संवत् प्रवर्तक : सम्राट विक्रमादित्य

5 Min Read

अद्वितीय महानायक सम्राट विक्रमादित्य और उनके द्वारा प्रवर्तित विक्रम संवत् लंबे समय से इतिहासकारों एवं शोधकर्ताओं के बीच गवेषणा का विषय रहा है। इतिहासकार इस बात पर तो सहमत हैं कि ‘विक्रमादित्य’ नामधारी सम्राट द्वारा विक्रम संवत् प्रारंभ किया गया था,लेकिन इसके साथ यह भी जोड़ देते हैं कि ‘विक्रमादित्य’ दरअसल एक उपाधि रही है,जिसे समय-समय पर अनेक राजाओं ने धारण किया था। अब कौन से राजा ने सबसे पहले विक्रमादित्य का विरुद धारण किया था,और कौनसा विक्रमादित्य विक्रम संवत् का प्रवर्तक है, यह विषय लंबे समय तक बहस-मुबाहिसों का हिस्सा बना रहा है। बहुत कुछ धुंध छंट चुकी है,फिर भी विक्रम संवत् प्रवर्तक सम्राट विक्रमादित्य की ऐतिहासिकता पर कुछ विद्वान प्रश्नचिन्ह लगाते रहते हैं।
इतिहासकारों के मतमतांतर और तर्क-वितर्क कुछ भी धारणाएं स्थापित करते रहें,लोक में विक्रमादित्य से संबंधित आख्यानों की पैठ और सामाजिक-धार्मिक अनुष्ठानों में विक्रम संवत् की स्वीकार्यता विक्रमादित्य के समय से लेकर अब तक निर्बाध बनी हुई है। यह सातत्य सम्राट विक्रमादित्य और उनके द्वारा प्रवर्तित विक्रम संवत् की ऐतिहासिकता का सबसे पुख्ता प्रमाण है।
विक्रमादित्य की ऐतिहासिकता को लेकर जिस एक तथ्य पर अधिकांश इतिहासकार सहमत हैं, उसके अनुसार- ई.पू. पहली शताब्दी में उज्जयिनी के सिहांसन पर गर्दभिल्ल नामक राजा राज करता था। साहित्यिक ग्रन्थों एवं लोक कथाओं में गर्दभिल्ल के महेन्द्रादित्य,गंदर्भसेन आदि नामों का भी उल्लेख मिलता है।
शकों ने गर्दभिल्ल को पराजित कर उज्जयिनी पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया,लेकिन शक अधिक समय तक राज्य पर काबिज न रह सके।ईशा पूर्व 57 में गर्दभिल्ल के पुत्र विक्रमादित्य ने शकों को खदेड़कर उज्जयिनी पर पुनः अधिकार कर लिया।
आक्रांता शकों पर इस विजय के उपलक्ष्य में विक्रमादित्य ने “शकारि” की उपाधि धारण की और एक संवत् प्रारंभ किया जो “विक्रम संवत्” के नाम से प्रचलित हुआ।

विक्रमादित्य शूरवीर तो था ही,उसकी ख्याति “पित्रहीनों के पिता,बधुंहीनों के बंधु,अनाथों के नाथ एवं प्रजाजनों के सर्वस्व” के रूप में दिग-दिगंत में व्याप्त थी। अपने जीवनकाल में ही विक्रमादित्य का नाम एक आदर्श राजा का पर्याय बन चुका था। कालांतर में ‘विक्रमादित्य’ नाम एक विरुद के रूप में प्रतिष्ठित हुआ,जिसे परिवर्ती काल के अनेक राजाओं ने धारण किया।
यह भी उल्लेख मिलता है कि विदेशी आक्रांताओं पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में विक्रमादित्य ने अपने कोष के दरवाजे गरीबों-कर्जदारों के लिए खोल दिए थे,और समस्त प्रजा को ऋणमुक्ति का उपहार प्रदान किया था। ऐसी मान्यता है कि इसी समय उज्जैन में ऋणमुक्तेश्वर महादेव की स्थापना की गई थी।
विक्रमादित्य अतिशय परोपकारी था। परोपकार के लिए वह आत्मबलिदान तक के लिए तत्पर हो उठता था। इसी साहस के चलते वह ‘साहसांक’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

साहित्यिक कृतियों एवं लोक कथाओं में विक्रमादित्य को ज्ञान,साहस,पराक्रम और न्यायप्रियता की प्रतिमूर्ति बताते हुए उसकी तुलना प्रत्यक्ष देव सूर्य नारायण से की गई है। यह उक्ति प्रसिद्ध है-
ऊपर तो सूरज तपे,नीचे विकरमजीत।
धन धरती धन मालवो,धन राजा की रीत।।

विक्रमादित्य को लेकर प्रचलित लोक कथाओं का फलक अत्यंत व्यापक है। केवल मालवी में ही नहीं,बुंदेली लोक कथाओं में भी विक्रमादित्य एक लोकप्रिय महानायक के रूप में उपस्थित हैं। लोक कथाओं में विक्रमादित्य की प्रजावत्शलता और न्यायप्रियता का उल्लेख विशेष रूप से पाया जाता है। कुछ लोक कथाएं ऐसी भी प्रचलित हैं, जिनमें विक्रमादित्य को पशु-पक्षियों से उनकी ही बोली में बात करते हुए बताया गया है।

विक्रमादित्य के बारे में प्रसिद्ध है कि उसने काठ की तलवार से ही पृथ्वी जीत ली थी। इस किंवदंती का तात्पर्य यह है कि विक्रमादित्य की प्रबल धाक के चलते समस्त राजाओं ने बिना प्रतिरोध किए ही उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी। विक्रम के सिक्कों से उसके द्वारा किए गए अश्वमेध यज्ञ और चक्रवर्ती सम्राट होने की पुष्टि होती है।

भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक राजाओं के नाम दर्ज हैं,जिन्होंने राज्य विस्तार से लेकर शासन व्यवस्था के सुचारू संचालन तक के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कीं ; लेकिन उन सबके बीच में विक्रमादित्य का नाम एक अद्वितीय सम्राट के रूप में अलग ही नजर आता है।

विक्रमादित्य को जो प्रतिष्ठा अपने राज्यकाल के दौरान प्राप्त थी,वह परिवर्ती काल में भी उनके साथ जुड़ी रही। काल के प्रवाह के साथ उनकी यशगाथाओं के स्वर मद्धम नहीं पड़े हैं।
विक्रमादित्य के परिवर्ती शासक यदि अपने नाम के साथ विक्रमादित्य विरुद जोड़कर गौरव का अनुभव करते रहे हैं,तो आज राजत्व के आदर्श, विदेशी आक्रांताओं से भारत भूमि को मुक्ति दिलाने वाले महान देशभक्त और सनातन संस्कृति के प्रतीक पुरुष के रूप में विक्रमादित्य का नाम भारतीय जनमानस में रचा-बसा है।

*अरविन्द श्रीधर

इस पोस्ट को साझा करें:

WhatsApp
Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *