वर्ष १९२३ में गोरखपुर के गीता प्रेस ने सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथों- ‘गीता’ और ‘रामचरितमानस’ तथा अन्यान्य धार्मिक-आध्यात्मिक ग्रंथों की पचास करोड़ से अधिक प्रतियाँ प्रकाशित की हैं। ये ग्रंथ भारत के कोने-कोने में करोड़ों घर-परिवारों में श्रद्धाभाव के साथ पढ़े जाते हैं, सहेजे जाते हैं। गीता प्रेस कई भाषाओं में धार्मिक ग्रंथों का प्रकाशन करता है। प्रकाशन के इस विपुल परिमाण के साथ ही श्लाघनीय तथ्य यह कि प्रकाशन-विक्रय-वितरण का कार्य व्यावसायिक भावना से सर्वथा परे है। ग्रंथों का मूल्य इतना कम होता है कि सामान्य आर्थिक स्थिति वाला पाठक भी खरीद सकता है। धार्मिक आस्था के साथ-साथ अल्प मूल्य होने से श्रद्धालु जनों तक ग्रंथों की पहुँच सुलभ हो सकी है।
अगस्त, १९२६ में सत्संग भवन, मुंबई ने मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ का प्रकाशन आरंभ किया। दूसरे वर्ष से गीता प्रेस ने मुद्रण-प्रकाशन का दायित्व सँभाल लिया। भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार ने संपादन का दायित्व ग्रहण किया। ‘कल्याण’ के भवितव्य का पथ-प्रदर्शन करते हुए महात्मा गांधी ने सीख दी थी- “ कल्याण में दो नियमों का पालन करना- बाहरी कोई विज्ञापन नहीं देना है तथा पुस्तकों की समालोचना नहीं करनी है।” विज्ञापन न छपने के संबंध में उन्होंने समझाया था कि “ तुम अपनी जान में पहले-पहले देखकर विज्ञापन लोगे कि वह किसी ऐसी चीज का न हो, जो भद्दी हो और जिसमें जनता को धोखा देकर ठगने की बात हो। पर तुम्हारे पास विज्ञापन आने लगेंगे और लोग उनके लिए अधिक पैसे देने लगेंगे तो तुम चाहे विरोध करोगे, पर तुम्हारे साथी व्यवस्थापक लोग कहेंगे कि “ देखिए इतना पैसा आता है, क्यों न यह विज्ञापन स्वीकार कर लिया जाए? बस, पैसे का प्रलोभन आया कि फिर जनता के लाभ-हानि की बात एक ओर रह जाएगी। अतएव आरंभ से ही यह नियम बना लो कि किसी भी दर से बाहरी विज्ञापन नहीं लेना है।” समालोचना के संबंध में उन्होंने आगाह किया था कि “ जो लोग समालोचना के लिए अपनी पुस्तकें तुम्हारे पास भेजेंगे, उनमें से अधिकांश इसलिए भेजेंगे कि तुम्हारे पत्र में उनके ग्रंथ की प्रशंसा निकले। यथार्थ समालोचना कराने के लिए अपनी पुस्तक भेजें, ऐसे बहुत कम लोग होते हैं। ऐसी स्थिति में पुस्तकें चाहे जैसी हों, या तो उनकी झूठी प्रशंसा करनी होगी या उन साहित्यकारों, लेखकों से झगड़ा मोल लेना पड़ेगा।” ‘कल्याण’ आज भी इसी नीति पर चल रहा है। ‘कल्याण’ के प्रवेशांक (अगस्त, १९२६) में “ भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और धर्म संबंधी मासिक पत्र” की उद्घोषणा अंकित की गई। महात्मा गांधी का लेख ‘स्वाभाविक किसे कहेंगे? प्रकाशित किया गया। इस लेख में गांधी जी लिखते हैं, “ इस हिंसामय संसार में मनुष्य का धर्म अहिंसा है और जितने अंशों में वह अहिंसक है उतने ही अंशों में वह अपनी जाति को शोभा दे सकता है। वे कहते हैं, “ अहिंसा का पालन बड़े उच्च प्रकार की वीरता का लक्षण है। अहिंसा में भीरुता के लिए कहीं भी स्थान नहीं हो सकता है।”
इससे समझा जा सकता है कि पोद्दार जी और ‘कल्याण’ के लिए महात्मा गांधी और उनकी सीख का कितना महत्व था। कल्याण में महात्मा गांधी, श्री अरविंद और श्रीमाँ, मदनमोहन मालवीय, सी. राजगोपालचारी, डा. राधाकृष्णन, आचार्य विनोबा भावे, करपात्री महाराज प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, बाबा राघवदास प्रभृति अध्यात्म के विज्ञजनों के लेख समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर, आचार्य नरेन्द्रदेव, डा. पट्टाभि सीतारामय्या, के.एम. मुनशी, डा. राजेन्द्र प्रसाद, संपूर्णानंद, पुरुषोत्तमदास टंडन, काका कालेलकर, डा. रघुवीर, राधाकुमुद मुखर्जी, शिशिर कुमार घोष, क्षितिमोहन सेन, अमरनाथ झा सदृश अपने समय की सर्वमान्य विभूतियों के लेख प्रकाशित हुए हैं। यह तालिका भारतीय समाज के बौद्धिक जगत में ‘कल्याण’ की स्वीकार्यता और महत्व की परिचायक है।
