भारतीय संस्कृति की विशेषता यह है कि यहाँ त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवनदर्शन का व्यावहारिक रूप हैं। हमारे पर्व जीवन में आनंद का रस घोलते हैं, पर साथ ही यह याद भी दिलाते हैं कि सुख का भाव खुशियां बाँटने में है। “तेन त्यक्तेन भुंजीथा” अर्थात् त्याग भाव से पदार्थों का उपयोग करें। भाव यह कि उत्सव मनाते हुए ध्यान रहे कि हम उन लोगों के लिए भी खुशी के अवसर पैदा करें, जो अभावों में जी रहे हैं। उत्सव हमें समाज के साथ जुड़ने के अवसर देते हैं। लोक जुड़ाव से लोक संस्कृति दिखाई देती है। इसी जीवंत परंपरा का सबसे सुंदर विस्तार है दीपावली का पंच पर्व, जिसे उजालों का उत्सव भी कहते हैं। पाँच दिनों तक चलने वाला यह पर्व – 1.धनतेरस/धन्वंतरि जयंती, 2. नरक चतुर्दशी/ रूप चतुर्दशी, 3 दीपावली/ भगवान राम का अयोध्या लौटना, समूद्र मंथन में लक्ष्मी का प्राप्त होना, 4.गोवर्धन पूजा-गाय के महत्व को समझना और 5. भाई दूज -भाई की रक्षा के लिए यम से भी लड़ जाना। यह अवसर हमें जीवन जीने की सार्थकता को बताता है। धनतेरस स्वास्थ्य और समृद्धि का प्रतीक है, दीपोत्सव व्यापक संदेश देता है। बरसात के बाद घरों की सफाई भी जरूरी हो जाती है। किसान कृषि उपज देखकर आनंद उत्सव मनाता है। सच्चा धन वही है जो दूसरों के हित में काम आए। ये पाँच पर्व मिलकर बताते हैं कि भारतीय संस्कृति में व्यवहार ही आस्था है, और कर्म ही संस्कृति का प्रतिबिंब है।
इन दिनों बाजारों में रौनक लौटती है, छोटे व्यापारी, कारीगर और हस्तशिल्पी सक्रिय होते हैं। आर्थिक लेन-देन के साथ समाज में संवेदना और साझेदारी का प्रवाह भी बढ़ता है। परिवारों में मेलजोल होता है, पड़ोसी एक-दूसरे से जुड़ते हैं, और रिश्तों पर जमी धूल उतर जाती है। यह जुड़ाव केवल लेन-देन का नहीं, दिलों का होता है -एक ऐसी सामूहिक भावना का, जो भारतीय समाज की एकता को उसकी विविधता के बावजूद बनाए रखती है। यही दीपावली का वास्तविक सौंदर्य है: जब समृद्धि व्यक्तिगत न रहकर सामाजिक बनती है।
पंच पर्व का सामाजिक संदेश भी उतना ही गहरा है। यह हमें सिखाता है कि उजाला केवल सजावट का नहीं, सोच का प्रतीक है। दीप केवल घरों में नहीं, आचरण में जलने चाहिए, ताकि समाज के हर कोने तक विश्वास और संवेदना की रोशनी पहुँचे। आज जब तकनीक ने हमें जोड़ने का भ्रम दिया है, सोशल मीडिया में आपके हजारों मित्र हैं, आप उनसे जुड़े हुए हैं। घर में चार लोग हैं लेकिन आपस में बात नहीं होती। कभी सच्चे मित्रों को ढूंढिए आपको पता चलेगा जिसे हम मित्रता कह रहे थे वह वास्तव में धंधा था।
बाहर के उजाले दिखाने के लिए इंसान क्या क्या नही करता, तरह तरह की रंग बिरंगी लाइटें, घटती बढ़ती लाईटें लेकिन अंदर के अंधेरे को मिटाने के लिए उसे कोई लाइट नहीं दिखाई नहीं देती। समाज स्वयं तब ही उजाला बनता है जब प्रत्येक व्यक्ति स्वयं का अंधेरा मिटाकर किसी दूसरे के जीवन में दीप बन सके। दीपावली के इस पंच पर्व से यही प्रेरणा मिलती है – कि रोशनी बाँटना ही अपने आप में सबसे बड़ा दान है। जब हम भीतर का दीप जलाकर दूसरों के जीवन को भी प्रकाशित करते हैं, तभी संस्कृति का सच्चा अर्थ प्रकट होता है। उजालों का यह पंच पर्व केवल हर्ष और उत्सव का प्रतीक नहीं, बल्कि संबंधों को रोशन करने का संकल्प भी है- यह एक ऐसा संकल्प जो हर वर्ष हमें याद दिलाता है कि मनुष्य की सबसे बड़ी पूजा है – मानवता।

पार्थसारथि थपलियाल
(लेखक भारतीय संस्कृति सम्मान अभियान के संयोजक,मीडियाकर्मी और स्वतंत्र लेखक हैं।)

