सामाजिक ताने-बाने में अंतर्निहित है स्वयंसेविता

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मानवीय सभ्यता विकास के क्रम में सहअस्तित्व का भाव और परिवेश के प्रति कर्तव्यनिष्ठा का स्फुरण होने के साथ ही स्वयंसेवक और स्वयंसेविता अस्तित्व में आ गए थे।पाषाण युग से लगाकर अब तक मानवीय सभ्यता का जो भी विकास हुआ है,वह स्वयंसेविता पर आधारित सामाजिकता के बगैर असंभव था। इस दृष्टि से स्वयंसेविता मनुष्य का स्वाभाविक गुण-धर्म है, जो मानव अस्तित्व के लिए अपरिहार्य है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने स्वयंसेवकों एवं
स्वयंसेविता के महत्व को दृष्टिगत रखते हुए ही प्रतिवर्ष 5 दिसंबर को “अंतरराष्ट्रीय स्वयंसेवक दिवस” मनाने का संकल्प 1985 में पारित किया था,और तभी से समूचे विश्व में स्वयंसेवक दिवस मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वयंसेवक दिवस वर्ष 2025 के लिए जो विषय निर्धारित किया है,वह केवल एक वर्ष के लिए नहीं,बल्कि चिरस्थाई महत्व का है -‘हर योगदान मायने रखता है'(Every Contribution Matters)
इसके साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2026 को अंतरराष्ट्रीय स्वयंसेवक वर्ष के रूप में मनाने का संकल्प इस अपेक्षा के साथ पारित किया गया है कि स्वयंसेवक सतत दीर्घकालिक विकास की गतिविधियों में अपना सक्रिय सहयोग प्रदान करेंगे।

जहां तक भारतीय परिदृश्य की बात है, “वसुधैव कुटुंबकम्” का उद्घोष करने वाली हमारी संस्कृति, समस्त विश्व को ही अपना परिवार मानती है, जिसके मूल में स्वयंसेविता का भाव प्रमुख है।
हमारे देश में शासन किसी का भी रहा हो, शासन प्रणाली कुछ भी रही हो, समाजोत्थान में संलग्न निष्काम सेवाभावी स्वयंसेवकों का अस्तित्व हमेशा रहा है।
अत्यंत प्राचीन काल से आयोजित हो रहे कुंभ मेले स्वानुशासन एवं स्वयंसेविता का उदाहरण ही तो हैं।कुछ हजार पुलिस वालों और व्यवस्थापकों के सहारे अपार जनमेदिनी को व्यवस्थित कर पाने का श्रेय व्यवस्थापक भले ही ले लें, लेकिन यह लोगों में अंतर्निहित स्वभागत स्वयंसेविता का भाव ही है जो इतने बड़े आयोजनों को निर्विघ्न संपन्न करवाता है।
जो लोग नर्मदा परिक्रमा के बारे में जानते हैं, उन्हें ज्ञात है कि परिक्रमावासी अपने साथ कम से कम सामान लेकर चलते हैं। परिक्रमा पथ के ग्रामवासी उनकी सारी जरूरतों की पूर्ति सहज ही कर देते हैं।स्वयंसेविता के भाव के बिना क्या यह हो संभव है?
यह सदियों से संस्कारों में घुली-मिली स्वयंसेविता ही है, जिसके वशीभूत होकर सुख- दुख के अवसर हों अथवा कोई उत्सव-समारोह, ग्रामवासी बगैर बुलाए ही सहयोग के लिए जुट जाते हैं।
कुरीतियों के विरुद्ध आवाज बुलंद कर समाज को नई दिशा देने वाले विभिन्न सुधारवादी आंदोलन, निष्काम स्वयसेवकों के सहारे ही तो संचालित हुए हैं।
आज भी ऐसे अनेक स्वयंसेवी संगठन हैं,जो देश के अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्रों में निष्काम सेवाभाव के साथ जरूरतमंदों की मदद कर रहे हैं।
स्वतःस्फूर्त और निष्काम सेवाभाव का हालिया उदाहरण है- कोरोना महामारी संक्रमण के चलते लागू लॉकडाउन के दौरान लाखों स्वयंसेवकों एवं स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा किए गए सेवा कार्य।महामारी के उस भयावह दौर ने स्वयंसेविता के बेहतरीन उदाहरण समाज के समक्ष रखे हैं। सड़क पर पैदल चल रहे प्रवासी मजदूरों की मदद के लिए यदि स्वयंसेवक और स्वयंसेवी संस्थाएं मैदान में नहीं उतरतीं तो स्थिति अत्यंत भयावह हो सकती थी।अस्पतालों में पलंग उपलब्ध कराने से लेकर ऑक्सीजन एवं आवश्यक दवाइयों की आपूर्ति में स्वयंसेवकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।उस समय स्वयंसेवकों का सबसे महत्वपूर्ण योगदान रहा है शासकीय इंतजामों और जरूरतमंदों के बीच समन्वय स्थापित करने का।
उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि स्वयंसेवकों में नामचीन लोगों से लेकर आम नागरिक तक शामिल रहे हैं।

