मध्य प्रदेश के जन्म की कहानी

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मैं देश का हृदय हूँ…

मैं मध्यप्रदेश हूँ। देश का हृदय। मेरे आँचल में अनेक सदानीरा नदियाँ किलोल करती हैं। छोटी-बड़ी सैकड़ों नदियाँ मुझे सींचती हैं। हरा-भरा रखती हैं। विशाल वन-प्रान्तर पूरे देश के लिये धमनियों का काम करते हैं। शुद्ध आबोहवा और स्वस्थ पर्यावरण इसी निसर्ग की देन हैं। ऊँचे-ऊँचे पहाड़ मेरी साज-सज्जा करते हैं। रत्नगर्भा धरती भाँति-भाँति के खनिज रत्नों से भरी पड़ी है। बिरले ही प्रांतों को समृद्धि के ऐसे संसाधन नसीब होते हैं। इसीलिए तो माना गया था कि नया मध्यप्रदेश धन-धान्य से भरपूर होगा। कुटीर उद्योगों और छोटे-बड़े उद्योगों का वैभव लाएगा। अब बात करें मेरे नये जन्म की। अक्टूबर 1953 में न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में भाषावार राज्यों की रचना के लिए राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया गया। के.एम. पणिक्कर और हृदयनाथ कुंजरू आयोग के सदस्य थे। पुराने मध्यप्रांत का मराठी भाषी विदर्भ अंचल महाराष्ट्र में मिलना था। महाकोशल और छत्तीसगढ़ युक्त मध्यप्रांत, विंध्यप्रदेश, मध्यभारत और भोपाल राज्य का विलय कर नये मध्यप्रदेश को आकार लेना था। विंध्यप्रदेश के नेता नये मध्यप्रदेश में मिलना नहीं चाहते थे। वे पृथक राज्य बनाये रखने की मंशा रखते थे। मध्यभारत के नेता भी राज्य का दर्जा नहीं खोना चाहते थे। प्रस्तावित नए राज्य का नक्शा जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने रखा गया, नेहरू जी की प्रतिक्रिया थी, ‘‘अरे! यह क्या अजूबा है? ऐसा लंबा -चैड़ा और बेढंगा प्रदेश कैसे बन सकता है?’’ मध्यभारत के पहले मुख्यमंत्री रहे लीलाधर जोशी ने अपने संस्मरण में यह कथा कही है। नए मध्यप्रदेश के पक्षधर नेता जानते थे कि पं. जवाहरलाल नेहरू आर्थिक विकास की संभावनाओं को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं। इन नेताओं ने नियोजन और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ प्रो. वी.के.आर. वी. राव से संपर्क किया। उन्हें नैसर्गिक संसाधनों की दृष्टि से नये मध्यप्रदेश में भारत का विकसित और समृद्ध प्रांत बनने की संभावनाओं से अवगत कराया। श्री राव ने तथ्यों का विश्लेषण कर प्रमुख अंग्रेजी समाचारपत्र में ‘इकानामिक वायबिलिटी ऑफ मध्यप्रदेश’ आलेख लिखा। इसी को आधार बनाकर नए मध्यप्रदेश के पक्षधर नेताओं ने दिल्ली में संवाददाता सम्मेलन किया। यही नेहरूजी और सरकार की आश्वस्ति और सहमति का आधार बना। राज्य पुनर्गठन आयोग ने जबलपुर को नए मध्यप्रदेश की राजधानी बनाने की सिफारिश की थी। जबलपुर वाले उसी हिसाब से तैयारियाँ भी करने लगे थे। परंतु अन्यान्य कारणों से भोपाल को नई राजधानी चुना गया। विलय की हलचलों के बीच भोपाल राज्य के मुख्यमंत्री डा.शंकरदयाल शर्मा मौन थे। परंतु उस मौन के पीछे उनका मंतव्य भोपाल को राजधानी बनवाने का था। इस लक्ष्य की पूर्ति में कांग्रेस के बड़े नेता मौलाना अबुल कलाम आजाद का समर्थन उन्‍हें मिला। 10 अक्टूबर 1955 को राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट का प्रकाशन हुआ। 30 अप्रैल 1956 को राज्य पुनर्गठन विधेयक संसद में प्रस्तुत किया गया। 11 सितम्बर 1956 को विधेयक पारित हुआ। 1 नवंबर 1956 को नया मध्यप्रदेश अस्तित्व में आ गया। यह कहानी है देश के हृदयप्रदेश के जन्म की।

कक्का जी को कमान

जाहिर है, कोई भी राजनीतिक किस्सा-कहानी दाँव-पेंच और घात-प्रतिघात की क्षेपक कथाओं के बिना पूरी नहीं होती। मेरे जन्म के साथ भी ऐसा ही घटनाक्रम जुड़ा हुआ है। नये मध्यप्रदेश में अपने आपको समाहित करने वाले चारों घटकों में मध्यप्रांत सबसे बड़ा था। मध्यप्रांत की राजधानी नागपुर में 16 अक्टूबर 1956 को चारों विधानसभाओं के कांग्रेस विधायकों की संयुक्त बैठक हुई। कुंजीलाल दुबे अध्यक्षता कर रहे थे। कांग्रेस के कुल 274 विधायकों में से 212 विधायक इस बैठक में उपस्थित थे। श्वेत धवल वस्त्र-केश- भौंह-मूँछ धारी भव्य व्यक्तित्व के धनी बुजुर्ग नेता पं. रविशंकर शुक्ल को एकीकृत विधायक दल का नेता चुना गया। वे नवगठित मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने। अन्य तीन घटक राज्यों के मुख्यमंत्रियों को मंत्री बनाया गया। 31 अक्टूबर 1956 की मध्यरात्रि में भोपाल के मिंटो हॉल में शपथग्रहण समारोह हुआ। सबसे पहले राज्यपाल डा. व्ही. पट्टाभि सीतारामय्या को मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद हिदायतउल्ला ने शपथ दिलाई। राज्यपाल ने मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल और उनके मंत्रिमंडल को शपथ दिलाई। उन दिनों राजनीति और समाजसेवा को पेशे के रूप में नहीं लिया जाता था। परंतु सत्ता की राजनीति अपने रंगढंग तो 1937 वाले पहले प्रयोग से ही दिखाने लगी थी। 1937 के चुनाव के वक्त माखनलाल चतुर्वेदी मध्यप्रांत में कांग्रेस संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष थे। लेकिन ऐसी परिस्थितियाँ पैदा की गईं कि मध्यप्रांत के इस पहले सत्याग्रही और 1923 के ऐतिहासिक झंडा सत्याग्रह के सेनापति ने कांग्रेस से किनारा कर लिया था। सन् 1946 की अंतरिम सरकारों के दौर में भी ऐसा ही एक और वाकया हुआ। महाकोशल में स्वाधीनता आंदोलन के योद्धा और कांग्रेस की पहली पंक्ति के नेता ठाकुर निरंजन सिंह को सायास मंत्रिमंडल से बाहर रखवाया गया। फिर जब महाकोशल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष का चुनाव हुआ तब भी उनके साथ राजनीतिक घात हुआ। चाहे माखनलाल चतुर्वेदी हों या ठाकुर निरंजन सिंह दोनों का सियासी कद, काबिलियत और जनप्रियता ऐसी प्रबल थी कि महत्वाकांक्षियों को उनकी संभावनाओं से भय लगता था। ठाकुर निरंजन सिंह ने कांग्रेस छोड़ी और मध्यप्रदेश में समाजवादी आंदोलन के सूत्रधार बने। आजादी के बाद के शुरुआती वर्षों में एक धमाका पंडित द्वारकाप्रसाद मिश्र ने भी किया। 20 अगस्त 1951 को शुक्ल सरकार के गृहमंत्री द्वारकाप्रसाद मिश्र ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने पं. नेहरू पर तानाशाही का आरोप लगाया। हिन्दू कोडबिल का उदाहरण रखते हुए मिश्र जी ने पंडित नेहरू की असहिष्णुता और जिद पर उंगली उठाई। नेहरू की विदेशनीति में भी उन्होंने आपदा बनने का खतरा भाँप लिया था। क्योंकि तिब्बत की स्वतंत्रता के ध्वंस से भारत की सैकड़ों मील लंबी सीमा पर आक्रामक कम्युनिज्म आ धमका। उस दौर में यह बहुत बड़ी राजनीतिक परिघटना थी जो बहुमत के बोझ और समर्थन नहीं मिलने से दब गई।