गीता प्रेस की शताब्दी का आयोजन १९२३ में व्यापक पैमाने पर किया गया। स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गीता प्रेस गोरखपुर गए। गीता प्रेस के ज्ञानयज्ञ को सम्मान देते हुए प्रधानमंत्री ने १०० रुपये का स्मारक सिक्का और विशेष डाक टिकट जारी किया। प्रधानमंत्री ने भारतीय जनजीवन में और विशेष रूप से सनातन धर्मावलंबियों के लिए गीता प्रेस के महनीय अवदान को रेखांकित किया। गोयन्दका जी और भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार के कालजयी अवदान का स्मरण किया। देशभर में अनेक संस्थाओं ने कार्यक्रम आयोजित कर कृतज्ञता ज्ञापित की।
ज्ञातव्य है कि जब भारत सरकार ने समाज के लिए अतिविशिष्ट अवदान करने वाली विभूतियों को भारत रत्न और पद्म अलंकरण से विभूषित करने का संकल्प लिया, तब तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद की पहल पर गृह मंत्री गोविंद वल्लभ पंत पोद्दार जी के पास यह अनुरोध लेकर पहुँचे कि भाईजी ‘भारत रत्न’ अलंकरण स्वीकार कर लें। परंतु सेवाव्रती भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार ने व्यक्ति पूजा को अमान्य करने के महत् सिद्धांत के अनुपालन में विनम्रतापूर्वक प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।
१९ जून, २०२३ को भारत सरकार ने गीता प्रेस को ‘गांधी शान्ति पुरस्कार’ से सम्मानित करने की घोषणा की। शताब्दी वर्ष में यह गीता प्रेस की यशस्वी सेवाओं का समुचित मूल्यांकन और सार्वजनिक स्वीकार है। गीता प्रेस ने सम्मान तो स्वीकार कर लिया। परंतु सम्मान की राशि- एक करोड़ रुपये लेने से मना कर दिया। क्योंकि गीता प्रेस की परंपरा बाहर से कोई अनुदान अथवा पुरस्कार ग्रहण करने की नहीं है। कम लागत के कारण गीता प्रेस पर जो आर्थिक बोझ आता है, उसकी प्रतिपूर्ति के लिए भी गोयन्दका जी ने अपने उद्यम से व्यवस्था कर रखी है।
‘कल्याण’ की प्रकाशन यात्रा १००वाँ वर्ष पूर्ण कर रही है। भारतीय सनातन परंपरा में सौहार्द, सामंजस्य, सह-अस्तित्व, शालीनता के जितने भी उच्च जीवन मूल्यों का समावेश है, ‘कल्याण’ में प्रकाशित होने वाली रचनाएँ उनका प्रतिपादन करती हैं। आध्यात्मिक सोच और धार्मिक आस्था को संबल प्रदान करती हैं। उनमें नकारात्मकता का अंश नहीं होता। धार्मिक संकीर्णता अथवा धर्म का अतिरेकी प्रचार कल्याण के पृष्ठों में कभी नहीं झलका। अक्षरों का चयन आरंभ से ही यह ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है कि वृद्धजन भी सरलता से पढ़ सकें। एक अनुकरणीय परंपरा ‘कल्याण’ ने अपनाई है कि अंक में यदि कोई अशुद्धि छप जाती है तब उसी अंक में शुद्धि पत्र भी लगा दिया जाता है। किसी अन्य पत्रिका में यह सजगता देखने में नहीं मिलती। इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि ‘कल्याण’ हर माह निश्चित तिथि पर प्रकाशित हो और ग्राहकों को भेज दिया जाए। प्रत्येक वर्ष कल्याण का वार्षिकांक संग्रहणीय ग्रंथ के रूप में प्रकाशित किया जाता है। ऐसे विशेषांकों में श्रीरामायणांक, श्रीकृष्णांक, श्रीशिवांक, शक्तिअंक, योगांक, वेदांतअंक, गीता तत्वांक, संत अंक, भागवतांक, महाभारतांक, वाल्मीकि रामायणांक, गौअंक, नारीअंक, उपनिषदअंक, हिन्दु संस्कृतिअंक, भक्तचरितांक, संतवाणी, सत्कथांक, तीर्थांक, मानवताअंक, श्रीविष्णुअंक, श्रीगणेशअंक, सदाचारअंक, सूर्यअंक, चरित्रनिर्माणअंक, नीतिसारअंक, संस्कारअंक और पुराण आदि उल्लेखनीय हैं। हजारों परिवारों ने ये विशेषांक दशकों से संभालकर रखे हैं।
गीता प्रेस गोरखपुर और भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार का एक बड़ा अवदान यह है कि अनेक प्रकाशनों से प्रकाशित हुई गोस्वामी तुलसीदासकृत ‘रामचरितमानस’ का मानकीकरण कराया। देवी-देवताओं के अनेक रूपों में प्रचलित चित्रों का भी मानकीकरण कराया गया। अब इन्हीं प्रारूपों का प्रचलन सनातन समाज में है। ‘कल्याण’ हिन्दी की ऐसी प्रथम पत्रिका है जिसकी प्रसार संख्या एक लाख के पार पहुँची। बाद में यह दो लाख से भी अधिक हो गई।

*विजयदत्त श्रीधर
(वरिष्ठ पत्रकार और पत्रकारिता इतिहास के गहन अध्येता)

