GenZ : विवेकानंदीय चेतना का आधुनिक विस्तार

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भारत की आत्मा समय के साथ बदलती नहीं, बल्कि समय के साथ स्वयं को नए रूप में प्रकट करती है। जिस चेतना ने वैदिक युग में ऋषियों को दिशा दी, मध्यकाल में आचार्यों को मार्ग दिखाया और स्वतंत्रता आंदोलन में युवाओं को नेतृत्व सौंपा,वही चेतना आज Gen Z के रूप में आधुनिक अभिव्यक्ति पा रही है। भारत की यात्रा सदियों से युवा चेतना के कंधों पर आगे बढ़ती रही है। जब भी इस राष्ट्र ने स्वयं को संकट में पाया, तब किसी न किसी रूप में उसकी युवा शक्ति ने उसे दिशा दी, दृष्टि दी और दृढ़ता दी। इसलिए युवा केवल आयु का चरण नहीं, बल्कि ऊर्जा, उत्साह और उत्तरदायित्व का वह संगम है जहाँ से राष्ट्र का वर्तमान संवरता है और भविष्य सृजित होता है। देश की यह युवा पीढ़ी केवल आयु का वर्ग नहीं, बल्कि विचार, विवेक और विकल्पों की पीढ़ी है।

आज जब भारत विश्व का सबसे युवा देश है और Gen Z जैसी सजग, सवाल करने वाली, संवेदनशील पीढ़ी हमारे सामने है,तब राष्ट्र निर्माण की यह प्रक्रिया और भी अधिक सुदृढ़, सशक्त और सार्थक बन जाती है। और आज युवा देश के रूप में यह स्थिति अपने आप में एक अवसर भी है और एक अपेक्षा भी। Gen Z—जो तकनीक में जन्मी, परिवर्तन में पली और चेतना के साथ खड़ी हुई है उसके सामने केवल संभावनाएँ नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व भी हैं। यह पीढ़ी सवाल करती है, समाधान खोजती है और संघर्ष से पीछे नहीं हटती। यही उसका स्वभाव है और यही उसकी शक्ति भी। जब यह शक्ति सुदृढ़ विचारों, सशक्त मूल्यों और संवेदनशील दृष्टि से जुड़ती है, तब राष्ट्र निर्माण एक सतत और सार्थक प्रक्रिया बन जाता है।

सनातन परंपरा में युवा को कभी केवल शारीरिक सामर्थ्य से नहीं आँका गया। यहाँ युवा वह है जिसमें कर्म करने की क्षमता हो,धर्म समझने का विवेक हो और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का बोध हो। आदि शंकराचार्य ने युवावस्था को वैराग्य का प्रवेशद्वार बताया—पर यह वैराग्य पलायन नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण कर्म का आधार है। उनके लिए युवा वही था जो मोह और भ्रम से ऊपर उठकर सत्य को पहचान सके और लोककल्याण की दिशा में आगे बढ़े। आज की Gen Z जब आत्मचिंतन, मानसिक संतुलन और उद्देश्यपूर्ण जीवन की बात करती है, तो वह अनजाने ही इसी सनातन दृष्टि का आधुनिक स्वर गढ़ रही होती है।

स्वामी विवेकानंद ने युवा को राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी कहा था। उनके लिए युवा वह था जो निर्भीक हो, निष्ठावान हो और जिसकी नियत राष्ट्र के प्रति स्पष्ट हो। विवेकानंद का युवा अपने जीवन को केवल निजी सफलता के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित करता है। विवेकानंद का युवा व्यवस्था से भागता नहीं, बल्कि उसे बेहतर बनाने के लिए स्वयं को तपाता है। उनका प्रसिद्ध उद्घोष “उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत” केवल व्यक्तिगत उन्नति का सूत्र नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नवचेतना का मंत्र है। आज की Gen Z जब परिवर्तन, प्रयोग और प्रश्न की भाषा बोलती है, तो वास्तव में वह उसी विवेकानंदीय चेतना का आधुनिक विस्तार है।

अटल बिहारी वाजपेयी ने युवाओं को “राष्ट्र का भविष्य” नहीं, बल्कि “राष्ट्र का वर्तमान” कहा था। उनकी दृष्टि में युवा वह शक्ति था जो नीति भी गढ़ता है, नियति भी तय करता है और नेतृत्व भी करता है। अटल जी का युवा आशावादी था, पर आँख मूँदकर आशा करने वाला नहीं; आलोचनात्मक था, पर नकारात्मक नहीं। आज की Gen Z में यह संतुलन स्पष्ट दिखाई देता है—जहाँ वह व्यवस्था से संवाद भी करती है और जिम्मेदारी के साथ सहभागिता भी निभाती है।

यह कहना अधूरा होगा कि Gen Z केवल तकनीकी में पला बढ़ा है। स्क्रीन उसका माध्यम है, सोशल मीडिया उसकी अभिव्यक्ति और डिजिटल स्पेस उसका संसार है। और यह मान लेना कि वह केवल आभासी दुनिया में जीता है। जब कि वास्तव में यह पीढ़ी सुदृढ़ सोच रखती है, सशक्त अभिव्यक्ति करती है और संवेदनशील समाज की आकांक्षा रखती है। वह पर्यावरण संरक्षण की चिंता करती है, समानता और समावेशन की बात करती है और भारत की वैश्विक भूमिका को लेकर सजग है। यह वही युवा है जो मतदान करता है, स्वयंसेवा करता है, सामाजिक अभियानों से जुड़ता है और आपदा के समय सबसे पहले आगे आता है। यह ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर बढ़ती हुई चेतना है। और जब यही संवेदनशीलता सही दिशा पाती है तो राष्ट्र निर्माण का सबसे मजबूत आधार बनती है।