एक सच्चे स्वयंसेवक के मन में ना तो अपनी सेवाओं के बदले कुछ प्राप्ति की लालसा होती है, और ना ही वह मान-बड़ाई के लिए लालायित रहता है।बल्कि कई बार तो उसे ताने भी झेलने पड़ते हैं। लेकिन एक दिन आता है,जब उसकी निष्काम सेवा फलीभूत होती है और समाज सहयोगी भाव से उसके पीछे चल पड़ता है।

यहां स्वयंसेवी संगठनों के एक और पक्ष की चर्चा भी किया जाना आवश्यक प्रतीत होता है। एक तो कतिपय स्वयंसेवी संस्थाओं ने सेवा की वजाय आर्थिक लाभ अथवा निहित लक्ष्यों को अपना ध्येय बनाकर स्वयंसेविता के उच्च मापदंडों के साथ खिलवाड़ किया है; और दूसरे सरकार द्वारा संचालित जनकल्याणकारी योजनाओं की वजह से भी स्वयंसेविता का भाव कहीं ना कहीं प्रभावित हुआ है।
आज गर्भावस्था से लगाकर अंतिम संस्कार तक जनकल्याणकारी कार्यक्रमों की प्रभावी श्रृंखला ना केबल मौजूद है,बल्कि दिन-प्रतिदिन योजनाओं में इज़ाफ़ा भी होता जा रहा है। इस वजह से समाज में यह भावना बलवती होती जा रही है कि जो कुछ करना है वह सरकार को ही करना है।इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि ऐसे अनेक काम,जो समाज की स्वयंसेवी पहल के फलस्वरुप सहज ही संपन्न हो जाते थे,अब शासकीय अनुदान स्वीकृति की बाट जोहते हैं, और नागरिक महज़ लाभार्थी बनकर रह गए है।

मेरा यह आशय कदापि नहीं है कि सरकारें जनकल्याणकारी योजनाएं ना चलाएं।होना यह चाहिए कि योजनाओं के क्रियान्वयन में स्वयंसेवकों की सहभागिता कुछ इस तरह से नियोजित की जाए जिससे योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचना सुनिश्चित हो सके। जनकल्याणकारी कार्यक्रमों के साथ-साथ स्वयंसेवकों एवं स्वयंसेविता को प्रोत्साहित कर उन्हें सामुदायिक जीवन में पुनः प्रतिष्ठित किए जाने की भी आवश्यकता है।

त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त मंच हो सकता है,जिसकी परिकल्पना में ही ग्राम एवं ग्रामीणों का सर्वांगीण विकास सन्निहित है।
गांव-समाज के प्रति स्वयंसेविता आधारित उत्तरदायित्व का भाव पुनर्स्थापित किए जाने के साथ-साथ पंचायत राज व्यवस्था के प्रति लोगों की सोच बदलना भी जरूरी है।वर्तमान परिदृश्य कुछ ऐसा है कि ग्राम पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधि केवल निर्माण कार्यों के प्रति ही रुचि प्रदर्शित करते हैं। सामाजिक,आर्थिक,सांस्कृतिक एवं जनजीवन को प्रभावित करने वाली जागरूकता संबंधी अन्य गतिविधियायों में उनकी प्रायः कोई रुचि दिखाई नहीं देती। गांधी जी द्वारा प्रतिपादित ग्राम स्वराज का भाव तो जैसे सिरे से नदारत है।

लोगों,विशेषकर युवाओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वह ग्राम पंचायत की गतिविधियों- चुनाव से लेकर ग्राम सभाओं के नियमित आयोजन तक एवं ग्राम विकास की योजनाएं बनाने से लेकर उनके क्रियान्वयन तक में स्वयंसेविता आधारित पहल करें।
सबसे जरूरी पहल तो यह होनी चाहिए कि नागरिकों में कर्तव्यभाव की पुनर्स्थापना हो,जो किसी भी राष्ट्र की अस्मिता के लिए पहली शर्त है।
सामाजिक समस्याओं एवं कुरीतियों का उन्मूलन भी स्वयंसेविता आधारित पहल से ही हो सकता है, पुलिस अथवा प्रशासन के डंडे से नहीं।

जहां-जहां भी ऐसी पहल हुई है, वहां के सामाजिक-सामुदायिक जीवन में ना केवल परिवर्तन आया है अपितु जन कल्याणकारी कार्यक्रमों का लाभ भी वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचा है.

स्वयंसेविता सामाजिक जीवन के मूल में है। इसका अस्तित्व हमेशा से था और हमेशा रहेगा। जरूरत स्वयंसेवी भाव को समय-समय पर परिमार्जित करते रहने की है।

*अरविन्द श्रीधर

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