भारत की राजनीति में 30 अप्रैल 2025 के पहले तक जाति जनगणना को लेकर अजीब सी उहापोह की स्थिति थी। किसी के लिए यह समाज को बांटने वाला कदम था तो कोई इसे सामाजिक न्याय के लिए जरूरी बता रहा था।
जो दल अतीत में जाति जनगणना को समाज के बंटने का खतरा मानते थे, वही कालांतर में जोर-शोर से इसके समर्थक हो गए, और जो दल पहले खम ठोककर इसका विरोध कर रहे थे, वह इसके पक्षधर बनकर इससे होने वाले फायदे गिनाने लगे।
आम जनता इस राजनीतिक उलटवासी को हतप्रभ होकर देखती रही है। वह और कर भी क्या सकती है? उसे ढाला ही ऐसे सांचे में गया है कि वह खुद की भलाई सोचने के मामले में भी राजनीतिक भाग्य विधाताओं पर निर्भर है। और जब भाग्य विधाताओं ने जाति जनगणना का निर्णय ले लिया है,तो इसमें सबका भला ही होगा।
आम जनता को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन, कब जाति जनगणना का पक्षधर रहा है और कौन विरोधी। उसे तो इस बात का संतोष है कि राजनीतिक दल किसी मुद्दे पर तो एकमत हुए।
बल्कि उसे तो राजनीतिक दलों को धन्यवाद देना चाहिए कि इस मुद्दे पर सहमति के चलते समाज के उस विभाजन का खतरा फिलहाल टल गया है,अतीत में राजनीतिक सुविधानुसार जिसका हौवा खड़ा किया जाता रहा है।
हर कोई जानता है कि जाति व्यवस्था भारत की सच्चाई है। भारतीय राजनीति का पूरा ताना-बाना जाति के धागों से ही बुना जाता है। कुछ क्षेत्रीय दलों का तो अस्तित्व ही जाति आधारित राजनीति पर टिका है। तमाम जातीय संगठन और सेनाएं अपने जाति गौरव की रक्षा के लिए देशभर में सन्नद्ध हैं। सबने इतिहास से अपने-अपने महापुरुष भी हथिया लिए हैं। महापुरुषों की जयंतियां जातीय शक्ति प्रदर्शन का जरिया बन गई हैं। प्रतिभाएं भी अब राष्ट्र से ज्यादा संबद्धित जाति को गौरवान्वित करती हैं। वह चाहे खिलाड़ी हों अथवा अन्य किसी क्षेत्र से हों।
इतनी खेमेबाजी के बाद बचा क्या है जो जाति जनगणना से और बिगड़ जाएगा?
यह एक ऐसा प्रश्न है,जिसका उत्तर सब जानते हैं,लेकिन उत्तर में छिपी कड़वी सच्चाई का सामना करने से हर कोई कतराता है।
अप्रत्याशित रूप से जाति जनगणना का निर्णय लेना भारतीय राजनीति में मुद्दों को हथियाने और रातों-रात अपना स्टैंड बदल लेने का भी सटीक उदाहरण है।
1951 से ही जाति जनगणना को विभाजनकारी माना जाता रहा है। तमाम दवावों के बाद भी सरकारें इससे बचती रही हैं। यद्यपि यह विचार हमेशा चर्चा में रहा कि जातीय जनगणना से हासिए पर पड़े लोगों का जीवन स्तर सुधारने संबंधी योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी। समाज की व्यापक और वास्तविक तस्वीर सामने आएगी। सामाजिक और आर्थिक वास्तविकताओं के साथ-साथ संसाधनों के उचित वितरण में भी मदद मिलेगी।
2011 में जातिगत आंकड़े एकत्रित करने का एक प्रयास हुआ था,लेकिन जटिलताओं के चलते आंकड़े जारी नहीं किए जा सके।
दरअसल भारत की जाति व्यवस्था इतनी जटिल है कि उसे परिभाषित करना आसान नहीं है। हजारों जातियों और उनकी उपजातियों को वर्गीकृत करने के लिए व्यवस्थित मानक बनाए बिना त्रुटिरहित आंकड़े जुटाना मुश्किल है।
2011 के अनुभव से सबक लेते हुए उम्मीद है कि सरकार निश्चित ही ऐसी प्रक्रिया अपनाएगी जिससे जनगणना के त्रुटिरहित आंकड़े जुटाए जा सकें।
रही बात जाति जनगणना से होने वाले राजनीतिक नफा-नुकसान की, तो यह भविष्य के गर्भ में है। फिलहाल तो हर कोई इसे अपने पक्ष में भुनाना चाहता है।
व्यापक प्रभाव तो 2029 के आम चुनाव के दौरान ही देखने को मिलेंगे।


सही और सटीक लेख। इस एक निर्णय से सारे समीकरण बदल गए हैं। कल जो इसे देश को बाँटने की साजिश करार देते थे, उन्हें रातों-रात इसे जनहित में उठाया गया कदम बताना पड़ रहा है। सच देखा जाए तो यह वर्तमान सरकार की राजनीतिक चतुराई है। विपक्ष के हाथों से एक फलदायी मुद्दा फिसल गया है!