पीछे छूटते पर्वों की कौन सुने पुकार !

पुरु शर्मा By पुरु शर्मा
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भारतीय संस्कृति उत्सवधर्मी है जिसमें जीवन के प्रति उत्साह है, उल्लास है। हमारे पर्व और संस्कृति जीवन की उदासी को मिटाने और नई ऊर्जा से भरने की प्रेरणा देते हैं। सच कहा जाए तो हमारे पर्व हमें नींद से जगाते हैं और हमारी संस्कृति की दिव्यता, भव्यता से परिचित कराते हैं। इस संस्कृति को सदानीरा हमारे लोकपर्व, लोक उत्सव और लोक व्यवहार बनाते हैं जिनमें तरलता है, सम्मोहन है। किंतु आज हमारे त्योहारों का, लोक परंपराओं का रस रीत रहा है। फागुन का रंग अब फीका पड़ता जा रहा है। जो हुरियारे कभी इस ऋतु के उल्लास को आत्मसात करते थे, वे अब स्मृतियों में सिमट चुके हैं। वे शब्दों के रंगों से मनों में गुलनार घोल देने वाले लोकगायक, जो फागुन को अपने कंठों में धार लेते थे, अब कहीं खो गए हैं। आधुनिकता के शोर में वह मस्ती, वह बेफिक्री, वह रंगों की सहजता खोती जा रही है, जो कभी फागुन का प्राण हुआ करती थी।

होलाष्टक का आरंभ हो चुका है, लेकिन कोयल अब भी मौन है। फागुन की हवा बह रही है, मगर उसमें वह मदहोशी नहीं, जो पहले गली-मोहल्लों में गूंजती थी। लोकगीतों की मिठास, ढोल-मृदंग की थाप और हास-परिहास से सराबोर गालियाँ अब केवल किताबों और किस्सों में बची हैं। वे टोलियाँ, जो अपने शब्दों से मनों को रंग देती थीं, अब दिखाई नहीं देतीं। उन लोकगायकों की तानें, जिनकी ध्वनि में फागुन की मादकता बहती थी, अब मौन हैं।

हमारे लोकपर्व केवल अनुष्ठान नहीं हैं, वे हमारी संस्कृति की जीवंत धड़कन हैं। ऋतुओं के परिवर्तन के साथ ये पर्व हमारे मनोभावों को संवारते हैं, संबंधों को सींचते हैं और उल्लास को संजोते हैं। लेकिन आधुनिकता की तेज़ रफ्तार में अब वे धीरे-धीरे औपचारिकता बनते जा रहे हैं। वे पर्व, जो कभी पूरे समाज को एक सूत्र में बांधते थे, अब सीमित दायरे में सिमट रहे हैं।

हमारी परंपरा कभी स्थिर नहीं रही, वह गतिशील थी। लोकपर्वों की जीवंतता उनके प्रवाह में थी, ठहराव में नहीं। हर त्योहार केवल एक रस्म नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, हास्य-परिहास और मानवीय निकटता की भावना का प्रतीक था। होली का पर्व केवल रंगों का नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग को जोड़ने वाली आत्मीयता का पर्व था। इसमें ऋतु का उल्लास था, प्रकृति की छटा थी, और जीवन का सहज प्रवाह था।

रंगों में जीवन की सबसे सुंदर व्याख्या छिपी होती है। जब तक रंग हैं, तब तक जीवन में सजीवता है। लेकिन अब वह सहजता और उन्मुक्तता खो रही है। पहले जहाँ गलियों-मोहल्लों में फाग गूंजते थे, अब वहां केवल औपचारिक रंग खेला जाता है। होली का हास्य, लोकगीतों की मादकता और परंपरा की गहराई धीरे-धीरे धुंधला रही है।

आज पर्वों की आत्मा को बचाना कठिन हो गया है, क्योंकि बाज़ारवाद और कृत्रिम उत्सवधर्मिता ने इन्हें प्रभावित किया है। अब होली में गुलाल से अधिक केमिकल भरे रंग बिकते हैं। हँसी-ठिठोली की जगह दिखावे ने ले ली है। पहले समाज के हर वर्ग के लोग मिलकर होली खेलते थे, अब इसमें भी वर्ग भेद की खाई गहरी हो चुकी है।

त्योहारों का महत्व केवल परंपरा निभाने में नहीं, बल्कि उन्हें जीवन की ऊर्जा और संबंधों की आत्मीयता से जोड़ने में है। संस्कृति तभी जीवित रहती है जब उसमें समाज की चेतना स्पंदित होती है। पर्वों को केवल तिथियों में दर्ज करने से उनका संरक्षण नहीं होगा, उन्हें उसी भावना से जीना होगा, जो हमारे पूर्वजों ने संजोई थी। जब तक हमारे त्योहार केवल औपचारिकता बने रहेंगे, वे जीवंत नहीं रहेंगे। हमें इन्हें अपने जीवन का हिस्सा बनाना होगा, तभी ये परंपराएँ जीवित रहेंगी।
क्योंकि पर्व केवल अतीत की स्मृति नहीं, वे भविष्य की ऊर्जा भी हैं।

*पुरु शर्मा

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