पाकिस्तान का सिंध क्षेत्र कभी भारत का हिस्सा रहा है। राजनीतिक लकीरें भले ही खींच ली गई हैं, लेकिन सांस्कृतिक रूप से आज भी एक है। सिंध क्षेत्र और इस क्षेत्र में बहने वाली सिंधु नदी के तट पर ही विश्व की महान सभ्यता, संस्कृति ने जन्म लिया।
अनेक सदियाँ बीत जाने के बाद भी प्रेम मोहब्बत से भीगी कथाओं की अनुगूंज आज भी लोक संगीत, लोक साहित्य में सुनाई पड़ती है। हर व्यक्ति सुनकर, पढ़कर भाव विभोर हो जाता है। इन प्रेम कथाओं में सोहनी-महिवाल, सस्सुई-पुन्नु, मूमल-राणो, नूरी-जाम तमाची, उमर-मारवी, लीला-चनेसर, कंवल-केहर आदि प्रमुख रूप से हैं।
इसी क्षेत्र में सूफ़ी संत और कवियों में शाह लतीफ, सचल सरमस्त, शाह अब्दुल लतीफ भिट्टाई, मुराद अली शाह, कुतुब शहजोर ने प्रेम, मोहब्बत, इन्सानियत का संदेश दिया।
इसी क्षेत्र में अजरख हस्तशिल्प कला का जन्म हुआ, जो कलाकार के ख्वाबों को पंख देती हुई नजर आती है।
सांस्कृतिक विरासत और भावनात्मक अनुभव से जनित इस अमूर्त कला में एक समृद्ध परंपरा, कौशल और भावनायें सम्मिलित हैं। इसके अनोखे डिजाइन,रंग और पैटर्न सिंध-हिंद की पहचान और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

अजरक प्रिंट में पक्षी,फूल,पेड़ और ज्यामितीय आकृतियों का प्रयोग किया जाता है जो प्रेमिल भावनाओं के प्रकटीकरण,प्रेम की गहराई, भावनाओं की सरलता और जटिलता के साथ-साथ सूफी दर्शन के संदेशों को प्रकट करते हैं।
अजरख में प्रयुक्त रंग मानवीय भावनाओं को प्रकट करते हैं। गहरा लाल रंग प्रेम, नीला और सफेद शांति, काला रंग प्रतिबद्धता, हरा रंग प्रकृति और पीला रंग आशा और पवित्रता को प्रदर्शित करते हैं।
यही छह रंग अजरख की पहचान हैं।
प्राकृतिक वनस्पति और लवण का उपयोग रंग तैयार करने में किया जाता है। परम्परागत डिजाइनों में गेनी,खारक, लोंग, हांसा,ढीबरी, तारा, फूलडी,चेतन चौकड़ी, कटार आदि प्रमुख हैं। प्रिंट के लिए इस्तेमाल किए जा रहे ब्लॉक शीशम की लकड़ी से तैयार होते हैं जिसे भांत कहते है। भांत को बनाने वाले भांतकड़ा कहलाते हैं। भारत और सिंध में मुस्लिम छीपा/ खत्री, हिंदू खत्री इस कला को सहेजे हुए हैं।
गुजरात में कच्छ के धामडका, अजरकपुर और डीसा, राजस्थान में बाड़मेर, बालोतरा सिंध पाकिस्तान में खैरपुर, डेरकी, दावावाडा, खानपुर, हाला, मिठयाडी, पिथौरा, अमर कोट, धोरा नारा, दूंद आलिया, दूंद आदम, सैयद का गांव, सांगड मलीर, मीठी, खांडीयारी, मोलारिया, नबीसर, मीरपुर खास, थट्टा, हाबीलो, बधार,भिट शाह केवल खत्री समुदाय के गांव नहीं ,वरन अजरख कला के भी घर हैं।
अजरख को अरबी शब्द बताया जाता है,जिसका अर्थ है नीला। संस्कृत में इसी शब्द को फीका न पड़ने वाला रंग बताते हैं। विशुद्ध अजरक हस्तशिल्प प्रिंट कपड़े के दोनों तरफ किया जाता है,जिसे बेपुरी भी कहते हैं। जितना धोया जाएगा उतने रंग निखरते जाएंगे। अजरख का प्रिंट सच्चे प्रेम की तरह कभी फीका नहीं पड़ता।
सिंध इंडिगो और कॉटन का निर्यातक क्षेत्र रहा है, इसलिए भी इस कला को संबल मिला। परम्परागत रूप से अजरख प्रिंट के साफे, कमर और कंधा बंद, चादर, शॉल, दुपट्टा ही तैयार किए जाते थे। वर्तमान में बाजार मांग के अनुसार स्कार्फ, साड़ी, ड्रेस, सलवार सूट, होम डेकोर के आइटम तैयार होने लगे हैं।
कॉटन के साथ सिल्क कपड़े पर भी काम होता है। हिंगलाज माता को अजरक सृजन और संरक्षण की देवी माना जाता है। ग्रीक मायथोलोजी में हेरा-एथेना को हस्तशिल्प के संरक्षक की देवी मानते हैं। हिंगलाज माता को सुमेरियन देवी से जोड़कर देखा जाता है। हिंगलाज माता का मंदिर पाकिस्तान के बलुचिस्तान के लासबेला जिले में स्थित है। यह देवी राजपूत, चारण, खत्री एवं अन्य समुदाय की कुलदेवी भी है। मुस्लिम नानी बाई या लाल चोगे वाली माँ कहते हैं।

ऐसा मान्यता हैं कि खत्री समुदाय कपड़े का बीटा देवी के आगे रख देता था,और छह महीने बाद कपड़े पर स्वतः रंग और प्रिंट आ जाते थे। एक महिला द्वारा कम समय में रंगाई छपाई के लिए आग्रह करने पर देवी ने खत्री समुदाय को रंगाई छपाई की विधा सीखा दी। तबसे यह समुदाय अजरख हस्तशिल्प को अपनाए हुए है।
अजरख तैयार करने में पहले छह महीने लगते थे। एक अजरक को तैयार करने में 23 चरणों से गुजरना पड़ता था, लेकिन अब 8-14 चरण में पूरा कर देते हैं। और लगभग दो सप्ताह में वस्त्र तैयार हो जाता है।
अब अजरख कला भी बंजारोन्मुखी होती जा रही है। परम्परागत अजरख स्क्रीन में तब्दील हो गई है। श्रम, लागत को घटाने के जतन हुए हैं। बीस काउंट की जगह साठ काउंट का कपड़ा, ऑर्गेनिक की जगह सिंथेटिक रंगों का उपयोग हो रहा है। लुंगी, ओढ़ना, चादर की जगह होम डेकोर, ड्रेस मेटेरियल, साड़ी ने ले ली है। अजरख का प्राकृतिक रंगों से दूर होते जाने से एक विशुद्ध हस्तकला विलुप्त होती जा रही है। सूती कपड़े के साथ-साथ अब मोडाल सिल्क, टसर सिल्क, मूंगा सिल्क, चंदेरी सिल्क,महेश्वरी सिल्क पर भी अजरख प्रिंट की छपाई होने लगी है।
बाड़मेर के कुछ अजरक कलाकार इस कला के मूल स्वरूप को बचाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। इन प्रयासों को यदि सरकारी,गैर सरकारी संस्थाओं और पुरातन कलाओं के प्रशंसकों का सहयोग मिले, तो कुछ बात बन सकती है।
अजरख महज कला, रंग, कपड़ा,डिजाइन भर नहीं है, यह हिंद-सिंध की आपसदारी का प्रतीक भी है।
विशुद्ध अजरख के रंग अपने स्वभाव के अनुसार कभी फीके नहीं पड़ते। अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि अजरख के कलाकारों के जीवन का रंग भी फीका न पड़े।
अजरख लेडी सुखीदेवी खत्री

कुछ ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने परंपरागत अजरख हस्तकला के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए विशेष प्रयास किए हैं। पश्चिमी राजस्थान के बालोतरा जिले के पादरू गांव की रहने वाली 82 वर्ष की सुखी देवी उनमें से एक हैं। सुखी देवी 16 वर्ष की उम्र से इस पारंपरिक हस्तकला के लिए काम कर रही हैं। अजरख वस्त्र तैयार करने के लिए मसाले तैयार करना,घाणा,बोडाबा, खातर तैयार करना,कसना, भांतरना देना,किरना, कट,किरची से लेकर वस्त्रों की धुलाई और सुखाई तक के कामों में वह सिद्धहस्त हैं।
अजरख लेडी के नाम से प्रसिद्ध सुखी देवी आज भी सक्रिय हैं; साथ ही नई पीढ़ी को इस पारंपरिक हस्तकला का प्रशिक्षण भी प्रदान कर रही हैं। उनके शिष्य न केवल इस परंपरागत कला को संरक्षित कर रहे हैं,अपितु नवाचारों के माध्यम से इसे आगे भी बढ़ा रहे हैं।

*डॉ भुवनेश जैन
(लेखक,मेरा युवा भारत(भारत सरकार) के पूर्व निदेशक हैं,और राजस्थानी लोक संस्कृति के दस्तावेजीकरण के लिए विगत कई वर्षों से कार्य कर रहे हैं।)

