नियमों के मकड़जाल में छीजती संवेदनाएं

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एक ओर तो हम देश-दुनिया के समक्ष जोर-जोर से यह दावा कर रहे हैं कि 2047 तक भारत विकसित देशों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा होगा, वहीं दूसरी ओर देश में कुछ ऐसी घटनाएं घटित हो रही हैं जो हमारे सिस्टम की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्न चिन्ह खड़े करती हैं।
कहीं खटिया पर मरीज को अस्पताल ले जाया जा रहा है, तो कहीं मृत देह को घर तक पहुंचाने के लिए साधन उपलब्ध नहीं है। कहीं सड़क पर प्रसव हो रहा है,तो कहीं नीम-हकीम लोगों की जान के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। कहीं कोई दबंग किसी असहाय पर मूत्र विसर्जन कर रहा है, तो कहीं किसी दलित दूल्हे को घोड़ी से उतारकर अपमानित किया जा रहा है। विडंबना तो यह है कि ऐसी घटनाएं दो-चार दिन सुर्खियां बटोरती हैं,फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है।

देश के प्रायः हर प्रांत में ऐसी अमानवीय घटनाएं घटित हो रही है। यह घटनाएं व्यवस्था में आ रही सड़ांध की ओर तो इंगित करती ही हैं,समाज के विद्रूप हो रहे चेहरे को आईना भी दिखाती हैं। यह अलग बात है कि आईने में अपना विकृत चेहरा देखकर व्यवस्था और समाज में क्षणभर के लिए ही अपराध बोध जागृत होता है, और कुछ ही देर के बाद सब किसी नए उत्सव की तैयारियों में जुट गए होते हैं। अपराध बोध तब तक के लिए तिरोहित हो जाता है,जब तक कोई नई घटना-दुर्घटना सुर्खियां ना बटोरे।
अब हमें इस कटु सत्य को स्वीकार कर लेना चाहिए कि सिस्टम और समाज दोनों स्तरों पर इस चलन को स्वीकार कर लिया गया है।

दुर्योग की इसी कड़ी में उड़ीसा के क्योंझर जिले के गांव दियानाली से एक ऐसा दृश्य देखने में आया, जिसे देखकर हर कोई अवाक रह गया।
वारिस होने का सबूत देने के लिए कब्र से कंकाल निकालना और उसे अपने कंधे पर लादकर बैंक अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत करने की घटना से न जाने कितने विकृत चेहरे अनावृत हो गए हैं।

कल्पना करिए उस आदिवासी युवक जीतू मुंडा की मनःस्थिति की,जिसमें उसने अपनी बहन के शव को कब्र से निकालने और सबूत के तौर पर उसे लेकर बैंक जाने का निर्णय लिया होगा।

माना कि जीतू मुंडा बैंक में नॉमिनी के रूप में नाम दर्ज करवाने की प्रक्रिया से वाकिफ़ नहीं था; माना कि बैंक अधिकारियों ने उसे नियम कायदे बताने का प्रयास किया होगा; लेकिन यह भी मानना पड़ेगा कि जीतू ने अपनी बात भी अधिकारियों के सामने रखी ही होगी। यदि थोड़ी सी संवेदनशीलता दिखाई गई होती, तो मामले को सुलझाया जा सकता था और देश को यह हृदयविदारक दृश्य नहीं देखना पड़ता।

हर बैंक में एक कर्मचारी होता है जो नए खाते खुलवाने से लेकर लोन,क्रेडिट कार्ड,एफडी,बीमा आदि के लिए खाता धारकों को प्रोत्साहित करता है। कर्ज वसूली के लिए तो बैंक के कारिंदे दुर्गम इलाकों तक पहुंच जाते हैं। संबंधित कर्मचारियों ने इस मामले में भी अगर पहल की होती तो बैंक पर यह काला धब्बा नहीं लगता।
संबंधित ग्राम के सरपंच अथवा अन्य जनप्रतिनिधि एक प्रमाण पत्र देकर अथवा पंचनामा बनवाकर भी मामले को सुलझा सकते थे।
लेकिन वह व्यवस्था ही क्या जो आम आदमी को सांप बिच्छू ना दिखाए?

हमेशा की तरह इस घटना के बाद भी देशभर में चर्चाएं चल पड़ीं हैं। हमेशा की तरह जीतू की समस्या भी प्राथमिकता पर निपटा दी जाएगी; और हमेशा की तरह सिस्टम अगली किसी दुर्घटना के इंतजार में अपनी संवेदनशीलता दफ्तर के किसी कोने में रखकर निश्चिंत हो जाएगा।

इतना ज़रूर है कि बहन का कंकाल कंधे पर लादे जीतू मुंडा के इस वीडियो ने सिस्टम और समाज को झकझोर तो दिया है। अब देखते हैं कि यह घटना लोगों को कितने दिन याद रहती है,और लोग इससे क्या सबक लेते हैं!

*अरविन्द श्रीधर

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1 Comment
  • यह दृश्य देखकर मन बहुत दुखी है। संवेदनशीलता आज फिर बोथरा गई है। यह ना जीतू की जीत है ना जीतु की हार। पर यह दृश्य देखकर मानवता गई है हार।
    बैंक आखिर इतनी मजबूर क्यों?
    जीतू खाली हाथ क्यों ?
    हमारा बैंकिग सिस्टम इतना असहाय क्यों?
    न्यूनतम बैलेंस पर बैलेंस काटकरआखिर किसका बैलेंस बढ़ रहा है?
    समाज व सरकार की स्पष्ट जवाबदेही है। निष्पक्ष जांच हो।
    सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान ले। त्वरित व प्रभावी निर्णय हो। दोषी को सजा मिले ना मिले जीतू को तत्काल प्रभाव से आर्थिक समाधान मिले।
    भगवान से प्रार्थना से फिर ऐसे दृश्य दोबारा हमको देखने को ना मिले। 💐💐

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