अजीब तमाशा है। हम उस दौर में जी रहे हैं जहाँ खुदकुशी को ‘क्रांति’ का नाम देने की कोशिश की जा रही है। आप सड़क पर बिना हेलमेट के फर्राटा भरते हैं, लाल बत्ती को ठेंगे पर रखते हैं और जब कोई टोक दे, तो दलील देते हैं, “अरे साहब, पहले सड़कों के गड्ढे तो भरवाओ, फिर हमें ज्ञान देना।”
सुनने में यह तर्क बड़ा क्रांतिकारी लगता है। लगता है जैसे कोई व्यवस्था के गाल पर तमाचा जड़ रहा हो। लेकिन असल में, यह तमाचा आप अपने ही चेहरे पर मार रहे हैं। यह कोई वैचारिक विरोध नहीं, बल्कि एक आत्मघाती ज़िद है। यह वैसा ही है जैसे कोई मरीज़ डॉक्टर से कहे कि “जब तक मोहल्ले की गंदगी साफ नहीं होगी, मैं अपने सड़ने वाले घाव पर पट्टी नहीं बाँधूँगा।” अब डॉक्टर का क्या जाएगा? सड़न तो आपके जिस्म में फैलेगी, मौत का मातम तो आपके घर में मनेगा।
यह सच है। हमारे शहरों की सड़कें मौत के कुएँ जैसी हैं। प्रशासन की फाइलें भ्रष्टाचार की दीमक चाट रही हैं और पुलिस की मुस्तैदी अक्सर सुविधा शुल्क पर टिकी होती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सिस्टम फेल है। लेकिन क्या सिस्टम की इस विफलता का बदला आप अपनी गर्दन तुड़वा कर लेंगे।
आप कहते हैं कि जब तक सरकार अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाती, तब तक आप नियमों का पालन क्यों करें, तो जनाब, सरकार के लिए आप सिर्फ एक ‘सांख्यिकी’ (डाटा) हैं। दुर्घटना हुई, तो आप एक सरकारी रजिस्टर में दर्ज एक और अंक बन जाएंगे। लेकिन अपने परिवार के लिए आप पूरी दुनिया हैं। सरकार की नाकामी का ढोल पीटते-पीटते आप श्मशान की राह पकड़ लेंगे, तो इससे व्यवस्था नहीं सुधरेगी, बल्कि एक घर का चिराग बुझ जाएगा।
सवाल सीधा है, क्या आप अपनी जान की बाजी लगाकर प्रशासन को आईना दिखाना चाहते हैं, यह बहादुरी नहीं, बेवकूफी है।
हमने सुरक्षा नियमों को ‘थोपे गए कानून’ की तरह देखना शुरू कर दिया है। हेलमेट हमें बोझ लगता है, सीट बेल्ट एक बंधन। हमें लगता है कि नियम मानकर हम पुलिस वाले पर कोई अहसान कर रहे हैं। याद रखिये, चालान के दो-पाँच सौ रुपये पुलिस की जेब में जाएँ या सरकारी खजाने में, उससे व्यवस्था को फर्क नहीं पड़ता। लेकिन सड़क पर जब आपका सिर कंक्रीट से टकराएगा, तब कोई ‘सिस्टम’ आपको बचाने नहीं आएगा। तब आपका अपना हेलमेट ही आपकी आखिरी ढाल होगा।
हम एक आदर्श समाज की वकालत करते हैं, लेकिन शुरुआत पड़ोसी से चाहते हैं। हम चाहते हैं कि सड़कें यूरोपीय देशों जैसी हों, लेकिन हमारा बर्ताव कबीलाई है। हम खराब सड़कों पर चिल्लाते हैं, चिल्लाना भी चाहिए, यह लोकतंत्र में हमारा हक है, परंतु गड्ढों वाली सड़क पर बिना हेलमेट के तेज गाड़ी चलाना उस हक का इस्तेमाल नहीं, बल्कि अपनी मौत को दावत देना है।
नियम तोड़ना कोई बहादुरी का पदक नहीं है। अराजकता से कभी सुधार नहीं आता। अगर पुलिस सो रही है, तो क्या आप भी अपनी आँखें बंद करके ट्रक के सामने कूद जाएंगे, सुरक्षा कोई ‘डील’ नहीं है कि “तुम सड़क ठीक करो, तो मैं हेलमेट पहनूँ।” सुरक्षा एक समझदारी है, जो खुद से शुरू होती है।
सरकार को कटघरे में खड़ा कीजिये, सड़कों के गड्ढों पर हंगामा कीजिये, भ्रष्ट अधिकारियों की शिकायत कीजिये, लेकिन यह सब ‘ज़िंदा’ रहकर कीजिये। लाशें कभी सिस्टम नहीं सुधारतीं। अपनी सुरक्षा को किसी सरकारी वादे की शर्त पर मत छोड़िए।
याद रखिये, आपकी जान की कीमत सरकार की विफलता से कहीं ज्यादा है। ज़िद छोड़िये, समझदारी पहनिये।

*राजकुमार जैन (स्वतंत्र लेखक)

