनने की समझ सिखाता है। युवाओं के निर्णयों में विवेक की आवश्यकता को हाल की सामाजिक घटनाएँ पुष्ट करती हैं। सोशल मीडिया और AI एल्गोरिद्म द्वारा संचालित ट्रेंड्स ने यह दिखाया है कि बिना विवेक के तकनीक युवाओं को भ्रम, ध्रुवीकरण और मानसिक दबाव की ओर भी ले जा सकती है। फेक न्यूज़ और डीपफेक जैसी घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि तकनीकी जानकारी पर्याप्त नहीं; नैतिक विवेक आवश्यक है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता पैटर्न पहचान सकती है, परंतु पीड़ा को प्रत्यक्ष नहीं कर सकती। वह गणना कर सकती है, किंतु करुणा का कोई कोड नहीं लिख सकती। विवेकानन्द की यही शिक्षा हमें बताती है कि मनुष्यता की मौलिकता उसकी अंतर्चेतना में है, उसके अल्गोरिथ्म में नहीं।

वर्तमान समय में जो युवा पीढ़ी स्क्रीन और स्वाइप के बीच अपनी अस्मिता खोज रही है, उसके लिए विवेकानन्द का यह विचार विशेष महत्व रखता है कि उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए। विवेकानन्द युवाओं से शक्ति और बुद्धिमत्ता के साथ ही आत्म अनुशासन और लक्ष्य की अपेक्षा भी करते थे। उनका मानना था कि भारत का भविष्य युवाओं के हाथों में है। भारत पुनः विश्व गुरु के पद पर प्रतिष्ठित हो, इसके लिए आवश्यक है कि युवा अपने भीतर के असीम सामर्थ्य को पहचानें, न कि किसी डिजिटल डोपामाइन की प्रतीक्षा में अपनी ऊर्जा को क्षीण करें।

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के युग में विवेकानन्द का दर्शन आवश्यक मानवीय संतुलन के रूप में आवश्यक है। समाज के अनुभव, नीतिगत प्रयोग और युवाओं की वास्तविक भूमिका इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि बिना विवेक के बुद्धिमत्ता भी अधूरी है। यह विमर्श तब सार्थक निष्कर्ष तक पहुँचता है,जब हम यह स्वीकार करें कि कृत्रिम युग की सबसे बड़ी चुनौती मानवीय चेतना का संरक्षण है। स्वामी विवेकानन्द इसी संरक्षण के चिंतक हैं। वे हमें सिखाते हैं कि भविष्य मशीनों से नहीं, मूल्यों से सुरक्षित होगा; गति से नहीं, दिशा से सार्थक होगा। आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस मनुष्य की क्षमता बढ़ा सकता है,पर उसकी जिम्मेदारी नहीं उठा सकता। 

जैसे विवेकानन्द ने अपने समय में,पूर्व और पश्चिम के बीच सेतु बनाया, वैसे ही आज की पीढ़ी को मशीन और मनुष्य के बीच, डेटा और संस्कृति के बीच सेतु निर्मित करना है। यह सेतु निर्माण का कार्य न तो सरल है, न ही त्वरित। परंतु विवेकानन्द ने हमें यह विश्वास दिया है कि मनुष्य में असीम संभावनाएँ हैं। जब हम AI के समक्ष अपनी प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं, तब विवेकानन्द हमें स्मरण कराते हैं कि मनुष्य एक यंत्र नहीं, बल्कि चेतना का संवाहक है। यह चेतना ही हमारी विशिष्टता है, यही हमारी शक्ति है, और यही हमारा भविष्य है। AI हमें अधिक कुशल बना सकता है, परंतु केवल हम स्वयं को अधिक मानवीय बना सकते हैं,और इस मानवीकरण की यात्रा में स्वामी विवेकानन्द का दर्शन सदैव हमारा पाथेय रहेगा।

*पुरु शर्मा 

(लेखक युवा साहित्यकार हैं और समसामयिक विषयों पर निरंतर लिखते रहते हैं।)

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