राष्ट्र निर्माण केवल नीतियों से नहीं होता, बल्कि नीति, नियत और नेतृत्व की त्रिवेणी से होता है। सरकार दिशा देती है, संरचना बनाती है और अवसर उपलब्ध कराती है; वहीं युवा उन अवसरों को कर्म में बदलता है। आज जब स्टार्टअप, स्किल डेवलपमेंट, आत्मनिर्भर भारत और डिजिटल इंडिया जैसे अभियानों के माध्यम से युवाओं को मंच मिल रहा है, तब Gen Z भी उस मंच पर उत्तरदायित्व के साथ आगे बढ़ रही है। यह संघर्ष की नहीं, सहयोग की कहानी है। और शिक्षा इस पूरी प्रक्रिया का मूल आधार है। लेकिन शिक्षा यदि केवल डिग्री तक सीमित रह जाए, तो वह राष्ट्र निर्माण की भूमिका निभाने में असफल हो जाती है। आज की शिक्षा नीति जब भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान को साथ जोड़ने का प्रयास कर रही है, तब युवा भी इस समन्वय को आत्मसात कर रहा है। क्योंकि जब शिक्षा संस्कार से जुड़ती है, तब युवा शक्ति केवल रोजगार खोजने वाली नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र को दिशा देने वाली बनती है। आज शिक्षा केवल रोजगार पाने का साधन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का माध्यम बन रही है। यही कारण है कि आज का युवा उद्यमशील और अनुसंधानशील होने के साथ-साथ सामाजिक रूप से उत्तरदायी भी है।

आत्मनिर्भर भारत का सपना भी युवा शक्ति के बिना अधूरा है। आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नहीं,बल्कि वैचारिक और नैतिक भी होनी चाहिए। आज के समय में Gen Z को यह समझना होगा कि राष्ट्र उसका केवल मंच नहीं, बल्कि उसकी पहचान का आधार है। राष्ट्र उससे केवल वोट नहीं, बल्कि विज़न की अपेक्षा रखता है। जब युवा उपभोक्ता से निर्माता, अनुयायी से नेतृत्वकर्ता और दर्शक से सहभागी बनता है, तभी राष्ट्र आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ता है।

भारत की विविधता उसकी शक्ति है और आज के युवा को इस विविधता का संवाहक बनना होगा। संविधान और संस्कृति; ये दोनों राष्ट्र की दो आँखें हैं। Gen Z इन दोनों के संतुलन को समझ रही है। वह संवैधानिक मूल्यों का सम्मान भी करती है और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव भी रखती है। यह संतुलन उसे न तो अंधपरंपरावादी बनाता है, न ही मूल्यहीन आधुनिक। यही संतुलन राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी शर्त है। भाषा, जाति, पंथ और क्षेत्र से ऊपर उठकर संविधान और संस्कृति दोनों का सम्मान करना ही सच्चा राष्ट्रबोध है। असहमति को मर्यादा में रखकर संवाद करना, और अधिकारों के साथ कर्तव्यों को निभाना; यही देश के युवा पीढ़ी की सबसे बड़ी परीक्षा भी है और पहचान भी।

आज डिजिटल युग में देशभक्ति का स्वरूप बदला है, पर उसका भाव नहीं। आज राष्ट्र सेवा केवल सीमा पर नहीं, बल्कि सूचना की शुद्धता, संवाद की जिम्मेदारी और सकारात्मक विमर्श में भी निहित है। Gen Z यदि सोशल मीडिया को केवल प्रतिक्रिया का माध्यम नहीं, बल्कि रचनात्मक राष्ट्रकथा का मंच बनाए, तो यह डिजिटल भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

अंततः राष्ट्र निर्माण कोई एक पीढ़ी का एकल प्रयास नहीं, बल्कि पीढ़ियों का सामूहिक यज्ञ है। सरकार उसकी वेदी है, नीति उसकी आहुति है और युवा उसका अग्नि तत्व। आज की Gen Z इस यज्ञ की सक्रिय सहभागी है।

युवा जो विवेकानंद की चेतना और शंकराचार्य के विवेक की दूरदृष्टि को अपने भीतर समाहित करता है। जब युवा अपने सपनों को संकल्प में, संघर्ष को साधना में और संवेदना को सेवा में बदल देता है, तब राष्ट्र केवल आगे नहीं बढ़ता, बल्कि ऊँचा उठता है।

आज का भारत उसी युवा की प्रतीक्षा में है जो सुदृढ़ विचारों से राष्ट्र को मजबूती दे, सशक्त कर्म से राष्ट्र की उन्नति को गति दे और संवेदनशील हृदय से वसुधैव कुटुंबकम् के भाव को सिद्ध करे। क्योंकि सनातन दृष्टि में राष्ट्र कोई भूखंड नहीं, बल्कि जीवंत चेतना है। और उस चेतना का सबसे उज्ज्वल, ऊर्जावान और आशावान स्वर युवा ही है।

*देवेश शर्मा
(लेखक युवा गतिविधियों के लिए राष्ट्रीय युवा पुरस्कार (National youth Award,भारत सरकार) द्वारा सम्मान प्राप्त हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत हैं)

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