मिंटो हाल में पहला दिन

भोपाल रियासत की ब्रिटिश ताजनुमा भव्य इमारत मिंटो हाल में 17 दिसंबर 1956 को विधानसभा की पहली बैठक हुई। ठीक 11 बजे मिंटो हाल में एक खनकदार आवाज गूँजती है – ‘माननीय सदस्यगण, माननीय सभापति महोदय’। यह आवाज विधानसभा के मार्शल कैप्टन रन्नौर की थी जो सावधान की मुद्रा में विधानसभा के सदस्यों और दर्शकदीर्घा को सूचित कर रहे थे। उनकी घोषणा पूरी होते ही अध्यक्षीय आसन के पीछे वाला दरवाजा खुलता है। विधानसभा के मनोनीत सभापति काशीप्रसाद पाण्डेय प्रवेश करते हैं। उनके सम्मान में पूरा सदन उठकर खड़ा हो जाता है। विधायकों की शपथविधि आरंभ होती है। पहली विधानसभा में मध्यप्रांत के 150, मध्यभारत के 88, विंध्यप्रदेश के 60 और भोपाल के 30 – कुल 328 सदस्य शामिल थे। इनमें 12 महिला विधायक भी थीं। सबसे पहले पं. रविशंकर शुक्ल और उनके बाद मंत्रिमंडल के सदस्य शपथ लेते हैं। यह सिलसिला शुरू ही हुआ था कि मध्यभारत से चुनकर आये जनसंघ के विधायक रामचन्द्र विट्ठल बड़े ने व्यवस्था का सवाल उठाया – ‘जब सभी वर्तमान सदस्यगण पूर्व में ही अपनी मूल विधानसभा के सदस्य के रूप में शपथ ले चुके हैं तो उन्हें दुबारा शपथग्रहण क्यों कराई जा रही है? इसका संवैधानिक औचित्य क्या है?’ इस आपत्ति का समर्थन प्रजा समाजवादी पार्टी के नेता ठाकुर निरंजन सिंह ने किया। उन्होंने जानना चाहा कि क्या संविधान में इस तरह शपथग्रहण का कोई प्रावधान है? सभापति ने आपत्तियाँ अस्वीकार कर दीं। सिलसिला आगे बढ़ा। तभी विधायक हीरालाल शर्मा ने दूसरी आपत्ति उठायी। उनका कहना था कि शपथ ग्रहण करने के बाद सदस्य सभापति से हाथ मिलाते हैं। जो अंगे्रजी तौर-तरीके की नकल है। इसमें व्यर्थ ही अधिक समय लगता है। हाथ मिलाने की बजाय सदस्य नमस्कार कर लिया करें। सभापति ने इस पर कोई व्यवस्था तो नहीं दी परंतु सदस्यों ने स्वतः नमस्कार करना आरंभ कर दिया। विधानसभा के सुचारु संचालन में व्यंग्य-विनोद के भाव का अपना महत्व होता है। सदन के वातावरण को तनावमुक्त बनाये रखने में हास-परिहास महती भूमिका निभाते हैं। पहली विधानसभा की पहली ही बैठक में ऐसा एक प्रसंग उपस्थित हुआ। सदन के सदस्य गंगाप्रसाद उपाध्याय ने पं. रविशंकर शुक्ल को सलाह दी – ‘अब आपकी अवस्था ऐसी है कि किसी नौजवान को कार्यभार सौंप कर वानप्रस्थी बन जायें!’ दूसरे सदस्य गुलाबचंद तामोट ने तत्काल भूलसुधार की पेशकश की – ‘आप शुक्ल जी के बारे में जानते नहीं हैं। दरअसल उनकी उम्र वानप्रस्थ में जाने की नहीं, बल्कि यह वह उम्र है जब मेनका द्वारा विश्वामित्र का तप भंग हुआ था।’ इस चुटकी पर मिंटो हाल ठहाकों से गूँज उठा। उस समय पंडित रविशंकर शुक्ल कुछ पढ़ने में तल्लीन थे। ठहाकों से उनका ध्यान भंग हुआ। उन्होंने अध्यक्ष कुंजीलाल दुबे से पूछा ऐसी क्या बात हो गई कि पूरा सदन ठहाके लगा रहा है। दुबे जी ने हँसते हुए जवाब दिया कि आप तामोट जी से पूछ लें। तामोट ने अपना कथन दुहरा दिया। एक बार फिर सदन में हँसी के फव्वारे छूट पड़े।

(दूसरी किस्त 1 नवंबर 2025 को)

विजय दत्त श्रीधर

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पत्रकारिता इतिहास के अध्येता हैं ।

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1 Comment
  • मध्यप्रदेश के गठन से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी इस लेख के माध्यम से मिली।

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