“देयर आर नो फुल स्टॉप इन इंडिया” यह मशहूर पंक्ति लिखने वाले, भारत की धड़कनों को बीबीसी के माध्यम से दुनिया तक पहुँचाने वाले और करोड़ों भारतीयों के लिए विश्वसनीयता का दूसरा नाम बन चुके सर मार्क टली अब हमारे बीच नहीं रहे। 25 जनवरी 2026, रविवार को 90 वर्ष की आयु में उनका नई दिल्ली में निधन हो गया। उनका जाना सिर्फ एक पत्रकार का जाना नहीं है, बल्कि एक ऐसे युग का अंत है जब रेडियो की खरखराहट के बीच उनकी आवाज, “हलो, मैं मार्क टली बोल रहा हूँ…” किसी भी खबर की सत्यता का अंतिम प्रमाण मानी जाती थी।
24 अक्टूबर 1935 को कलकत्ता के टॉलीगंज में एक संपन्न ब्रिटिश व्यापारी परिवार में जन्मे मार्क का शुरुआती बचपन भारत से ‘कटा’ हुआ था। मार्क टली अक्सर बताया करते थे कि बचपन में उनकी एक सख्त यूरोपीय नैनी (आया) थीं, जिनका एकमात्र काम यह सुनिश्चित करना था कि मार्क और उनके भाई-बहन ‘नेटिव’ (स्थानीय) भारतीयों के साथ न घुलें-मिलें और हिंदी न बोलें। वे भारत में तो थे, लेकिन ब्रितानी पिंजरे में कैद थे। 9 साल की उम्र में उन्हें इंग्लैंड भेज दिया गया, लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही लिखा था। जिस भारत से उन्हें उनकी नैनी ने दूर रखा था, वही भारत उनकी आत्मा का सुकून बनने वाला था।
युवा मार्क पत्रकार नहीं, बल्कि पादरी बनना चाहते थे। उन्होंने कैम्ब्रिज से धर्मशास्त्र की पढ़ाई की और चर्च ऑफ इंग्लैंड में पादरी बनने का विचार किया। लेकिन चर्च के अधिकारियों ने कहा कि वे “पादरी बनने के योग्य नहीं हैं”।
शायद नियति को मंजूर नहीं था कि वे धर्मोपदेशक बनें। 1964 में वे बीबीसी से जुड़े, और 1965 में भारत लौटे,जहां खबरों की दुनिया उनकी प्रतीक्षा कर रही थी।
1970 और 80 के दशक में, जब सरकारी मीडिया (दूरदर्शन और आकाशवाणी) पर सेंसरशिप या सरकारी नियंत्रण का साया होता था, तब भारत के गाँव-गाँव में लोग बीबीसी हिंदी से गूंजती मार्क टली की आवाज पर भरोसा करते थे।
1971 का बांग्लादेश मुक्ति संग्राम हो, 1984 का ऑपरेशन ब्लू स्टार, या इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या—हर बड़ी घटना पर मार्क टली की रिपोर्टिंग ने इतिहास लिखा। आपातकाल (1975) के दौरान उन्हें भारत से निष्कासित कर दिया गया था,लेकिन वे हारे नहीं। जैसे ही आपातकाल हटा, वे वापस लौटे,और भी अधिक मजबूती के साथ। अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान उन्हें भीड़ के गुस्से का भी सामना करना पड़ा, लेकिन वे अपनी जगह पर डटे रहे।
मार्क टली सिर्फ एक विदेशी संवाददाता नहीं थे। वे भारत को पश्चिमी चश्मे से देखने के बजाय, भारतीय नजरिए से समझने वाले इंसान थे। उनकी किताबें, जैसे ‘नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया’ और ‘इंडिया इन स्लो मोशन’, इस बात का गवाह हैं कि वे भारत की अराजकता में भी एक लय और खूबसूरती देखते थे। उन्होंने पश्चिमी दुनिया को समझाया कि भारत को सिर्फ गरीबी या सपेरों के देश के रूप में नहीं, बल्कि एक जटिल और जीवंत लोकतंत्र के रूप में देखा जाना चाहिए।
अपने जीवन के उत्तरार्ध में, 1994 में बीबीसी से इस्तीफा देने के बाद, उन्होंने लंदन लौटने के बजाय दिल्ली के निजामुद्दीन ईस्ट में रहना पसंद किया। वे अक्सर कुर्ता-पाजामा पहने,अपनी पार्टनर जिलियन राइट के साथ भारत के इतिहास और संस्कृति को खंगालते नजर आते थे। उन्हें 1992 में पद्म श्री और 2005 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया,जो किसी विदेशी पत्रकार के लिए दुर्लभ सम्मान था। 2002 में ब्रिटेन ने उन्हें ‘सर’ (नाइटहुड) की उपाधि दी।
मार्क टली का जीवन इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रीयता जन्म से नहीं, बल्कि प्रेम और कर्म से तय होती है। उनका शरीर भले ही एक अंग्रेज का था, लेकिन उनका दिल, जैसा कि वे खुद कहते थे, “पूरी तरह हिंदुस्तानी” था। आज जब वे अनंत यात्रा पर निकल गए हैं, तो उनके पीछे अनगिनत कहानियां, बेबाक पत्रकारिता के मानक और वह भरोसा छूट गया है जो कहता था—”अगर टली साहब ने कहा है, तो सच ही होगा।”
भारतीय पत्रकारिता और भारत-प्रेम के इस पुरोधा को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।

*राजकुमार जैन
(स्वतंत्र लेखक )

